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किसानों के आंदोलन को अपने उपवास से कैसे रोक पाएंगे शिवराज?

शिवराज की 'उपवास पॉलिटिक्स' पर सवाल खड़े हो रहे हैं

Amitesh Amitesh Updated On: Jun 10, 2017 09:53 PM IST

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किसानों के आंदोलन को अपने उपवास से कैसे रोक पाएंगे शिवराज?

मध्यप्रदेश में शुरू हुए किसान आंदोलन की आग की लपटों ने प्रदेश के साथ-साथ दिल्ली के तख्त को भी हिला कर रख दिया है. किसान लगातार सड़कों पर हैं और सरकार परेशान है.

अब प्रदेश सरकार के मुखिया ने खुद किसानों के इस आंदोलन की हवा निकालने की कोशिश की है. लेकिन, किसानों के बीच उनके दुख-दर्द को बांटने के बजाए शिवराज सिंह चौहान दशहरा ग्राउंड में उपवास कर रहे हैं.

घेरे में उपवास 

उपवास हो रहा है शांति के लिए, आंदोलन की आग को शांत करने के लिए. लेकिन, यह उपवास सवाल भी खड़े कर रहा है. सवाल इसलिए भी उठ रहे हैं क्योंकि प्रदेश के मुख्यमंत्री और किसानों के मसीहा के रूप में अपनी छवि बनाकर रखने वाले शिवराज आखिर अब किसानों के बीच जाने से क्यों कतरा रहे हैं.

क्या शिवराज किसानों से रू-ब-रू होने का साहस नहीं जुटा पा रहे हैं या फिर उपवास के जरिए किसान आंदोलन से लोगों का ध्यान भटकाने की कोशिश कर रहे हैं. वजह जो भी हो लेकिन, शिवराज की 'उपवास पॉलिटिक्स' पर सवाल खड़े हो रहे हैं.

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दरअसल, शिवराज सिंह चौहान इस वक्त चौतरफा घिरे हुए हैं. पहले से ही प्रदेश के भीतर पार्टी के भीतर की चुनौतियों से उन्हें दो-चार होना पड़ रहा है. रह-रह कर उनके दिल्ली शिफ्ट करने को लेकर भी कयास लगाए जाते रहे हैं. अब व्यापम घोटाले की आंच से बाहर निकल ही रहे थे कि उनके ऊपर किसान आंदोलन एक कहर बनकर टूट पड़ा.

भोपाल में कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने मंदसौर हिंसा के विरोध में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का पुतला फूंका (फोटो: पीटीआई)

भोपाल में कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने मंदसौर हिंसा के विरोध में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का पुतला फूंका (फोटो: पीटीआई)

क्या उपवास से सुधरेगी शिवराज की छवि?

अब किसान संगठनों, विरोधियों और पार्टी के भीतर से भी दबी जुबान से ही सही उठ रही आवाजों से निपटना उनके लिए मुश्किल होगा. लिहाजा शिवराज सिंह चौहान ने सबसे निपटने के लिए उपवास करने का फैसला किया है.

शिवराज सिंह चौहान के मुख्यमंत्री बनने के बाद से ही मध्यप्रदेश के भीतर कृषि की हालात और कृषि विकास दर में काफी सुधार हुआ है. बीजेपी इस मुद्दे को लगातार उठाती रही है. शिवराज सिंह चौहान की छवि भी किसानों के हितैषी वाली रही है. हर मंच से वो किसानों के हित की बात करते हैं.

लेकिन, अब किसान आंदोलन के उग्र होने और पुलिस फायरिंग में किसानों की मौत के बाद वो किसानों के सामने जाने का साहस नहीं जुटा पा रहे हैं. दूसरी तरफ, शिवराज सिंह चौहान इस बात से भी चिंतित हैं कि उनकी सरकार के मंत्री, पार्टी विधायक और सांसद किसानों के बीच जाकर आंदोलन की आग को शांत करने की कोशिश करते नहीं दिख रहे.

दरअसल, मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान चाहते थे कि उनकी पार्टी के नेता आंदोलन की आग को शांत करने के लिए आगे आएं, लेकिन, वहां के हालात को देखकर ऐसा लगा जैसे सबने शिवराज सिंह चौहान को इस लड़ाई के लिए अकेले छोड़ दिया हो.

उधर, मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने किसानों की मौत के बाद सरकार को घेरना शुरू कर दिया है. अब तो कांग्रेसी नेताओं के वीडियो सामने आने के बाद साफ हो गया है कि अलग-अलग जगहों पर कांग्रेसी नेता किसान आंदोलन को और हवा भी दे रहे हैं.

Shivraj Singh Cabinet

शिवराज को भारी पड़ सकती है किसानों की नाराजगी 

अगले साल के अंत में विधानसभा का चुनाव होना है. उसके पहले किसानों की नाराजगी शिवराज पर भारी पड़ सकती है.

इसी के बाद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने नायाब फॉर्मूला निकाला है. अब खुद उपवास रखकर अपनी गलती सुधारने की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन, इसी बहाने पार्टी के भीतर के सभी नेताओं को भी वो एक साथ एक मंच पर लाने में सफल रहे हैं.

अबतक किसान आंदोलन के दौरान जो बीजेपी के सांसद, विधायक और सरकार में मंत्री घरों से बाहर नहीं निकल रहे थे वो सभी शिवराज के साथ अनशन स्थल पर दिख रहे हैं. मंच पर उनके धुर-विरोधी भी दिख रहे हैं.

शायद ऐसा कर शिवराज सिंह चौहान पार्टी के भीतर भी एक बार फिर से अपनी स्थिति को मजबूत करने में लगे हैं. लेकिन, बेहतर होता अगर शिवराज उपवास के बजाए किसानों के आंसू पोंछने खुद सामने आते, तो शायद न किसी को साजिश का मौका मिलता और न ही किसान हितैषी वाली उनकी अबतक की छवि को ठेस पहुंचता.

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