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आखिरकार मुसलमानों को सोचना ही पड़ेगा...

समय आ गया है जब इन्हें मुस्लिम मतदाता का चोला उतारकर, भारतीय मतदाता बनना होगा

Nazim Naqvi Updated On: Mar 02, 2017 07:49 AM IST

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आखिरकार मुसलमानों को सोचना ही पड़ेगा...

समय आ गया है जब हमें युद्ध-काल के ब्रिटिश-पत्रकारों का अनुसरण करते हुए ये कहना चाहिए कि ‘तथ्यों को साफ-साफ, खोल के रख देने में कोई नुकसान नहीं है क्योंकि कुछ भी गोपनीय नहीं रह गया है.'

भारतीय मुसलमानों को क्यों सोचना पड़ेगा? और क्या सोचना पड़ेगा? इसके लिए इतिहास के कंटीले रास्तों से गुजरते हुए वर्तमान में, आज हम जहां पहुंच गए हैं, उसका जायजा बहुत जरूरी है. आइए पिछले 160 वर्षों पर एक सरसरी नजर डालकर लेख के विषय तक आते है.

1857 की जंगे-आजादी में ब्रिटिशों का विरोध एक सुर में गूंज रहा था. हिंदू-मुस्लिम मिलकर एक ताकत बने हुए थे. यदि उस समय, बहादुरशाह ज़फर जैसा कमजोर नेतृत्व आड़े न आया होता तो इस ताकत का मुकाबला दुनिया की कोई ताकत नहीं कर सकती थी.

अंग्रेजों ने शुरू किया था मुस्लिम तुष्टीकरण 

मगर ऐसा नहीं हो सका और विद्रोह कुचल दिया गया. अंग्रेजी साम्राज्य भारत की इस ताकत को समझ गया. ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति अपनाई गई. नतीजतन आने वाले वर्षों में, मुसलमानों को नेशनल मूवमेंट से बाहर रखने पर सफलतापूर्वक काम हुआ.

इसे और अच्छी तरह समझने के लिए, दिसंबर 1906 में हुई सभा में पारित घोषणा बिंदुओं पर भी एक नजर डाल लीजिए. जिसके गर्भ से मुस्लिम लीग का जन्म हुआ.

1. हुकूमत के प्रति मुसलामानों के मन में वफादारी पैदा करना और उनके दिमागों को हुकूमत के कार्यकलापों के प्रति फैली भ्रांतियों से रोकना.

2. भारतीय मुसलमानों के राजनीतिक हुकूक (अधिकार) और सरोकारों की रक्षा और प्रगति के लिए प्रयत्नशील रहना तथा समय-समय पर हुकूमत को, मुसलमानों की, जरूरतों और आकांक्षाओं से परिचित कराना.

जामा मस्जिद

जामा मस्जिद

यहां हम ये बिलकुल नहीं कहना चाहते कि देश के दूसरे गैर-मुस्लिम समुदाय अंग्रेजों के पिट्ठू बनने पर मजबूर नहीं हुए. लेकिन इस लेख का आशय मुसलमान को संबोधित करना है इसलिए इस लेख की ऑपरेशन-टेबल पर मुसलमान है और उसी पर बात होगी.

पूर्व केंद्रीय मंत्री और अध्येता आरिफ मोहम्मद खान कहते हैं कि, 'मुस्लिम लीग की स्थापना, अलग मतदान एवं अलग प्रतिनिधित्व की मांग और फिर देश का विभाजन, अब इतिहास का विषय है. हाँ ये जरूर है कि इस दौरान अलगाववाद को हवा देकर या साम्प्रदायिकता को उभारकर अंग्रेज मुस्लिम समुदाय का भला तो बिलकुल नहीं कर रहे थे.'

आरिफ साहब जिस तरफ इशारा कर रहे हैं वो भी तुष्टिकरण की एक मिसाल है, मजहब की बुनियाद पर विभाजन भी उसी मिसाल का एक हिस्सा है और धर्मनिरपेक्षता के झंडे तले मुसलमानों को हांककर लाना भी उसी की पुनरावृत्ति है.

