S M L

मोदी सरकार के 3 साल: ये गवर्नमेंट मिनिमम तो कतई नहीं है

मोदी सरकार को भी ये कहना छोड़ देना चाहिए कि वो मिनिमम गवर्नमेंट, मैग्जिमम गवर्नेंस के फॉर्मूले पर चल रही है

Seetha | Published On: May 26, 2017 12:40 PM IST | Updated On: May 26, 2017 05:07 PM IST

0
मोदी सरकार के 3 साल: ये गवर्नमेंट मिनिमम तो कतई नहीं है

तीन साल पहले जब मोदी सरकार सत्ता में आई थी तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नारा दिया था: मिनिमम गवर्नमेंट, मैक्सिमम गवर्नेंस. यानि सरकार का दायरा घटेगा प्रशासन बेहतर बनाया जाएगा.

अब जब सरकार अपने तीन साल पूरे होने का जश्न मना रही है तो हम ये कह सकते हैं कि काम इस नारे के उलट हो रहा है. यानी सरकार का दखल और दायरा दोनों ही बढ़ता जा रहा है. मिनिमम गवर्नमेंट अब मैक्सिमम गवर्नमेंट बनती जा रही है.

हालांकि, सरकार के मंत्रियों का दावा इसके उलट है. मिसाल के तौर पर 24 मई को सरकार ने विदेशी निवेश प्रोत्साहन बोर्ड यानी FIPB को खत्म कर दिया. 25 साल पहले इस बोर्ड का गठन विदेशी निवेश को बढ़ावा देने के लिए किया गया था.

इससे चार दिन पहले, वाणिज्य और उद्योग मंत्री निर्मला सीतारमन ने एक प्रेस कांफ्रेंस में दावा किया कि उनके मंत्रालय ने सात हजार ऐसे छोटे, बड़े और औसत कदम उठाए हैं, जिससे भारत में कारोबार करना आसान हुआ है. FIPB का खात्मा मिनिमन गवर्नमेंट के नारे के लिए मिसाल के तौर पर पेश किया जा सकता है.

मगर निर्मला सीतारमन की प्रेस कांफ्रेंस से पांच दिन पहले उनके साथी कैबिनेट मंत्री रामविलास पासवान ने भी एक प्रेस कांफ्रेंस की थी. पासवान खाद्य और उपभोक्ता मामलों के मंत्री हैं. हाल ही में उनके मंत्रालय ने फरमान जारी किया है कि तमाम होटल और रेस्टुरेंट अपने मेन्यू में किसी भी व्यंजन की तादाद का जिक्र जरूर करें.

वो अपनी प्रेस कांफ्रेंस में इस आदेश को जायज ठहरा रहे थे. पासवान कह रहे थे कि आखिर इतनी सी बात पर इतना हंगामा क्यों बरपा है. प्रेस कांफ्रेंस के दौरान उन्होंने उपभोक्ता मामलों के सचिव को निर्देश दिया कि बोतलबंद पानी की बोतलों पर ही उसके बारे में जानकारी दर्ज कराने की व्यवस्था करें. अभी तो बोतल के बजाय उसके लेबल पर प्रोडक्ट के बारे में जानकारी रहती है.

ये भी पढ़ें: मोदी सरकार के 3 साल, कैसे काम करता है मोदी का जादू

तो, जहां मोदी सरकार की एक मंत्री सरकार का दखल कम से कमतर होने का दावा कर रही थीं वहीं दूसरे मंत्री मामूली सी बातों में भी सरकार का दखल बढ़ा रहे हैं. जब मोदी सरकार ने काम संभाला था तो इसमें 45 मंत्री थे. आज सरकार में 76 मंत्री हैं. जब सरकार बनी थी तो कम मंत्री बनाकर इसे मिनिमन गवर्नमेंट की दिशा में बड़ा कदम बताया गया था.

आज हट्टी-कट्टी कैबिनेट देखकर ये तो कहा जा सकता है कि छोटी सरकार का दावा पूरी तरह से नाकाम रहा है.

modi

टाटा समूह के प्रमुख रतन टाटा के साथ एक कार्यक्रम में पीएम मोदी

आंकड़ों से आगे

हम ये कहेंगे तो फौरन सरकार के समर्थक पूछेंगे कि आखिर जो 7 हजार कदम निर्मला सीतारमन के मंत्रालय ने उठाए हैं उनका क्या? मगर यहां उन्हें याद दिलाने की जरूरत है कि मिनिमम गवर्नमेंट का मतलब संख्या और कुछ आंकड़े भर नहीं होता. फिर चाहे वो सरकार में मंत्रियों की संख्या हो या फैसले लेने की प्रक्रिया में आई तेजी.

