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तरुण विजय सोच बदलिए, बड़ा उपकार होगा!

बीजेपी लीडर तरुण विजय ने कहा था, भारतीयों को नस्लवादी कहना गलत है क्योंकि वे दक्षिण भारतीयों के साथ रहते हैं और कुछ नहीं कहते!

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Bikram Vohra Updated On: Apr 08, 2017 07:08 PM IST

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तरुण विजय सोच बदलिए, बड़ा उपकार होगा!

ये विचार पूर्वाग्रह में अचानक नहीं आए हैं. यह सोच की पैटर्न का एक हिस्सा है. यह एक सोच का हिस्सा है. भरतीयों के बारे में बीजेपी नेता तरुण विजय का बयान नस्लवाद से प्रेरित है.

देखिए, हम सब दक्षिण भारतीयों के साथ रहते हैं. क्या हम उन पर दया नहीं दिखा रहे हैं. ऐसी टिप्पणियां उस शख्स पर केवल अभियोग नहीं है. यह बयान शख्स को पार्टी से बाहर निकालने के लिए पर्याप्त कदाचार भी है.

पार्टी ऐसे व्यक्ति के साथ क्यों जुड़ी रहना चाहती है ?

क्या है मानसिकता?

किसी के लिए यह उनका भूगोल है. मगर, दक्षिण भारतीयों से भारतीय अलग कैसे हैं ? क्या वे देश में रहने वाली एक प्रकार की उप-प्रजाति की तरह हैं.

जिन्हें हम कथित रूप से आर्यन माने जाने वाले उत्तर भारतीयों की कृपा, दया और शिष्टता के रहमोकरम पर निर्भर हैं. गोरी प्रजाति के प्रभुत्व की खुशी के ये गुलाम हैं, क्या यह नात्चेज़ है, मिसिसीपी है ?

और फिर यह रूढ़िवादी 'नेता' उन्हें काले लोगों के रूप में ऐसे वर्णित करता है, मानों उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, पंजाब, हरियाणा और बंगाल के हर लोग त्वचा की खाल को गोरे रंग देने वाले किसी क्रीम में स्नान करता हो.

Tarun Vijay

ऐसा होता तो क्या होता?

कल्पना कीजिए कि यह शख्स किसी पहाड़ पर खड़ा हो और कोई पुस्तक पढ़ते हुए कह रहा हो, 'सुनो, सुनो, मैं अमेरिका के दक्षिण हिस्से में दास-स्वामी की तरह ही नस्लवादी हूं. रेड इंडियन के गोरों की तरह मेरा दिमाग भी गंदा और बदसूरत है'

अपने विचारों को और धारदार बनाते हुए वह सोचता हो कि वह अपने ही पैर में खुद गोली मारने का बेहतर कार्य कर सकता था.

यही वह बात है, जिसपर विचार करने की जरूरत है . बीजेपी की अग्रिम पंक्ति के इस नेता की पार्टी एकता और एकता की भावना तथा पार्टी के अति विकसित तथा अनौचित्य की अभिव्यक्ति क्या इसी तरह की है.

अपने दिमाग में जहरीले कचरे को फैलाने के बाद वह साफ तौर पर माफी मांगने का प्रयास करता है.

मगर किसके लिए ? यहां तक कि किसी का बात-बात में माफी मांग लेना भी उसे अंदर से बीमार बनाता है.

कैसी है तरुण विजय की सोच?

आखिर श्रीमान विजय उसे कम से कम स्वीकार करते हुए आप किस तरह की सोच दिखाना चाहते हैं ?

ऐसे लोगों के खिलाफ उनके बोलने के लिए उचित कार्रवाई कब की जाएगी ? यह जो कुछ चौंकाने वाला है, सही मायने में विचारों के साथ सरासर बेईमानी है.

दक्षिण भारतीयों के अलावा नॉर्थ ईस्ट के लोगों को भी नस्लवादी टिप्पणियां झेलनी पड़ती हैं

दक्षिण भारतीयों के अलावा नॉर्थ ईस्ट के लोगों को भी नस्लवादी टिप्पणियां झेलनी पड़ती हैं

 

विजय इंकार करते हैं कि ग्रेटर नोएडा में अफ्रीकी छात्रों पर किया गया हमला नस्लवादी था तथा इसका ठोस प्रमाण दक्षिण भारतीयों के प्रति हमारी सहिष्णुता है, क्योंकि दक्षिण भारतीय भी तो काले हैं.

निश्चित रूप से, कोई शक नहीं. सभी चोटिल और घायल अफ्रीकियों को यह कहते हुए कोई देख सकता है.

ठीक, बिल्कुल ठीक, आपकी बात समझ में आ गयी, यह न्याय में होने वाली सिर्फ एक चूक ही तो है.

आप अपने अश्वेत लोगों के प्रति सख्त हैं, इसलिए आपका गुणा-गणित तो यही कहता है कि आप हमारे प्रति भी सख्ती ही दिखायेंगे.

और हम तो सोच रहे थे कि यह नस्लवाद है, हमें ट्रैक पर वापस लाने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद.

यह रवैया कुछ और कहता है?

अगर उन्होंने कहा होता कि चलो हम उजड्ड ही बन जाते हैं, तो आपको क्या लगता है कि दक्षिण को लेकर हमारा यह रवैया ‘बड़े भाई’ वाला नहीं है.

और हां काले रंग के लोग क्या पूरे भारत में कुरूपता के शिकार हैं ? यह बेहद अपमानजनक है कि हम ऐसा सोचें.

South Indian Girl Child

(फोटो: रॉयटर्स)

अब समय आ गया है कि इस तरह की सोच पर लगाम लगायी जाए. मैं शायद वह पहला व्यक्ति होता, जो उनसे हाथ मिलाते हुए कहता, धन्यवाद महाशय, इस तरह इतना ही कहना पर्याप्त है. लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया.

उन्होंने राजनीतिक रूप से इतना अपमानजनक, चिंताजनक तथा समझ की कमी के साथ इतने ओछे रूप में कुछ ऐसा कहा कि जब तक हम भारतीय जागने और समझने के लिए तैयार नहीं होते कि हम एक विशाल नस्लीय, जातिवाद, धार्मिक विभाजन का सामना कर रहे हैं.

तबतक शायद इसी तरह की सोच सामने आती रहेगी. जबतक हम चट्टान का मैदानीकरण करेंगे. तबतक इस बात को समझने में काफी विलंब हो चुका होगा कि हमारे देश में घृणा और तिरस्कार की बयार किस तरह दाखिल हो चुकी है.

तरुण विजय, हमें आपसे कुछ कहना है. मैं पंजाब से हूं. मेरी पत्नी केरल की रहने वाली हैं.

सोच बदलने की जरूरत?

वो पिछले 37 सालों से मेरे साथ विवाहित जीवन जी रही हैं. ऐसा नहीं है कि मेरे साथ मेरे घर में रहने के लिए उसे मेरी किसी अनुमति की जरूरत है.

न वह मेरे लिए एक बेवकूफ साथी है या मेरे साथ रहते हुए उस पर मेरा कोई उपकार है. न ही मेरे लाभ के लिए वह किसी दिये गये उपहार की तरह है.

इस मूर्खता को समझाने की कोशिश में भी आपको पहचानते हुए अपात्र ही घोषित किया गया है.

मुझे नहीं मालूम कि हम उन खत्म हो चुके कारणों को बचाने की कोशिश ही क्यों करते हैं, जो घृणा और संकीर्णता किसी जहरीले खरपतवार की तरह बढ़ती ही जा रही है.

हम सब इसके बारे में इसलिए लिखते हैं, क्योंकि हम इसे जड़ से मिटाने की नैतिक चाहत रखते हैं.

 

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