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तीन तलाक: सलमान खुर्शीद के आइडिया से बात नहीं बनेगी

एक तलाक का समर्थन करते हुए सलमान खुर्शीद को सिर्फ एक सवाल का जवाब देना चाहिए: क्या मुस्लिम महिलाएं भी इस प्रथा पर चलते हुए तलाक दे सकती हैं?

Sandipan Sharma Updated On: May 14, 2017 08:53 PM IST

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तीन तलाक: सलमान खुर्शीद के आइडिया से बात नहीं बनेगी

सलमान खुर्शीद का ये कहना बिल्कुल सही है कि तीन तलाक इंसान का किया हुआ ऐसा पाप है, जिसकी इस्लाम अनदेखी नहीं कर सकता. लेकिन इस पाप से मुक्ति का जो रास्ता वो सुझाते हैं, वो इसी पाप यानी तीन तलाक को बढ़ावा देने वाला है.

तीन तलाक से मुक्ति का सलमान खुर्शीद का फॉर्मूला उसी तर्क पर आधारित है, जिसके चलते तीन तलाक का विरोध हो रहा है. खुद सुप्रीम कोर्ट तीन तलाक को घिनौनी प्रथा कह चुका है.

शुक्रवार को तीन तलाक के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में बहस करते हुए सलमान खुर्शीद ने कहा कि मुस्लिम शौहरों को तीन तलाक की इजाजत देना पाप है. इस पाप की इजाजत शरीयत नहीं देती. शरीयत जो कि खुदा का फरमान है.

तीन तलाक है पाप

खुर्शीद ने कहा कि, 'जो बात खुदा की नजर में पाप है वो कानूनी हो ही नहीं सकती'. खुर्शीद का ये तर्क तीन तलाक के खिलाफ बिल्कुल सटीक बैठता है.

तीन तलाक ऐसी कुप्रथा है जिसकी शिकार दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र यानी भारत की मुस्लिम महिलाएं हो रही हैं. दूसरे देशों में ये प्रथा रोकी जा चुकी है. लेकिन पर्सनल लॉ के नाम पर ये जुल्म बरसों से ढाया जा रहा है. इसका न तो नैतिक आधार है, न कानूनी और न ही धार्मिक.

खुर्शीद की बात को यहां हम दोहराएं तो, 'तीन बार तलाक कहकर अपनी बीवियों को छोड़ देने वाले लोग न सिर्फ गैरकानूनी काम करते हैं. बल्कि वो इंसानियत के बुनियादी नियमों के खिलाफ भी जाते हैं. इतना ही नहीं ये भारत के संविधान के खिलाफ भी जाते हैं.

बात यहीं तक नहीं सीमित है. तीन बार तलाक कहकर बीवियों को छोड़ने वाले उस खुदा की नजर में भी पापी हैं जिसकी वो इबादत करते हैं'.

तीन तलाक है घिनौनी प्रथा 

मुस्लिम महिलाओं की तरफ से दलील देने पहुंचे राम जेठमलानी ने कहा कि, 'इंसान की तरफ से दिया गया कोई भी तर्क इस घिनौनी कुप्रथा को जायज नहीं ठहरा सकता'.

मगर अफसोस की बात ये है कि तीन तलाक का विरोध करने के बाद इस मसले के हल के लिए सलमान खुर्शीद ने जो फॉर्मूला सुझाया वो भी पुरातनपंथी और नाइंसाफी जैसा है.

हो सकता है कि इसे कुरान और इस्लामिक नियम कायदों के जरिए जायज ठहरा दिया जाए. मगर आज के दौर में खुर्शीद का सुझाव बिल्कुल भी जायज नहीं. सलमान खुर्शीद ने अदालत से दरख्वास्त की कि उसे तीन तलाक पर गौर करने की जरूरत ही नहीं.

अदालत उनका ये सुझाव मान ले कि अगर कोई शौहर बीवी को तीन बार तलाक, तलाक, तलाक कहकर तलाक देता भी है, तो उसे एक बार तलाक कहा ही माना जाए. इसमें दोनों पक्षों में बातचीत से सुलह की गुंजाइश रह जाएगी.