मिनिमम गवर्नमेंट का मतलब आम नागरिक की जिंदगी में सरकार के कम से कम दखल से होता है. हम इस बात पर लंबी-चौड़ी बहस कर सकते हैं कि आखिर मिनिमम गवर्नमेंट का मतलब क्या होता है.

लेकिन इस लेख में हम ये मान कर चलते हैं कि मिनिमम गवर्नमेंट का मतलब छोटी-छोटी बातों में सरकार की दखलंदाजी खत्म करना है. आम नागरिक की जिंदगी में सरकारी दखल कम करना है. हम इस परिभाषा को भी मानें तो जनता की भलाई की सरकार की जिम्मेदारी बढ़ जाती है. फिर भी, इतनी छोटी परिभाषा में कसने पर भी मोदी सरकार को मिनिमम गवर्नमेंट के मोर्चे पर सही नहीं कहा जा सकता.

हाल ही में सरकार के सबसे बड़े वकील यानी अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि लोगों का अपने शरीर पर पूरी तरह से अख्तियार नहीं. रोहतगी ने अदालत से कहा कि भले ही लोग सरकार की नजर से ओझल होना चाहेंगे मगर सरकार ऐसा होने नहीं देगी.

याद रखिए अटॉर्नी जनरल साहब अपराधियों की बात नहीं कर रहे थे. वो आम नागरिकों के बारे में देश की सबसे बड़ी अदालत के सामने ये बात कह रहे थे. वो उन लोगों के बारे में कह रहे थे जो आधार कार्ड नहीं बनवाना चाहते क्योंकि उन्हें सरकार की सब्सिडी की जरूरत नहीं.

modi

बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के साथ नरेंद्र मोदी

मिनिमम गवर्नमेंट के फॉर्मूले का सबसे बड़ा मजाक तो जीएसटी के लागू होने से बना है. मोदी सरकार इसे आजादी के बाद से सबसे बड़ा टैक्स सुधार बता रही है. केंद्रीय जीएसटी एक्ट के तहत मुनाफाखोरी के खिलाफ एक प्राधिकरण बनाने का प्रावधान है.

ये भी पढ़ें: मोदी सरकार के 3 साल, रोजगार के मोर्चे पर मोदी नॉनपर्फॉर्मिंग एसेट

वित्त-मंत्रालय के अफसर कहते हैं कि ये व्यवस्था तो सिर्फ मुनाफाखोरों को डराने के लिए की गई है. लेकिन जैसे-जैसे जीएसटी लागू करने की तारीख यानी एक जुलाई करीब आ रही है. वैसे-वैसे सरकार के चेतावनी वाले सुर सख्त होते जा रहे हैं. बयान आ रहे हैं कि टैक्स में रियायत का फायदा कारोबारी ग्राहक को दें. वरना सरकार जीएसटी एक्ट के तहत सख्त कदम उठाएगी.

दूसरे मंत्रियों को भी निजी क्षेत्र के काम में दखलंदाजी की लत सी लगी दिखती है. जैसे कि मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावडेकर. जावडेकर ने चेतावनी दी है कि निजी स्कूल मनमाने तरीके से फीस न बढ़ाएं. उन्होंने फीस बढ़ाने के गुजरात के कानून को देश भर में लागू करने में भी दिलचस्पी दिखाई है.

ग्राहक के हितों की रक्षा के नाम पर सरकार निजी क्षेत्र में लगातार दखल दे रही है. कभी रेस्टोरेंट को कहा जाता है कि वो मेन्यू में तादाद का भी जिक्र करें और कभी कहा जाता है कि वो जबरदस्ती सर्विस चार्ज न वसूलें. इससे तो भयावाह इंस्पेक्टर राज की वापसी का डर है.

भ्रष्टाचार को भी इस वजह से बढ़ावा मिलेगा. भले ही इनमें से कई प्रस्ताव लागू नहीं हुए. लेकिन इस तरह की बातों से फिक्र तो होती ही है. मिनिमम गवर्नमेंट इसे तो नहीं कहते.

कहीं का पैसा-कहीं और लगाया

आखिर खुद को मिनिमम गवर्नमेंट, मैग्जिमम गवर्नेंस की समर्थक कहने वाली सरकार कैसे मैटरनिटी बेनेफिट प्रोग्राम का पैसा बीमार एयर इंडिया को बचाने में खर्च कर सकती है? अब तक जिन इलाकों में उड़ान नहीं के बराबर होती थी, या फायदेमंद नहीं थी अब एयर इंडिया उन रूट्स पर भी विमान भेज रही है. ये सब जनता के पैसे की बर्बादी नहीं तो क्या है?

