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एमपी किसान आंदोलन: उपवास-धरने की पॉलिटिक्स के पुराने खिलाड़ी हैं शिवराज

मंदसौर की घटना से चौहान की किसान हितैषी मुख्यमंत्री की छवि को जबरदस्त धक्का लगा है

Dinesh Gupta | Published On: Jun 10, 2017 12:51 PM IST | Updated On: Jun 10, 2017 12:55 PM IST

एमपी किसान आंदोलन: उपवास-धरने की पॉलिटिक्स के पुराने खिलाड़ी हैं शिवराज

किसान आंदोलन के हिंसक रूप लिए जाने के बाद मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने गांधीवादी तरीका अपनाते हुए शनिवार को भोपाल के दशहरा मैदान पर अनश्चितकालीन उपवास शुरू कर दिया है. इस उपवास में उनके साथ पत्नी साधना सिंह भी हैं.

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान इस उपवास के जरिए एक तरफ मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के हाथ से किसानों को निकालना चाहते हैं तो दूसरी और प्रदेश में जगह-जगह चल रहे किसान आंदोलन से लोगों का ध्यान हटाकर अपने पर केंद्रित करना चाहते हैं. मंदसौर में पुलिस की गोली से छह किसानों के मारे जाने के बाद शिवराज सिंह चौहान की किसान हितैषी मुख्यमंत्री की छवि को जबरदस्त धक्का लगा है.

राज्य में अगले साल विधानसभा चुनाव होना है. मुख्यमंत्री चौहान की लोकप्रियता महिलाओं के साथ-साथ किसानों के बीच भी काफी है. मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस पिछले 13 साल में उनकी इस छवि का तोड़ नहीं ढूंढ पाई है. गोलीकांड में किसानों के मारे जाने के बाद कांग्रेस को एक बड़ा मुद्दा हाथ लगा है. कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने जिस तरह से मंदसौर पहुंच कर मामले को राजनीतिक रंग दिया है, उससे पूरी भारतीय जनता पार्टी में अगले चुनाव लेकर बेचैनी साफ दिखाई दी.

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान इस उपवास के जरिए किसानों में विश्वास की वापसी की कोशिश में लगे हैं. किसान संगठनों से खुले में बातचीत का जो आमंत्रण उन्होंने दिया है, उसे मास्टरस्ट्रोक माना जा रहा है.

दशहरा मैदान से तय होती है राजनीतिक दिशा

Shivraj

भोपाल के जिस दशहरा मैदान पर मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अपनी सरकार चलाने बैठे हैं, वह उनके लिए भाग्यशाली मैदान माना जाता है. पिछले 13 साल में मुख्यमंत्री ने दर्जन भर से अधिक कार्यक्रम इस मैदान में किए हैं. प्रधानमंत्री मोदी भी इस मैदान पर आ चुके हैं. मौका वर्ष 2013 में शिवराज सिंह चौहान का तीसरी बार मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ग्रहण समारोह का था. भारतीय जनता पार्टी के कई बड़े नेता भी इस मैदान में मेहमान के तौर अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुके हैं.

यह मैदान पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर के निर्वाचन क्षेत्र में आता है. गौर को उम्रदराज होने के कारण मुख्यमंत्री चौहान ने अपने मंत्रिमंडल से बाहर कर दिया था. गौर सरकार से असंतुष्ट चल रहे हैं. उन्होंने किसान आंदोलन को लेकर सरकार को भी घेरा है. मुख्यमंत्री के लिए लकी माने जाने वाले इस मैदान में भेल की भोपाल इकाई सोलर प्लांट लगाना चाहती थी, लेकिन मुख्यमंत्री ने इसे रुकवा दिया.

किसानों के मुद्दे पर चौथी बार मैदान में

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान पिछले 13 साल से लगातार खेती को लाभ का धंधा बनाने की बात कह रहे हैं. पिछले कुछ माह से उन्होंने किसानों की आय दोगुनी करने के बयान देना शुरू कर दिए हैं. वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार मध्यप्रदेश में 3 करोड़ 15 लाख से अधिक श्रमिक हैं. इनकी कार्य सहभागिता की दर 43.5 प्रतिशत है. मध्यप्रदेश के कृषि आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार इनमें से 72 प्रतिशत मुख्य श्रमिक हैं. कुल श्रमिकों में से 31 प्रतिशत किसान हैं. 39 प्रतिशत कृषि श्रमिक हैं. जबकि 70 प्रतिशत श्रमिक प्राथमिक रूप से सीधे कृषि से जुड़े हुए हैं. राष्ट्रीय औसत 55 प्रतिशत का है.

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प्रदेश की राजनीति की दिशा ग्रामीण क्षेत्रों से ही तय होती है. यही वजह है कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अपने भाषणों में किसानों की बात ज्यादा करते हैं. किसानों से जुड़े मुद्दों पर राजनीति करना उन्हें अच्छी तरह आता है.

वर्ष 2011 में जब प्रदेश में ओला, पाला पड़ा तो शिवराज सिंह चौहान अतिरिक्त वित्तीय पैकेज की मांग को लेकर केन्द्र की तत्कालीन यूपीए सरकार के खिलाफ दशहरा मैदान में धरने पर बैठ गए. वर्ष 2012 में उर्वरकों की कीमतें बढ़ी तो मुख्यमंत्री चौहान स्थानीय विट्ठन मार्केट दशहरा मैदान में धरना देकर बैठ गए थे. तीसरी बार मुख्यमंत्री बनने के चार माह बाद बाद ही मार्च 2014 में वे एक बार फिर रोशनपुरा चौराहे पर धरने बैठे. इस बार मांग ओला वृष्टि को राष्ट्रीय आपदा घोषित करने की थी. गोली कांड के बाद किसानों का आंदोलन पूरे प्रदेश में उग्र है. सरकार बैकफुट पर है. मुख्यमंत्री चौहान फिर सड़क पर आ गए हैं. इस बार के धरने को उन्होंने उपवास का नाम दिया है. कारण केन्द्र और राज्य दोनों में ही भाजपा की सरकार होना है.

पदाधिकारी और कार्यकर्त्ता नहीं निकले घर से तो बैठे उपवास पर

प्रदेश में किसान आंदोलन का शनिवार को दसवां दिन है. पिछले नौ दिनों की राजनीतिक स्थिति पर नजर डाली जाए तो इससे साफ होता है कि भारतीय जनता पार्टी के मंत्री, विधायक, सांसद और अन्य पदाधिकारी किसानों से बात करने के लिए घर से ही नहीं निकले. शुक्रावार को पहली बार मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने मंदसौर से आए पाटीदार समाज के प्रतिनिधियों से बात की.

बातचीत के बाद पाटीदार समाज ने अपने आपको आंदोलन से अलग रखने की घोषणा कर दी. मंदसौर, जहां पुलिस की गोली से छह किसान मारे गए वह पाटीदार बाहुल्य जिला है. जिले की सात विधानसभा सीटों में से एक सीट हमेशा पाटीदार समाज को हर पार्टी देती है.

Farmers protest in Karad

किसान आंदोलन से उपजे हालात के बाद बीजेपी के चंद नेता ही मुख्यमंत्री के समर्थन में सामने आए. इनमें प्रदेशाध्यक्ष नंदकुमार चौहान, पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष प्रभात झा, सांसद गणेश सिंह और कैलाश विजयवर्गीय प्रमुख हैं. गृह मंत्री भूपेन्द्र सिंह और मंदसौर की प्रभारी मंत्री अर्चना चिटनिस के बयानों से मुख्यमंत्री की परेशानी बढ़ी थी. मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने उपवास की घोषणा कर घर में असंतुष्ट भाजपाई नेताओं को घरो से निकलने के लिए मजबूर कर दिया है. दशहरा मैदान के इस उपवास में आज वे सारे चेहरे नजर आ रहे हैं, जो कि पिछले कुछ माह से सरकार के कामकाज पर उंगलियां उठा रहे थे.

कांग्रेस के लिए मुश्किल होगा उपवास का तोड़ ढूंढना

मध्यप्रदेश कांग्रेस में कोई भी ऐसा नेता नहीं है, जिनकी पकड़ किसानों पर हो. कांग्रेस कमेटी में किसान प्रकोष्ठ है जरूर पर निष्क्रिय है. मध्यप्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष अरुण यादव ने उपवास को मुख्यमंत्री चौहान का राजनीतिक ड्रामा करार देते हुए कहा कि कार्यक्रम एक इवेंट की तरह है. मुख्यमंत्री को किसानों से हमदर्दी है तो मंदसौर जाकर उनसे बात करें. यादव ने कहा कि किसान आंदोलन द्वारा पूर्व घोषित कार्यक्रम के अनुसार वैसे भी 10 जून को आंदोलन का अंतिम दिन है.

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