चलिए आजाद भारत का मुआयना करते हैं. आजाद होते ही भारत की राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक सुधारों में परिवर्तन की इच्छाएं दिख रही थीं.

आजादी के बाद मुस्लिमों को वोट-बैंक की तरह देखा गया

hindu-muslim voters 

इन इच्छाओं के नतीजे में देश ने जो फैसला लिया उसे आरिफ मोहम्मद खान, पूरी पारदर्शिता के साथ सामने रखते हैं, 'जब हमने पृथक मतदान की व्यवस्था को सामूहिक मतदान में बदला तो संदेश बिलकुल साफ था, किसी भी धार्मिक समुदाय के नाम पर निरपेक्षता की वकालत करने वालों की दावेदारी के लिए, यहां कोई जगह नहीं है. संविधान भी, भारत को, धार्मिक समुदायों का महा-संघ कहने के बजाय भारतीय नागरिकों का राष्ट्र कहता है.'

अब इस दर्पण में धर्मनिरपेक्षता का ढोंग करने वालों की सियासत को समझने का वक्त आ ही नहीं गया है बल्कि बहुत समय बर्बाद भी हो चुका है. आरिफ तो मुसलमानों की दशा और दिशा का मूल्यांकन करने के लिए बनाई गई ‘सच्चर-कमेटी’ को भी सवालों के घेरे में खड़ा करते हैं.

'1870 में मुसलमानों की कठिनाइयों का अध्ययन करने के लिए ‘हंटर-कमीशन’ बनाया गया था, जिसमें मुसलमानों के प्रति अंग्रेजी हुकूमत का पक्षपात पाया गया. दरअसल अंग्रेज इस बहाने ये जताना चाहते थे कि मुसलमानों के प्रति हुकूमत के असंतोष के पीछे उनके बगावती तेवरों का पिछला रिकार्ड है. यदि वो वफादार हो जाएं तो अंग्रेजी हुकूमत के प्रीति-पात्र हो सकते हैं. आज उसी शहंशाहियत का अनुसरण करते हुए किसी सच्चर को नियुक्त कर दिया जाता है ताकि वोट-बैंक की राजनीत पर एक और मुहर लगायी जा सके.'

ये सब देखने, समझने के बाद ये एहसास होना लाजमी है कि या तो धर्मनिरपेक्षता की दुहाई देने वालों का भारत के संविधान में कोई यकीन नहीं है. और अगर है तो फिर सच्चर कमेटी बनाने के क्या मायने हैं.

आखिर ये चुनावी गुणा-भाग छोड़कर हम कतार में खड़े उस आखिरी व्यक्ति की बात कब करेंगे? जिसमें हर धर्म और हर समुदाय के लोग खड़े हैं, जिनकी गरीबी उनके मजहब से ज्यादा बड़ी है.

मुसलमानों को बदलनी होगी अपनी पहचान

muslim congess  आइए अब अपने बुनियादी सवाल पर आते हैं कि मुसलमान हिन्दुस्तान में अपने लिए विशेष बर्ताव की मांग कब तक करेगा? वह कब तक 'पहले मैं मुसलमान हूं, फिर हिन्दुस्तान का नागरिक' कहकर अपनी पहचान कराता रहेगा?

वह कब इस सच्चाई को स्वीकार करेगा? कि उसका मुसलमान होना और भारत का नागरिक होना, दो अलग बातें हैं. वह अपनी कीमत मुसलमान के तौर पर क्यों लगता है, नागरिक के तौर पर क्यों नहीं लगता.

आइए इस तस्वीर को और साफ करते हुए, गुजरात के दंगों या पश्चिमी उत्तर-प्रदेश के दंगों के बाद के माहौल को भी इस आईने में देखते हैं. क्यों ऐसा होता है कि समाज के एक बड़े हिस्से में इन दंगों के बाद कोई पश्चाताप नहीं दिखाई देता? क्यों आखिर समाज को नहीं लगता? कि ‘हमसे भूल हो गयी है’.