सरकार की उड़ान स्कीम के तहत टिकट के दाम भी अधिकतम 2500 रुपए हो सकते हैं. सड़कों से जनता का भला होता है. मगर उड़ान स्कीम से आखिर किसका क्या भला हो रहा है? जब सरकार के बड़े सुधारवादी मंत्री जयंत सिन्हा ये कहते हैं कि सरकार के पास एयर इंडिया को मुनाफे में लाने का फॉर्मूला है तो हमें मिनिमम गवर्नमेंट की उम्मीद ही छोड़ देनी चाहिए. आखिर सरकार ही सब काम करेगी, तो निजी क्षेत्र का क्या होगा?

बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह और अन्य नेतागण एंबुलेंस सेवा को हरी झंडी दिखाते हुए

बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह और अन्य नेतागण एंबुलेंस सेवा को हरी झंडी दिखाते हुए

ये तय है कि अर्थव्यवस्था में सरकार की दखलंदाजी 26 मई 2014 से नहीं शुरू हुई. न ही मोदी सरकार, माई-बाप सरकार की सबसे बड़ी मिसाल है. लेकिन इस सरकार को मिनिमम गवर्नमेंट के अपने वादे पर कायम रहना चाहिए. बहुत से ऐसे काम जो सरकार को नहीं करने चाहिए, वो आज भी बदस्तूर जारी हैं. सरकार को कारोबार की दुनिया में अपना दायरा समेटना चाहिए था. फिलहाल तो इसके कोई संकेत नहीं दिख रहे.

ये भी पढ़ें: अमित शाह का मोदी गुणगाण, 70 सालों में जो न हुआ वो 3 साल में हो गया

यूपीए सरकार के दौरान बहुत से अधिकारों वाले कानून बने थे. अब इनमें से शिक्षा के अधिकार के कानून, राइट टू फूड और राइट टू वर्क जैसे कानूनों में फेरबदल तो मुश्किल होगा. क्योंकि संसद में आंकड़े सरकार के हक में नहीं हैं. मगर मोदी सरकार तो इन कानूनों को ही पिछली सरकार से ज्यादा बेहतर तरीके से लागू करने का दावा करके गुरूर कर रही है.

योजना आयोग खत्म कर दिया गया. इसका बड़ा शोर मचाया गया. मगर उसकी जगह नीति आयोग बना दिया गया. इसमें ऐसे अर्थशास्त्री रखे गए हैं जिनकी काबिलियत पर सवाल नहीं उठाया जा सकता. लेकिन अगर आप हाल ही में नीति आयोग के तीन साल के एक्शन एजेंडा को पढ़ें तो इसमें सरकार की जिम्मेदारियों की लंबी चौड़ी लिस्ट है.

इसके बाद सात साल की रणनीति बनेगी और 15 साल का विज़न तैयार होगा. सबके जरिए सरकार विकास और लोगों का कल्याण करेगी. ये योजना आयोग की पंचवर्षीय परियोजना जैसा ही तो है.

सेंसर बोर्ड, सूचना और प्रसारण मंत्रालय, संस्कृति मंत्रालय और खेल मंत्रालय समेत तमाम सरकारी संस्थान आज देश की संस्कृति और सामाजिक विज्ञान के क्षेत्र में रिसर्च को बढ़ावा देने की बात कर रहे हैं. ये सब संस्थान, समाजवादी हिंदुस्तान के प्रतीक थे. ये उस दौर में भी सरकारी पैसे से ऐश करने का जरिया थे. आज भी इनके जरिए जनता के पैसे की बर्बादी की जा रही है.

सरकार संस्कृति को तो बढ़ावा दे रही है. मगर कानून व्यवस्था सुधारने पर उसका ध्यान कम है. उस पर जोर नहीं दिया जा रहा है. साफ है कि मोदी सरकार पुराने समाजवादी टाइप सरकार के ढांचे को नहीं खत्म करने जा रही है. अगर ये सरकार ऐसा करती तभी ये मिनिमम गवर्नमेंट के नुस्खे पर अमल का दावा कर सकती थी. ये संस्थान, मौजूदा सरकार की विचारधारा के प्रचार-प्रसार में मददगार जो हैं.

सरकार इन बातों के जवाब में कहती है: हमसे पहले की सरकारें भी तो इन संस्थानों के जरिए अपने जैसी विचारधारा के लोगों को सत्ता से जोड़ती थीं. ऐसे में अगर मौजूदा सरकार ये कर रही है तो गलत क्या है?

बिल्कुल सही बात है. मगर जनाब, पहले की सरकारें मिनिमम गवर्नमेंट का दावा भी नहीं करती थीं. न ही वो मैग्जिमम गवर्नेंस के नुस्खे का प्रचार करती फिरती थीं. क्या पिछली सरकारें ऐसा करती थीं? नहीं न...ऐसे में मोदी सरकार को भी ये कहना छोड़ देना चाहिए कि वो मिनिमम गवर्नमेंट, मैग्जिमम गवर्नेंस के फॉर्मूले पर चल रही है.

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi