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यूपी डायरी: शाहजहां आज ताजमहल को देख लें तो सदमे में आ जाएं

यूपी के विकास में लोमड़ियों, खरगोशों, कुत्तों और दूसरे जानवरों की बलि चढ़ रही है

Rakesh Bedi | Published On: Feb 17, 2017 06:19 PM IST | Updated On: Feb 17, 2017 08:30 PM IST

यूपी डायरी: शाहजहां आज ताजमहल को देख लें तो सदमे में आ जाएं

आगरा से ठीक पहले, जहां यमुना एक्सप्रेस-वे नए लखनऊ एक्सप्रेस-वे से मिलता है, एक बड़ा, सपाट ट्रैक स्वराज ट्रैक्टरों को हमारे कृषि प्रधान देश के किसी हिस्से में ले जा रहा है. अब कॉन्क्रीट एक्सप्रेस-वे से बने के दोनों तरफ गेहूं के हरे भरे खेत दिखाई दे रहे हैं.

हालांकि, लहलहाते खेतों की यह तस्वीर चौंकाने वाले बेहद कम कृषि पैदावार के साथ मेल नहीं खाती है. थोड़ा और आगे देखिए तो ट्रैक्टरों की घरघराहट इस खूबसूरत  और सीधे सादे नज़ारे को आगे पूरा करती हैं.

एकसाथ मिलकर ट्रक और खेत और ये चिकना सपाट एक्सप्रेस-वे आगे बढ़ते भारत की एक झलक पेश करता है.

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वो भारत जिसका इंफ्रास्ट्रक्चर कि चट्टान की तरह मजबूत है और जिसके खेत अमीर हैं. काश देश का हर हिस्सा इसी तरह की उम्मीद पैदा कर पाता. दुख की बात यह है कि यूपी की यादव बेल्ट में भी केवल 50 मील आगे चलते ही, कुछ इलाकों में सड़कों की हालत इतनी खराब है कि सारी उम्मीदें आसानी से मिट्टी में मिल जाती हैं.

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दिल्ली आगरा एक्सप्रेस वे (तस्वीर-विकीमीडिया)

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पर ये इंफ्रास्ट्रक्चर है क्या बला? यह शब्द कब से प्रचलन में आया? और सड़कें, बिल्डिंग्स, फ्लाइओवर, एक्सप्रेस-वे, पोर्ट्स जैसी चीजें कब इस एक शब्द के तहत आ गए?

जरा सोचते हैं, आखिर शाहजहां ने क्या कहा होगा जब उन्होंने आदेश दिया कि वह अपनी मुहब्बत मुमताज के लिए मकबरा बनाना चाहते हैं?

क्या उन्होंने कभी सोचा होगा कि वह इंफ्रास्ट्रक्चर का एक नायाब नमूना खड़ा करने जा रहे हैं? शायद वास्तुकला, लेकिन..निश्चित तौर पर इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं.

ताजमहल का संबंध सीधे तौर पर प्यार-मुहब्बत से है. इसका संबंध भारी-भरकम शब्द इंफ्रास्ट्रक्चर से तो कतई नहीं है.

आजकल ऐसी बिल्डिंग्स का भी प्रचार बेहद आक्रामक तरीके से किया जाता है, जिनकी हैसियत ताजमहल के सामने कुछ नहीं है.

देश के इंफ्रास्ट्रक्चर के एक और शानदार नमूने, आगरा एक्सप्रेस-वे से ताजमहल को देखकर शाहजहां शायद सदमें में आ जाते कि उनकी ऐतिहासिक विरासत, जिसके मॉडल्स को दुनिया में कई जगहों पर हूबहू बनाने की कोशिश की गई, किस तरह से धूल और गर्द की चपेट में आ गई है.

इस माहौल में इसकी खूबसूरती खत्म हो गई है. ताजमहल एक ऐसी तस्वीर दिखाई देती है जिसे किसी हुनरमंद पेंटर ने हवा में उकेर दिया हो. इंफ्रास्ट्रक्चर के इस दौर में, इतिहास गर्दो-गुबार की भेंट चढ़ गया है.

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यमुना एक्सप्रेस-वे से दो घंटे में दिल्ली से आगरा पहुंचा जाता है (तस्वीर विकीमीडिया)

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अखिलेश के विकास के दांव, आगरा-लखनऊ एक्सप्रेस-वे पर अभी भी काम चल रहा है.

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने हड़बड़ी में इसका उद्घाटन कर दिया और यहां तक कि भारतीय वायुसेना के फाइटर जेट्स भी इस एक्सप्रेस-वे पर उतरवा दिए, और साबित कर दिया कि यूपी किस तरह तरक्की के रास्ते पर बढ़ रहा है.

हालांकि, यह हाइवे जब बनकर तैयार हो जाएगा तो यह यूपी जैसे बीमारू राज्य के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर की एक मिसाल होगा.

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लेकिन, फिलहाल इसमें कई तकलीफदेह, धूल से भरे डायवर्जन हैं जो कि कमर की ऐसी-तैसी कर देते हैं और काफी वक्त बर्बाद करते हैं.

हाइवे बड़े तौर पर फिरोजाबाद, शिकोहाबाद, इटावा, कन्नौज की यादव बेल्ट से होकर गुजरता है. यह लखनऊ पहुंचने के वक्त को कम से कम ढाई घंटा कम कर देता है.

जानवर जो कि उनके इलाके में हुई इस घुसपैठ से अभी अनभिज्ञ हैं, वे इसका सबसे बड़ा शिकार हैं.

यूपी के विकास में लोमड़ियों, खरगोशों, कुत्तों और दूसरे जानवरों की बलि चढ़ रही है. हाइ-वे इन जानवरों की मौतों से पटा पड़ा है.

कुछ डायवर्जन ऐसे हैं जो कि आपको पुराने छोटे और थके हुए हाइवे पर पहुंचा देते हैं, जिसे आमतौर पर जीटी रोड के नाम से जाना जाता है.

जीटी रोड में भी एक और लेन जोड़ी जा रही है. जीटी रोड की जड़ें गर्द भरे इतिहास में मिलती हैं.

यह रोड पहले ही ऐसे पर्याप्त बलिदान देख चुकी है और सड़कों पर मौतों के लिए स्वतंत्र है.

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