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राज्यसभा में सुषमा ने खोली विपक्ष के बेमेल गठबंधन की पोल

विपक्ष ने सरकार की विदेश नीति पर साझा हमला तो शुरू किया लेकिन उसने अपने ही खिलाफ अनगिनत आत्मघाती गोल कर डाले

Sreemoy Talukdar Updated On: Aug 05, 2017 06:13 PM IST

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राज्यसभा में सुषमा ने खोली विपक्ष के बेमेल गठबंधन की पोल

बीजेपी के बढ़ते वर्चस्व और विपक्ष के लिए कठिन परिस्थिति की वजह को समझना हो, तो हमें राज्यसभा में गुरुवार की कार्यवाही से पीछे जाने की जरूरत नहीं.

विपक्ष ने सरकार की विदेश नीति पर एक साथ साझा हमला तो शुरू किया, लेकिन उसने अपने ही खिलाफ अनगिनत आत्मघाती गोल कर डाले. विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने आसानी से उनके तर्कों की काट ढूंढ़ निकाली और एक बार फिर अपनी वाकपटुता का कुशल प्रदर्शन किया.

ऐसा नहीं है कि सरकार की आलोचना के लिए वैध आधार न हों, लेकिन उनकी असंवेदनशीलता चौंकाने वाली है. ऐसा लगा मानो विपक्षी नेता पवनचक्की से छेड़छाड़ कर रहे हों या वे टैंक के सामने लकड़ी की तख्तियां लिए खड़े योद्धा हों.

अयोग्य विपक्ष

कहने का मतलब यह है कि वे उनकी भूमिका सिर्फ जवाबी एजेंडा और सरकार के अंध विरोध तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि सरकार के खिलाफ अपना स्वतंत्र एजेंडा बनाना चाहिए. लेकिन, यह विपक्ष के वर्तमान नेताओं के बूते से बाहर की बात लगती है.

दूरदर्शिता के अभाव में और देशभक्ति पर बहस के दौरान हमेशा गलत तरफ खड़ा रहने की विचित्र आदत के कारण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विरोधी लगातार विपक्ष का दायरा छोटा करते चले जा रहे हैं. ऐसा करते हुए ये भारत के लोकतांत्रिक व्यवस्था को जबरदस्त आघात पहुंचा रहे हैं.

New Delhi: NDA's presidential candidate Ram Nath Kovind along with Prime Minister Narendra Modi, BJP chief Amit Shah and senior leader LK Advani at NDA meeting in New Delhi on Sunday. PTI Photo by Kamal Singh(PTI7_16_2017_000189B)

अगर मोदी के नेतृत्व वाली बीजेपी और उनके विश्वस्त जनरल अमित शाह असाधारण रूप से एक छत्र राज चला रहे हैं और खौफनाक तरीके से ताकतवर होते चले जा रहे हैं, तो यह दोनों नेताओं की कुशाग्रता के साथ-साथ विपक्ष की अयोग्यता को भी दर्शाता है.

भारतीय दावे वाले क्षेत्र से होकर गुजरने वाले वन बेल्ट वन रोड, (OBOR, जिसे BRI भी कहते हैं) को शुरू करने पर हुए चीनी समारोह में भारत को शामिल होने का सुझाव देने के लिए भी असाधारण हौसला चाहिए. OBOR वास्तव में संप्रभुत्ता का मसला है.

सुषमा ने खोली कांग्रेस की पोल

भारतीय विदेश मंत्री को जो बात चुभी और नागवार गुजरी, वह थी कांग्रेस का सरकार द्वारा बीआरआई कॉनक्लेव के बहिष्कार करने के फैसला का विरोध. कोई भी भारतीय सरकार यही फैसला करती, लेकिन कांग्रेस ने इस विषय पर सरकार का विरोध जारी रखा.

पीटीआई रिपोर्ट के मुताबिक सुषमा स्वराज ने कहा, 'आप जानते हैं कि OBOR कहां से गुजरता है? और आप ऐसे सवाल कर रहे हैं? यह राष्ट्रीय भावना का सवाल है. आप मुख्य विपक्षी दल हैं, आपको जिम्मेदारी से बोलना चाहिए.'

