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तीसरे दौर में दलित-पिछड़ों के वोटों की जंग

बीजेपी इस बार अगड़ों के अपने पारंपरिक वोट बैंक के साथ ही दलितों और अति पिछड़ों के बीच मोटी सेंध लगा रही है.

Anant Mittal Updated On: Feb 18, 2017 11:47 PM IST

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तीसरे दौर में दलित-पिछड़ों के वोटों की जंग

उत्तर प्रदेश में तीसरे दौर की चुनावी जंग में सत्ता के तीनों प्रमुख दावेदारों के नए राजनीतिक प्रयोग दांव पर हैं.

समाजवादी पार्टी के सामने इस दौर में साल 2012 में जीती 69 में से 55 सीट पर कब्जा बरकरार रखने की कड़ी चुनौती है. ऊपर से एसपी-कांग्रेस गठबंधन के बाद जोर और अधिक सीट जीतने पर है.

वैसे भी यादवी सल्तनत वाले इटावा, मैनपुरी, कन्नौज, उन्नाव, फरूखाबाद, हरदोई, बाराबंकी आदि जिलों में 19 फरवरी को ही वोट पड़ेंगे. सत्ता की दूसरी प्रबल दावेदार बीएसपी की बात करें तो अपने दलित-अति पिछड़े मतदाताओं का गढ़ बचाने में मायावती को पसीना बहाना पड़ रहा है.

वे अपनी सभाओं में इसीलिए डाॅ अंबेडकर के सिद्धांतों के प्रति वफादारी की कसम खाते नहीं अघा रहीं. सबसे ज्यादा 97 मुसलमानों की उम्मीदवारी के जरिए मायावती उन्हें हाथी पर सवार कराने में भी पूरा जोर लगा रही हैं.

मायावती के सामने इस बार दोहरी चुनौती है. दलितों-मुसलमानों को साथ लाने के बीहड़ प्रयोग के साथ उन्हें बीजेपी से बचने में भी पूरी ताकत लगानी पड़ रही है.

पिछड़ों-दलितों के वोट में सेंधमारी कर पाएगी बीजेपी?

BJP

बीजेपी इस बार अगड़ों के अपने पारंपरिक वोट बैंक के साथ ही दलितों और अति पिछड़ों के बीच मोटी सेंध लगा रही है. इसी रणनीति के तहत बीजेपी ने इन वर्गों के उम्मीदवारों को बड़ी संख्या में कमल छाप थमाया है.

पासी, कोरी, बाल्मीकियों और सोनकरों को पटाने के लिए बीजेपी साल भर से गंभीर कोशिश में जुटी है. उसने मोहनलालगंज से अपने सांसद कौशल किशोर को यूपी अनुसूचित जाति मोर्चे का मुखिया बनाकर उन्हें इसी मुहिम में झोंक रखा है. किशोर का पूरा जोर पासियों को पटाने पर है.

दलितों में जाटवों के बाद यूपी में सबसे अधिक तादाद पासियों की ही है. हाथी पर मुहर लगाने के बावजूद मायावती का जाटवों के मुकाबले इन्हें घास न डालना उन्हें सबसे ज्यादा सालता था.

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बीजेपी ने उनकी इसी दुखती रग को पकड़ा और हिंदू एकता के नाम पर उन्हें जोड़ा क्योंकि पासियों ने कभी इस्लाम का दामन नहीं थामा.

इसके अलावा पूरे प्रदेश में आरक्षित सीटों पर बीजेपी ने जो 75 उम्मीदवार खड़े किए हैं उनमें भी 23 टिकट पासियों को दिए हैं. पार्टी की शाहजहांपुर से सांसद कृष्णा राज को मोदी ने अपने साथ राज्यमंत्री बना ही रखा है.

बाकी आरक्षित सीटों पर भी वाल्मीकियों के अलावा 15 जाटवों, आठ धोबियों, आठ कोरियों और पांच खटीकों को उम्मीदवार बना कर बीजेपी ने दलितों में मजबूत किलेबंदी की है.

इस मुहिम को तेज करने के लिए बीजेपी ने कांशीराम के साथी आर के चौधरी के बीएसपी छोड़ते ही उन्हें अपने पाले में कर लिया. चौधरी खुद बीजेपी की साझेदारी में मोहनलालगंज से चुनाव लड़ रहे हैं.

इसके बावजूद गुजरात और हरियाणा में दलितों के प्रति सवर्णों की हिंसा की घटनाओं से बीजेपी के प्रति उपजा आक्रोश वोट डालते समय कितना निर्णायक होगा यह तो समय ही बताएगा.

इस शंका की वजह वे सामाजिक हालात हैं जिन्होंने दलितों को भी मुसलमानों की तरह बहुत देख-परख कर एकजुट मतदान करना सिखा दिया है.

बीजेपी ने दलितों के बीच पैठ गहरी करने का ठोस राजनीतिक प्रयोग करने के साथ ही इस दौर में पिछड़ों को भी बहुत तरजीह दी है. इसकी वजह पिछले चुनाव में कानपुर, लखनऊ आदि शहरी क्षेत्रों सहित आसपास भी बीजेपी का सूपड़ा साफ होना था.

एसपी-बीएसपी के बीच मुस्लिम वोटों की जंग

hindu-muslim voters 

वैसे भी मायावती को जहां दलितों के वोटों का पक्का भरोसा है. वहीं एसपी-कांग्रेस किलेबंदी के पीछे यादवों, वाल्मीकियों और मुसलमानों के एक वर्ग का भी पक्का समर्थन है.

सत्ता के ये दोनों ही दावेदार अब मुसलमानों के एकमुश्त समर्थन के लिए आपस में लड़ रहे हैं. इनके मुकाबले बीजेपी खासी कमजोर पड़ती थी. उसके साथ अगड़े आए तो मायावती ने 2007 में ब्राह्मणों को अपने पाले में कर लिया.

मायावती के हाथी स्मारक प्रेम से कुपित ब्राह्मणों और किसी हद तक वैश्यों ने भी 2012 में अपने वोटों का एसपी पर दांव लगा दिया. ऐसे में बीजेपी की स्थिति हास्यास्पद हो गई.

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इससे निपटने के लिए बीजेपी ने 2014 के आम चुनाव में नरेंद्र मोदी की अगुआई में हिंदू ध्रुवीकरण का दाव खेला. इसके साथ ही पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने राज्य में दीगर जातियों के उम्मीदवारों को कमल छाप थमाकर उनको अपने साथ जोड़ने की भी ठोस पहल की.

साल 2014 के चुनाव नतीजों का भी गहन विश्लेषण किया गया. जिन पिछड़ी और दलित जातियों ने अपने पारंपरिक सरपरस्तों का हाथ झटक कर मोदी को वोट दिया, उन्हें सूचीबद्ध किया गया. फिर उनका समर्थन पक्का करने के लिए पार्टी स्तर पर योजनाबद्ध मुहिम चलाई गई.

दलितों की आपसी होड़ से बीएसपी को नुकसान 

इसी विश्लेषण के सिलसिले में बड़ा खास तथ्य यह निकला कि आरक्षित सीटों पर बीएसपी उम्मीदवारों की जीत का प्रतिशत बहुत कम है. इसका कारण मायावती को दलितों के ठोस समर्थन के बावजूद दलितों की आपसी होड़ में बीएसपी का अन्य दलों के उम्मीदवारों से पिछड़ जाना है.

इन सीटों पर सवर्ण, बीएसपी के अलावा अन्य दलों के उम्मीदवारों को लामबंद होकर वोट डाल देते हैं. इसी वजह से साल 2012 में बीएसपी का आरक्षित सीटों के मुकाबले सामान्य सीटों को जीतने का प्रतिशत अधिक था.

बीएसपी ने सामान्य सीटों में से जहां 20 फीसद सीट जीतीं वहीं आरक्षित सीटों में से महज 17 फीसद ही जीत पाई.

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इसी प्रकार उसे 2012 में जहां 65 समान्य सीट मिलीं वहीं महज 15 आरक्षित सीट बीएसपी की झोली में आई. कांशीराम ने अस्सी के दशक में जब दलितों की राजनीतिक लामबंदी की मुहिम छेड़ी तो इस तथ्य से वो भी चौंक गए थे.

गहराई से देखने पर वे दलितों के बीच होड़ के नुकसान को भांप गए. इसीलिए उन्होंने दलितों के लिए आरक्षित सीटों पर लड़ने वाले अन्य दलों के उम्मीदवारों को चमचा कहना शुरू किया था.

उनके अनुसार यह चमचावाद दरअसल दलितों को राजनीतिक रूप में कमजोर करने के लिए अगड़ों का हथियार है. मायावती ने इस चमचावाद को 2007 में ब्राह्मणों से गठजोड़ करके जिस प्रकार भोथरा किया था. वैसी ही कोशिश इस बार वे मुसलमान-दलित गठजोड़ के जरिए कर रही हैं.

युवा वोटों के सहारे एसपी 

रही बात एसपी की तो उसे अपने यादव और अन्य पिछड़ी जातियों के वोट बैंक के साथ ही अखिलेश की छवि के बूते युवाओं को रिझाने का भी भरोसा है. इसके अलावा पिछड़ों में बीजेपी की और मुसलमानों में मायावती द्वारा घुसपैठ की कोशिश को अखिलेश ने कांग्रेस से हाथ मिलाकर संतुलित करने की कोशिश की है.

एसपी-कांग्रेस गठबंधन के बाद मुसलमानों के बीएसपी की ओर बढ़ते कदम ठिठके जरूर हैं मगर बीजेपीरोधी उम्मीदवार को वोट देने की कसौटी बरकरार है.

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मुसलमानों के इसी रुख ने इस तीसरे दौर के मतदान में एसपी-कांग्रेस और मायावती को अपने-अपने तईं आश्वस्त कर रखा है.

उधर बीजेपी भी अपने नए राजनीतिक प्रयोग और मोदी मैजिक की बदौलत इस दौर में अधिक सीट जीतने को उत्सुक है. इस दौर में राजधानी लखनऊ, कानपुर, कन्नौज, इटावा, फरूखाबाद सहित 12 जिलों के करीब सवा दो करोड़ मतदाता 826 उम्मीदवारों के लिए वोट डालेंगे.

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