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बिहार में नीतीश कुमार का कोई विकल्प नहीं है...

बिहार की जनता को लग रहा है कि नीतीश कुमार बने हुए हैं तो सुशासन की चाह भी बनी रहेगी

Chandan Srivastawa Chandan Srivastawa Updated On: Jul 27, 2017 08:54 PM IST

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बिहार में नीतीश कुमार का कोई विकल्प नहीं है...

बिहार में सत्ता बदल गई है, सत्ता का मुहावरा भी बदल गया है- यह सब हुआ है चौबीस घंटे से भी कम समय में लेकिन जनता को एकदम किनारे रखकर!

राजद और कांग्रेस बेशक कह रहे हैं कि ‘जनादेश का अपमान’ और ‘विश्वासघात’ हुआ है लेकिन अधिकतर जनता चुप है. वह ना तो बिहार के सत्ता-परिवर्तन पर ताली बजा रही है, ना ही कहीं छातीकूट हाय-हाय मची है.

पटना के मशहूर पुल पर राजद प्रायोजित एक जाम की खबर जरूर थोड़ी देर के लिए टेलीविजन के पर्दे पर आई और शायद उसका कोई रूप आगे होने वाली राजद की रैली में भी नजर आए. लेकिन, सामान्य तौर पर अभी तक बिहार की जनता ने ऐसा संकेत नहीं दिया है जो कोई कहे कि देखो सत्ता-परिवर्तन से लोग खुश हैं और मिठाइयां बांट रहे हैं या फिर अफसोस में हैं और जगह-जगह धरने पर बैठे हैं.

बिहार के सत्ता-परिवर्तन से जुड़ा असल सवाल भी यही है कि अगर वाकई वहां जनादेश का अपमान या फिर विश्वासघात हुआ है तो फिर इसे लेकर सूबे की जनता में कोई नैतिक आक्रोश क्यों नहीं दिखता ?

अचरज की बात यह भी है कि ज्यादातर विश्लेषणों में इसे बिहार के सियासी घटनाक्रम के मुख्य सवाल के रूप में स्वीकार नहीं किया गया है. विश्लेषक यह मानकर चल रहे हैं लोकतांत्रिक राजनीति सिर्फ पार्टियों के आपसी शह-मात का खेल है, उसमें जनता की राय सिर्फ चुनावों में मायने रखती है. सो ज्यादतर विश्लेषणों में पार्टियों और उनके नेताओं की कथनी-करनी पर जोर है, लोगों की राय जानने पर नहीं.

एक सरीखे दो विश्लेषण

Nitish Kumar

बिहार के सियासी घटनाक्रम को कोई 'भूचाल' के नाम से याद कर रहा है तो कोई इसे नजर को बांध लेने वाले टेलीविजनी सीरियल से ज्यादा हैरतअंगेज बता रहा है. मतलब, ज्यादातर विश्लेषक मानकर चल रहे हैं कि बिहार की सियासत में कुछ ऐसा हुआ है जो अपनी चाल और चरित्र में अप्रत्याशित है.

बेशक बिहार का घटनाक्रम अपनी चाल में अप्रत्याशित है- आखिर चौबीस घंटे से भी कम समय में एक गठबंधन(राजद, जदयू और कांग्रेस) सत्ता से बाहर हो गया है और दूसरा गठबंधन (जदयू और बीजेपी) सत्ता के सिंहासन पर आ जमा है.

सत्ताधारी गठबंधन का बदलना बिहार की सरकार के चरित्र में भी अप्रत्याशित बदलाव का संकेत है. बिहार की सरकार का मुहावरा बदल गया है. पहले यह मुहावरा राजद तय कर रहा था. राजद के मुस्लिम-यादव मतदाता के समीकरण के अनुरुप यह मुहावरा धर्मनिरपेक्षता और सामाजिक न्याय का था.

नई सरकार में यह मुहावरा फिर से नीतीश कुमार और सुशील मोदी की जोड़ी तय करेगी. जाहिर है, नया मुहावरा नीतीश की छवि के अनुकूल ‘सुशासन’ मतलब भ्रष्टाचार विरोध और विकास का होगा.

बिहार के सियासी घटनाक्रम को अप्रत्याशित बताने वाले विश्लेषणों के बरक्स टिप्पणीकारों का एक समूह ऐसा भी है जो घटना को उसके ऐतिहासिक तफ्सील और निरंतरता में देख रहा है.

ऐसे विश्लेषणों में कहा जा रहा है कि बिहार में हुआ सत्ता परिवर्तन कत्तई अप्रत्याशित नहीं क्योंकि एक तो नीतीश कुमार और बीजेपी का साथ डेढ़ दशक से ज्यादा पुराना है. सो, सुशासन के मुद्दे पर जदयू और बीजेपी के नेतृत्व में वैचारिक एका लंबे समय से कायम रहा है.

नीतीश कुमार के इस्तीफे के तुरंत बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ट्वीट इसी बात की मुनादी है.

दूसरे, इस साल की शुरुआत में ही इस बात के संकेत मिल गए थे कि नीतीश कुमार और बीजेपी के नेतृत्व के बीच पुरानी मित्रता के अंकुर नए सिरे से उगाने की कोशिश शुरू हो चुकी है. इस साल जनवरी में गुरु गोविंद सिंह की 350 वीं जयंती पर पटना में महोत्सव का आयोजन हुआ तो मंच पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक-दूसरे की भरपूर सराहना की और इशारो-इशारों में जता दिया कि नीतीश को आगे चलकर ‘कमल’ में रंग भरना है.

नोटबंदी और सर्जिकल स्ट्राइक की प्रशंसा इस मैत्री का अगला कदम था और मैत्री की परिणति अब नए गठबंधन और नई सरकार के रूप में नजर आ रही है जिसके लिए मंच केंद्र के इशारे पर सुशील मोदी ने तैयार किया. लालू यादव और उनके परिवार पर सुनियोजित ढंग से भ्रष्टाचार के आरोप लगाए और नीतीश को मौका मिला कि वे अपनी बेदाग छवि की ओट करके 20 माह पुराने महागठबंधन से अपने को अलग कर सकें.

‘भूचाल’ बनाम स्वाभाविक परिणति के खांचे में सुझाए गए ये दोनों विश्लेषण यह बात तो बताते हैं कि बिहार में सत्ता-परिवर्तन क्योंकर संभव हुआ लेकिन इस चिंता से दूर हैं कि सूबे में हुए सत्ता-परिवर्तन पर जनता क्यों मौन है?

जनता क्यों मौन है ?

NITISH-KUMAR

बिहार के सत्ता-परिवर्तन के बारे में चाहे आप इस नजरिए से सोचें कि नीतीश के पाला बदल लेने से अब विपक्ष का विचार पहले से भी ज्यादा कमजोर हो चुका है या फिर इस नजरिए से कि बीजेपी ने 2019 के चुनावों को देखते हुए यूपी की तरह बिहार में भी अलग-अलग जातियों के चुनाव-जिताऊ समीकरण तैयार करने में सफलता हासिल की है, लेकिन बात घूम-फिर कर इस सवाल पर टिक जाती है कि केंद्र की सत्ता के लिहाज से अत्यंत निर्णायक इन दो राज्यों में सामाजिक न्याय की राजनीति का क्या हुआ ?

बरसों तक बिहार की राजनीति का वर्चस्वशाली मुहावरा लालू यादव की राजनीति ने तय किया. इस मुहावरे की धुरी था मंझोली जातियों का सशक्तीकरण और अल्पसंख्यकों की हिफाजत. इस मुहावरे के दम पर लालू-राबड़ी राज तकरीबन दो दशक तक चला और इस दरम्यान यूपी की तरह बिहार में भी ओबीसी तबके का एक दमदार मध्यवर्ग उभरा.

यह मध्यवर्ग अपनी पहचान को लेकर जितना मुखर था अपने आर्थिक और राजनीतिक अवसरों के लिए उतना ही सचेत भी. यह मध्यवर्ग ‘अराजक बिहार’ और ‘जंगलराज’ के अपमानजनक ठप्पे से अपने को उबारना चाहता था, साथ ही उसे नए खुलते अवसरों के बाजार में भरपूर भागीदारी चाहिए थी.

बिहार के मध्यवर्ग की चाह के इन दोनों सिरों को एक में नत्थी करके नीतीश कुमार ने उसे ‘सुशासन’ का आकर्षक नाम दिया. बिहार के मध्यवर्ग को नए सिरे से एक नैतिक उद्देश्य हासिल हुआ कि भ्रष्टाचार और अपराध से लड़ना है और ऐसा करते हुए अपने लिए सामाजिक-राजनीतिक सशक्तीकरण के रास्ते तैयार करने हैं.

मुख्यमंत्री के रूप में नीतीश कुमार के पिछले दो कार्यकाल मध्यवर्ग की इसी चाहत को जगाए रखने और एक हदतक पूरा करने की कोशिश करता दिखने में बीता है. नीतीश की कामयाबी कहिए कि बिहार के ओबीसी बहुल मध्यवर्ग की चाह से उनकी सुशासनी छवि एकमेक हो गई है.

नीतीश जानते हैं, बीते सालों में अर्जित की गई यह छवि ही उनकी असल कमाई है और इस कमाई की काट बिहार में ना तो बीजेपी के पास है ना ही लालू यादव के पास. लालू यादव का सामाजिक सशक्तीकरण और अल्पसंख्यकों की हिफाजत का मुहावरा अपनी ऐतिहासिक भूमिका पूरा कर चुका है, उसकी जगह ‘सुशासन’ की चाह ने ले ली है.

और जहां तक बीजेपी का सवाल है, बिहार में लगातार नीतीश के साथ होने के कारण उसने अपने को ‘सुशासन’ के मुहावरे के साथ दिखाने में तो कामयाबी हासिल की है लेकिन ‘सुशासन’ का अपना कोई संस्करण तैयार करने में उसे कामयाबी नहीं मिली. जब भी अवसर मिला सत्ता के शीर्ष पर हमेशा नीतीश रहे, बीजेपी का दर्जा नंबर दो का रहा.

बिहार में ‘सुशासन’ के साथ नत्थी नीतीश की छवि की यही अनिवार्यता है जो बिहार की जनता ना किसी अफसोस में है ना खुशी में ! उसे लग रहा है, सरकार बदली है तो बदले कोई मुख्यमंत्री थोड़े ही बदला है. वह रहेगा तो सुशासन की उसकी चाह भी पूरी होगी.

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