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सुषमा स्वराज के सवालों का विपक्ष के नेता गुलाम नबी आज़ाद ने तत्परता से जवाब दिया. उन्होंने दावा किया कि उनके सहयोगी राजीव शुक्ला ने जो बातें OBOR के बारे में कही हैं, वे उनकी ‘व्यक्तिगत राय’ है, पार्टी की नहीं.

इसके बाद स्वराज ने कटाक्ष करते हुए कहा कि इस मामले में कांग्रेस के आंतरिक लोकतंत्र की पैठ इतनी गहरी है कि हर कोई पार्टी लाइन से स्वतंत्र होकर बोल  रहा है. यह प्रकरण कांग्रेस के भीतर कड़वाहट का उदाहरण बन गया.

अगर चीन के साथ विवाद न भी होता फिर भी उस बैठक में शामिल होना गिलगिट-बाल्टिस्तान पर भारतीय दावे के रुख के उलट होता. सवाल ये नहीं है कि इस प्रोजेक्ट से आर्थिक तौर पर हमें क्या फायदा होने जा रहा है बल्कि यह पाक अधिकृत कश्मीर पर पाकिस्तान के दावे को चतुराई से मान्यता दिलाने की कोशिश है. यह बात कुछ हजम नहीं होती कि कांग्रेस यह सब समझ नहीं सकी और बीजेपी को घात लगाकर हमला करने का मौका दिया.

New Delhi: BJP president Amit Shah with External Affairs Minister Sushma Swaraj, and Union Law and IT Minister Ravi Shankar Prasad among others at the BJP parliamentary party meeting, in New Delhi on Tuesday. PTI Photo by Shahbaz Khan (PTI8_1_2017_000052B)

सुषमा ने लपका मौका

यह घटना कांग्रेस के प्रेसीडेंट इन वेटिंग और पार्टी उपाध्यक्ष राहुल गांधी की ओर हमारा ध्यान खींचता है. पहले चीनी राजनयिक लू झाओ हुई से मुलाकात से इनकार, और फिर इसे ‘फेक न्यूज’ बताने के बाद कांग्रेस ने माना कि यह मीटिंग हुई थी. पार्टी ने इसे ‘सौहार्द्र मुलाकात’ बताया. गांधी ने अपने कदम को सही ठहराने के लिए एक के बाद एक कई ट्वीट किए. इनमें से यह एक था.

तार्किक तौर पर गांधी का दावा सही था कि महत्वपूर्ण मुद्दों की जानकारी रखना उनका काम है और उन्होंने चीनी राजनयिक से मिलकर कुछ भी गलत नहीं किया है, जो सामान्य प्रोटोकॉल है. लेकिन इतने संवेदनशील मसले पर सदन से जानकारी लेने के बजाए पहले लू से मिलने के कदम पर बहस में राहुल गांधी चारों खाने चित हो गए क्योंकि यह भारत की संप्रभुत्ता और सुरक्षा से जुड़ा मामला था. उम्मीद के मुताबिक स्वराज ने इसे भुनाया. वह फुल टॉस गेंद पर चूकने वाली नहीं थीं.

गुरुवार को राज्यसभा में कांग्रेस नेता आनंद शर्मा को भी सुषमा ने चुप कर दिया. 1962 में अटल बिहारी वाजपेयी के लिखित आग्रह पर जवाहर लाल नेहरू द्वारा संसद सत्र बुलाने की बात कहते हुए सुषमा स्वराज ने कहा, 'मुझे दुख होता है कि सीमा पर गतिरोध को लेकर विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी के नेता ने भारतीय नेतृत्व के बजाए सबसे पहले चीन के राजनयिक से मिलना जरूरी समझा.'

उन्होंने आगे कहा, 'मैं कैसे उम्मीद करूं कि विपक्ष (सत्र बुलाने की) वही मांग अब करेगा.'