इस्लाम की नजर में ठीक खुर्शीद का नुस्खा

खुर्शीद ने कहा कि, 'जब कोई शख्स अपनी बीवी को तीन बार तलाक कहता है, तो उसके बाद बीवी के लिए इद्दत का वक्त शुरू हो जाता है. इस दौरान दोनों पक्षों के लोग आपसी बातचीत से विवाद सुलझाने की कोशिश करते हैं.

अगर मियां-बीवी में सुलह हो जाती है, तो वो तलाक को वापस ले सकता है. अगर सुलह नहीं होती तो वो दोबारा तीन तलाक कहता है. तब जाकर तलाक की प्रक्रिया पूरी होगी. इसके बाद सुलह की गुंजाइश खत्म मानी जाएगी'.

खुर्शीद का ये नुस्खा इस्लाम की नजर में ठीक ही लगता है. इस्लाम के बहुत से विद्वान कहते हैं कि कुरान किसी शख्स को अपनी बीवी को तीन बार तलाक कहकर तलाक देने की इजाजत देती है.

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शर्त ये है कि ये तलाक तीन महीने के अंतराल पर कहा जाए. इस दौरान महिला को इद्दत से गुजरना होता है. यानी वो जिस्मानी ताल्लुक नहीं बना सकती. इस दौरान दोनों के बीच सुलह की कोशिश होती है.

इद्दत के दौरान ये भी तय होता है कि महिला गर्भवती नहीं है. इस्लाम के विद्वानों के मुताबिक पहली बार तलाक कहने से रिश्ता खत्म नहीं होता.

लेकिन तलाक का ये जरिया, जिसमें महिलाओं को इद्दत से गुजरना होता है, वो महिलाओं की सुरक्षा के लिए था, न कि उनका हक मारने के लिए. अरब देशों में इस्लाम के पहले के दौर में मर्द सैकड़ों बार तलाक कहकर बीवियों से छुटकारा पाते थे. इस्लाम के विद्वानों के ताबिक कई बार तलाक देने के बाद शौहर अपनी बीवियों को फिर से उन्हें हासिल भी करने की कोशिश करते थे.

तलाक एकतरफा फैसला नहीं?

इस्लामिक रिसर्च फाउंडेशन इंटरनेशनल के विद्वान इब्राहिम बी. सैयद लिखते हैं, 'कुरान के मुताबिक तलाक इकतरफा और सनक में लिया गया फैसला नहीं है. कुरान के मुताबिक कोई शख्स सिर्फ दो बार तलाक दे सकता है. ये तलाक दो अलग-अलग मौकों पर दी जा सकती है.'

'इसके बाद या तो वो शख्स अपनी बीवी को माफ करके अपने साथ फिर से मोहब्बत के साथ रख सकता है. या फिर उसी लगाव से अपने से दूर करता है. इस्लाम से पहले के दौर में अरब देशो में लोग हजारों बार तलाक कहते थे.'

यानी तलाक की तलवार किसी महिला के सिर पर हमेशा लटकाए रखी जाती थी. कुरान से इस प्रथा को खत्म किया और सिर्फ दो बार तलाक देने की इजाजत दी है'.

वैध नहीं है खुर्शीद का फॉर्मूला

लेकिन सलमान खुर्शीद का फॉर्मूला वैध नहीं लगता. क्योंकि ये मुस्लिम महिलाओं की बराबरी के अधिकार के खिलाफ है. मुस्लिम महिलाएं इसी हक को पाने के लिए तो अदालत में लड़ाई लड़ रही हैं.

मर्दों को तलाक का अधिकार देकर महिलाओं से ज्यादती की ये प्रथा जारी रखने का तर्क वाजिब नहीं. खास तौर से तब और जब इस्लाम से पहले के दौरन में एक तलाक के जरिए महिलाओं के हक की सुरक्षा की व्यवस्था की गई थी.

एक तलाक का समर्थन करते हुए सलमान खुर्शीद को सिर्फ एक सवाल का जवाब देना चाहिए: क्या मुस्लिम महिलाएं भी इस प्रथा पर चलते हुए तलाक दे सकती हैं?

अगर सलमान खुर्शीद इस सवाल का जवाब ना में देते हैं, तो उनका ये नुस्खा वाहियात और पाप जैसा है. क्योंकि अल्लाह की नजर में औरत और मर्द दोनों बराबर हैं. इंसान का बनाया कोई भी कानून अगर इस बराबरी के खिलाफ है, तो वो गुनाह-ए-अज़ीम है.

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