S M L

मुजफ्फरनगर दंगा: मुआवजों से क्या भर पाएंगे जख्मों के निशान

कुर्बान ऐसे ही एक शख्स हैं उनके पिता सुलेमान कैराना वापस चले गए हैं और घर खरीद लिया है.

Sanjay Singh Updated On: Feb 09, 2017 07:39 PM IST

0
मुजफ्फरनगर दंगा: मुआवजों से क्या भर पाएंगे जख्मों के निशान

इस साल के पहले दिन वसीम उत्तरप्रदेश के कैराना की मुनव्वर हसन कॉलोनी के अपने नए घर से मुजफ्फरनगर के बाबरी गांव में अपने पुश्तैनी घर गए थे. हालांकि, चालीस किलोमीटर का यह सफर सिर्फ डेढ़ घंटे में तय हो गया लेकिन ऐसा लगा मानो उन्हें यह सफर तय करने में सदियां बीत गई हों.

जब वे वहां पहुंचे तो जोश से भरे हुए थे और बेहद खुश भी थे. वो अपने बचपन और जवानी के दोस्तों के साथ थे. वसीम क्रिकेटर हैं, तेज गेंदबाज हैं लेकिन जब पैड बांधकर बल्लेबाजी के लिए उतरते हैं तो लंबे शॉट मारना पसंद करते हैं.

1-20 जनवरी के बीच क्रिकेट टूर्नामेंट खेलने के लिए वह मुजफ्फरनगर आते-जाते रहे. हिंदू-मुसलमानों के बीच कोई फर्क नहीं था. जो चीज मायने रखती थी वो थी टीम की जीत या हार.

सितंबर 2013 में इलाके में हुए दंगे ने उनसे हर चीज छीन ली थी, घर-जमीन और दोस्त. उन्हें यहां से भागना पड़ा था. जान बचाना तब उनकी पहली प्राथमिकता थी. वह अपने परिवार के साथ भाग खड़े हुए, उनके चाचा के घर में आग लगा दी गई थी.

UP

वसीम (फोटो: फ़र्स्टपोस्ट)

कुछ समय बाद उन्हें मुजफ्फरनगर में अपना 100 गज का घर मजबूरी में बेचना पड़ा. वसीम अपने पुश्तैनी गांव का घर बेचने के परिवार के फैसले पर अफसोस जताते हैं. उस घर और गांव की यादें, हालांकि यहां आने से ताजा हो गई हैं लेकिन दर्द भी देती हैं. क्योंकि अब न घर उनका रहा और न गांव. वह अपने दोस्तों के मेहमान हैं.

दोस्त तो दोस्त हैं

वसीम कहते हैं, 'दोस्त तो दोस्त हैं. सभी बहुत अच्छे थे और अब भी बहुत अच्छे हैं.'  वो बतलाते हैं, 'मन जानता है कितना मुश्किल होता है बचपन की जगह छोड़ना, यार-दोस्त जो बचपन से थे उनको छोड़ना. घर बिक जाने का बहुत अफसोस है. मैंने मना किया था, लेकिन एक हिंदू नाई को बेच दिया गया.'

फिर वो पूछते हैं कि उनसे ये सवाल क्यों पूछे जा रहे हैं? सब शांत होने के बाद हम यहां क्यों आए हैं? कुछ है जिससे लगता है कि वो बहुत बेचैन हैं. वो फोटो खिंचवाने से भी मना कर देते हैं और बाद में तब तैयार होते हैं जब हम अलग-अलग मुद्दों पर कुछ देर बात कर लेते हैं.

ये भी पढ़ें: यूपी चुनाव में चौंका सकती है बीएसपी

कहते हैं कि वक्त सब घाव भर देता है. इनमें से अधिकतर के लिए 2013 के दंगों के घाव तो चले गए लेकिन निशान बाकी हैं. वसीम को अपने दोस्तों (खास तौर पर जाट) पर तब भी भरोसा था लेकिन तब के हालात ने चीजों का रुख बदल दिया था.