कांग्रेस अपनी लापरवाही से खो रही है राजनीतिक जमीन

Lucknow: **COMBO** Senior Congress leader Ghulam Nabi Azad and UP Congress President Raj Babar during a press conference and released a booklet titled 'Rashtriya Suraksha Par Aanch' in Lucknow on Saturday. PTI Photo(PTI6_3_2017_000281B)

यह माने-मतलब निकालने या गलती ढूंढ़ने जैसी बात नहीं, बल्कि एक पूरा प्रकरण है कि किस तरह भारतीय राष्ट्रवाद का अलख जगाने वाली कांग्रेस, जिसका इतना शानदार अतीत रहा है, अब बीजेपी के हाथों राजनीतिक जमीन खो रही है. ऐसे मुद्दों पर राष्ट्रीय सहमति होती है और इससे सार्वजनिक राय बनती है. इससे यह भी पता चलता है कि कांग्रेस नेतृत्व लगातार बड़ी भूलों के कारण इसके प्रतिकूल चुनावी प्रभाव को नहीं समझ पा रही है.

हालांकि अकेले कांग्रेस इसके लिए दोषी नहीं है. नीतीश कुमार पर आरोप लगाना और उनके लिए ‘कलाबाजी’ जैसे अपमानजनक विशेषण देना आसान है. लेकिन, एनडीए खेमे में जाने से पहले बिहार के मुख्यमंत्री ने विपक्ष की रणनीति में लापरवाही की तरफ इशारे किए थे, जिसे स्वीकार करना बहुत मुश्किल है.

मोदी के साथ जुड़ने से पहले उन्होंने कहा था, 'विपक्ष का कर्त्तव्य है कि सरकार का विरोध करे...केवल जवाबी एजेंडा के बजाए हमारे पास देश के हित में वैकल्पिक एजेंडा होना चाहिए.'

एजेंडे की कमी ने प्रतिकूल स्थिति पैदा की. बीजेपी 18 राज्यों में सत्तासीन है और जल्द ही हमारे पास एक ही दल से प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति भी होंगे. लेकिन अब भी इस पार्टी में अपने विस्तार और प्रभुत्व के लिए कुछ नया करने की भूख खत्म नहीं हुई है.

चमत्कार की उम्मीद में कांग्रेस

Rahul Gandhi hoisting flag at TNCC office

इसके विपरीत विपक्ष में विचित्र विरक्ति भाव है और वह शातिराना प्रतिक्रियाओं के दुष्चक्र में फंस गया है. उदाहरण के लिए गुजरात में बीजेपी के बड़े नेताओं के खिलाफ जबरदस्त एंटी इनकंबेसी है लेकिन उल्टे कांग्रेस के भीतर ही एनडीए के समर्थन में क्रॉस वोटिंग हो रही है.

कांग्रेस ने अपने शीर्ष नेतृत्व को खो दिया है और पार्टी अपने विधायकों के साथ बोरिया-बिस्तर समेट कर कर्नाटक के रिजोर्ट में जाने को मजबूर हो गई. पार्टी इसे ‘प्रतिशोध’ बता रही है लेकिन इससे उसके आत्मविश्वास का भी पता चलता है. मतदाताओं में संदेश जा रहा है कि कांग्रेस को अपने विधायकों पर ही भरोसा नहीं है. गोवा और बिहार में भी ऐसी ही बगावत कांग्रेस झेल रही है.

सत्ता के सिद्धांत को परिभाषित करने के कुछ स्वयंसिद्ध तथ्य होते हैं. कुछ भी स्थायी नहीं है. कांग्रेस राज में संभवत: अहमद पटेल का सबसे ताकतवर कद हुआ करता था, लेकिन अब वे इससे बाहर आ चुके हैं.

शायद यही वजह है कि किसानों और बेरोजगार नौजवानों में व्यापक असंतोष पर सक्रिय होने के बजाए कांग्रेस के मंत्री अंग्रेजी अखबारों में शब्दों की जुगाली कर रहे हैं और उम्मीद कर रहे हैं कि चमत्कार हो जाएगा. मगर, बुद्धिमानी इसी में है कि इस पर कोई दांव नहीं लगाया जाए.

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