इस पर कौन सोचेगा कि नोआखाली की वो तस्वीर जिसमें दंगो से उजड़ी हुई जमीन पर गांधी घूम-घूम कर लोगों को डांट रहे थे कि ‘कुछ शर्म करो’. आज वही तस्वीर, बदले की भावना में बदल गयी है कि तुम हमारे चार मरोगे तो हम चालीस मारेंगे.

धर्मनिरपेक्षता से हो रहा है मुसलमानों को नुकसान

muslim reservation 

मुसलमान को कितनी जरूरत है इस धर्मनिरपेक्षता से हो रहे नुकसान से खुद को बचाने की. लेकिन हो इसका उल्टा रहा है. अब तो, मुस्लिम समुदाय से आने वाले बेहद कामयाब लोगों को भी, अचानक याद आने लगा है कि वो मुसलमान हैं. जिन्हें पूरे देश ने उनके कार्यों के लिए सराहा और जिन्हें कभी खुद का धर्म बताने की जरूरत नहीं पड़ी.

हर बीतते हुए चुनाव में तुरुप के पत्ते की तरह इस्तेमाल होने वाले मुसलमान को व्यक्तिगत रूप से अपनी भूमिका के बारे में सोचना होगा. ऐसा इसलिए है कि चुनाव दर चुनाव, मुसलमान अपने भारतीय मतदाता होने की हैसियत को मुसलमान मतदाता बनाकर, खोता जा रहा है.

दरअसल, इस खोती हुई हैसियत के लिए मुस्लिम समुदाय से ज्यादा जिम्मेदार देश की वो सियासी पार्टियां हैं जो धर्मनिरपेक्षता का झंडा बुलंद करके, उन्हें भ्रमित करती रही हैं.

इस सत्य के पक्ष में 2014 के लोकसभा चुनावों को मिसाल के तौर पर देखा जा सकता है. क्योंकि आजादी के बाद ये पहला मौका था जब उत्तर-प्रदेश से खड़े 55 मुस्लिम उम्मीदवारों में से, एक भी नहीं जीत सका.

ये स्थिति चिंताजनक है क्योंकि 80 सांसदों वाले इस प्रदेश में 35 सीटें ऐसी हैं जिनपर मुस्लिम वोट निर्णायक भूमिका निभाता है.

Akhilesh Mayawati Muslim

सांप्रदायिक ध्रुवीकरण से मुस्लिम प्रतिनिधित्व पर खतरा 

बीजेपी की जीत ने धर्मनिरपेक्षता का नाटक करने वाली पार्टियों के सामने ये साबित कर दिया है कि मुस्लिम वोट के बगैर भी चुनाव जीते जा सकते हैं. जाहिर है इस नतीजे के बाद 2016 में उत्तर-प्रदेश की 11 सीटों के लिए हुए उप-चुनावों में एसपी और कांग्रेस बेनकाब हो गए, जब उन्होंने मुस्लिम उम्मीदवारों से किनारा कर लिया.

इसके बाद असम राज्य के चुनाव में भी गैर-मुस्लिम वोटों के दम पर मजबूत सरकार बनाकर एक बार फिर बीजेपी ने साबित कर दिया कि सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति विपरीत दिशा में भारी पड़ सकती है.

जिस बात की परवाह किसी भी मुस्लिम-हितैषी दलों को नहीं है, वो ये, कि देश के लगभग 18 करोड़ और उत्तर-प्रदेश के लगभग साढ़े-तीन करोड़ मुस्लिम आबादी का प्रतिनिधित्व, संसद और विधानसभाओं में, खतरे में पड़ता जा रहा है.

ऐसे में मुसलमानों के लिये ये समझना जरूरी हो जाता है कि धर्मनिरपेक्षता की ये दुहाई, तभी तक है जबतक उनमें विरोधी को हरा देने की क्षमता है. ये मुस्लिम-प्रेम नहीं बल्कि राजनीतिक दलों द्वारा, अपने फायदे के लिए उनके कंधों का इस्तेमाल है.

समय आ गया है जब उन्हें मुस्लिम मतदाता का चोला उतारकर, भारतीय मतदाता बनना होगा.

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