मुनव्वर हसन कॉलोनी को समाजवादी पार्टी के विधायक नाहिद हसन ने अपने पिता की याद में 22 बीघा जमीन दानकर बनाया था, ताकि सितंबर 2013 के दंगों से बचकर भागे मुसलमान परिवारों को बसाया जा सके.

वो क्या थे और क्या हो गए हैं इसे लेकर यहां के बाशिंदों की भावनाएं मिली-जुली हुई हैं. हालांकि सभी नाहिद हसन के एहसानमंद हैं, कुछ ने हालात से तालमेल बिठाना सीख लिया है तो कुछ अब भी अपने अतीत और साढ़े तीन साल पहले की जिंदगी को बार-बार याद करते हैं.

मुनव्वर हसन-नाहिद हसन के परिवार ने शरणार्थियों को बसाने के लिए 22 बीघा जमीन दान की थी. उसमें से 307 परिवारों को 50 वर्ग फुट के प्लॉट दिए गए थे और मुख्य सड़क पर एक बड़ा हिस्सा मस्जिद और मदरसे के लिए छोड़ दिया गया था.

उजड़ों को बसाने की कोशिश

जमायत उलेमा-ए हिंद के प्रमुख और दारुल उलूम देवबंद के असल मुखिया समझे जाने वाले मौलाना अरशद मदनी ने हर प्लॉट पर एक कमरा, एक बरामदा, एक रसोई और एक बाथरूम बनाया है.

UP1

शॉल और टोपी में मुनव्वर हसन (बाएं)

कुछ प्लॉट का काम पूरा हो चुका है और लोग वहां रहने आ चुके हैं और कुछ का काम अभी चल रहा है. एक बड़ी मस्जिद पहले ही बन चुकी है, जिसका इस्तेमाल अभी मदरसे के लिए भी हो रहा है. यहां बच्चों को पारंपरिक इस्लामी शिक्षा दी जाती है.

ये भी पढ़ें: हाथरस में गरजे राहुल

यहां लोगों से थोड़ी देर बात करने पर मुलायम सिंह यादव का नाम जुबां पर आ जाता है. आमतौर पर दंगों के लिए तब की सरकार को दोष दिया जाता है और दंगा प्रभावित लोग सरकार और उसके नेताओं को माफ नहीं करते या कम से कम आलोचना तो करते ही हैं.

लेकिन यहां मुलायम सिंह यादव के बारे में ऐसा नहीं कहा जाता. लोकसभा चुनाव में भी मुसलमान समुदाय ने उनकी पार्टी को बड़ी संख्या में वोट दिया था. उनके लिए लोगों के मन में जो भावना है उसका फायदा उनके बेटे अखिलेश यादव को भी मिलेगा.

मुनव्वर हसन कॉलोनी में कई परिवार हैं जिनके मुखिया ने अपने पुश्तैनी गांव या कहीं और जाकर राज्य सरकार से मिले पांच लाख रुपयों से प्लॉट या घर खरीद लिया है. हालांकि, परिवार के बाकी लोग वहीं रहे क्योंकि इस कॉलोनी में परिवार के हर विवाहित पुरुष को एक प्लॉट दिया गया था.

कुर्बान ऐसे ही एक शख्स हैं. उनके पिता सुलेमान कैराना वापस चले गए हैं और घर खरीद लिया है. उनके पांचों बेटों के पास एक-एक घर है. कुर्बान हरियाणा के सोनीपत में राज मिस्त्री के तौर पर काम करते हैं.

वो हरियाणा क्यों जाते हैं, कैराना या शामली या मुजफ्फरनगर क्यों नहीं? यह पूछने पर वह कहते हैं कि यहां मुश्किल से काम मिलता है लेकिन सोनीपत में, जो यहां से ज्यादा दूर नहीं है बहुत काम मिलता है.

क्या ये सच्चाई अखिलेश यादव और समाजवादी पार्टी-कांग्रेस गठजोड़ पर किया गया कटाक्ष नहीं है?

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi