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दक्षिण भारत में 'गाय' की राजनीति बीजेपी पर भारी भी पड़ सकती है

दक्षिण और पूर्वोत्तर के राज्यों में गाय को उत्तर भारत जैसा महत्व हासिल नहीं है.

Rajendra P Misra Rajendra P Misra | Published On: Jun 06, 2017 09:14 AM IST | Updated On: Jun 06, 2017 09:45 AM IST

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दक्षिण भारत में 'गाय' की राजनीति बीजेपी पर भारी भी पड़ सकती है

संघ परिवार का गौ-रक्षा अभियान अब बीजेपी के लिए ही मुसीबत बनता दिख रहा है. गौ-वंश संरक्षण की मुहिम निश्चित रूप से हिंदुत्व की अवधारणा को मजबूत करती है लेकिन इसका सियासी फायदा उत्तर भारत तक ही सीमित है.

दक्षिण और पूर्वोत्तर के राज्यों में गाय को उत्तर भारत जैसा महत्व हासिल नहीं है. ऐसे में संघ परिवार का गौ-रक्षा अभियान इन क्षेत्रों में विस्तार करने की बीजेपी की महत्वाकांक्षा पर ब्रेक लगा सकता है.

हालांकि, केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार बनने के साथ ही गौ-रक्षा का अभियान जोरशोर से चल रहा है लेकिन गौ-रक्षक उत्तर भारत और बीजेपी शासित राज्यों में ही सक्रिय थे.

मई के तीसरे सप्ताह में पशुओं के प्रति क्रूरता रोकथाम अधिनियम 1960 के तहत मवेशियों के व्यापार को नियमित करने की पर्यावरण मंत्रालय की अधिसूचना के बाद गौ-रक्षा पूर्वोत्तर और दक्षिण भारत में भी प्रमुख मुद्दा बन गया. इस अधिसूचना में गौ-वंश के साथ ही दूसरे मवेशी भी शामिल हैं लेकिन इसे गौ-रक्षा के एजेंडे के तहत उठाया गया कदम माना गया.

अब तक बीजेपी को संघ परिवार के गौ-रक्षा अभियान का भरपूर फायदा मिल रहा था लेकिन पर्वायवरण मंत्रालय की अधिसूचना के बाद उसके लिए मुश्किलें पैदा हो गई हैं. अब उसे यह डर भी सताने लगा है कि कहीं यह मामला साल 2019 में फिर से केंद्र की सत्ता पर काबिज होने की उसकी योजना में अड़चन न डाल दे.

मवेशी कारोबार नियमन अधिसूचना पर फिर से विचार करने के पर्यावरण मंत्री हर्षवर्धन के रविवार को दिये बयान को इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए.

तेजी से बढ़ रहा था बीजेपी का प्रभाव

उत्तर पूर्व और दक्षिण भारत में तेजी से बढ़ रहा है बीजेपी का प्रभाव

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उत्तर और पश्चिमी भारत के प्रमुख राज्यों मध्य प्रदेश, राजस्थान और गुजरात में पहले से ही बीजेपी की सरकारें थीं. साल 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद महाराष्ट्र समेत कई राज्य बीजेपी की झोली में गिरते गए. लेकिन, बिहार और दिल्ली अपवाद साबित हुए. यहां क्षेत्रीय दल जनता दल यूनाइटेड और आम आदमी पार्टी की सरकारें बनीं.

इन दोनों राज्यों में बीजेपी की हार से निष्कर्ष निकाला गया कि क्षेत्रीय दल बीजेपी के उभार को रोकने की क्षमता रखते हैं. लेकिन बीजेपी ने हाल ही में उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और बीएसपी को मटियामेट कर क्षेत्रीय दलों के प्रभुत्व की अवधारणा को चुनौती दी.

ऐसा लगा कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी राजनैतिक बुलडोजर बन गई है जिसके सामने अब कांग्रेस ही नहीं बल्कि क्षेत्रीय दल भी नहीं टिक पाएंगे.

अपने विजय रथ को आगे बढ़ाते हुए बीजेपी ने पूर्वोत्तर के राज्यों में पैठ बनाई और पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस की सरकार केरल में पिनारायी विजयन और त्रिपुरा में माणिक सरकार की वाम मोर्चा सरकार को निशाने पर लिया.

लेकिन बीजेपी के इस मिशन के पूरा होने से पहले ही केंद्र ने मवेशी कारोबार नियमन अधिसूचना जारी कर दी. इस अधिसूचना से पश्चिम बंगाल के साथ ही दक्षिण और पूर्वोत्तर के राज्यों में बवाल खड़ा हो गया.

पूर्वोत्तर में बीजेपी की बढ़ती धमक

दक्षिण और पूर्वोत्तर के राज्य बीजेपी के लिए हमेशा से चुनौती रहे हैं. पिछले तीन सालों में बीजेपी ने पूर्वोत्तर के राज्यों में अपनी धमक कायम की है. बीजेपी अरुणाचल प्रदेश में अन्य दलों में तोड़फोड़ कर सत्ता पर काबिज हुई तो असम और मणिपुर में पूर्व कांग्रेसी नेताओं के सहारे चुनाव जीत कर सत्ता में पहुंची.

2014 आम चुनावों के बाद उत्तरपूर्व के राज्यों में बीजेपी का कद बड़ा हुआ है

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उसका अगला लक्ष्य पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों पर भी कब्जा करने का है. लेकिन अब उसकी राह कठिन होती दिख रही है. इस बात को पूर्वोत्तर के बीजेपी नेताओं के बयानों से बखूबी समझा जा सकता है.

कुछ दिन पहले अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री और बीजेपी नेता पेमा खांडू ने मवेशी कारोबार के नए नियमों का खुलकर विरोध किया. उन्होंने कहा कि वे खुद बीफ खाते हैं और इसमें कुछ भी गलत नहीं है. मोदी सरकार के मंत्री किरन रिजीजू कई बार कह चुके हैं कि वे बीफ खाते हैं और उन्हें ऐसा करने से कोई रोक नहीं सकता.

दो साल पहले जब केंद्रीय मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने कहा था कि जो लोग बीफ के बगैर जिंदा नहीं रह सकते उन्हें पाकिस्तान चले जाना चाहिए तो रिजीजू ने नकवी को करारा जवाब दिया था. पूर्वोत्तर के दूसरे नेताओं की भावनाएं भी पेमा खांडू और रिजीजू की ही तरह हैं.

दक्षिण भी बन सकता है मुसीबत

केरल में मवेशी कारोबार के नए नियमों का जमकर विरोध हो रहा है. यहां एक बड़ी आबादी बीफ खाती है. हालांकि, केंद्र के नियमों का विरोध करने के लिए युवक कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने सरेआम गाय काटी तो उत्तर भारत में कांग्रेस के विरोध में माहौल बना लेकिन केरल में गाय को लेकर इस तरह की कोई भावना नहीं है.

केरल बीजेपी के नेता भी खुलकर गौ-वंश के संरक्षण की वकालत नहीं कर सकते. गौरतलब है कि अप्रैल महीने में राज्य की मल्लपुरम लोकसभा सीट के लिए हुए उप-चुनाव में बीजेपी के उम्मीदवार एन श्रीप्रकाश ने वोटरों को अच्छे बीफ की मुहैया कराने का वादा किया था.

तमिलनाडु में भी मवेशी कारोबार के नये नियम बीजेपी के लिए मुश्किलें खड़ी करेंगे. बीजेपी अरसे से राज्य में सहयोगी की तलाश कर रही है. उसने पन्नीर सेलवम पर भी डोरा डाला था. लेकिन अब हालात बदल गए हैं. डीएमके जैसे दल इन नियमों को लेकर केंद्र सरकार के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं.

आईआईटी मद्रास में बीफ फेस्टिवल को लेकर एक रिसर्च स्कॉलर की पिटाई हुई. इससे भी बीजेपी के खिलाफ माहौल बना है. दक्षिण में बीफ नियमन को उत्तर भारतीय संस्कृति को थोपने और अपनी जीवन शैली में दखल के रूप में लिया गया है.

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हाल के समय में गौरक्षकों पर गायों की रक्षा के नाम पर उत्पात मचाने के आरोप लगे हैं

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गौ-रक्षकों के उत्पात से दलित होंगे अलग-थलग

केंद्र में मोदी सरकार के बनने के बाद से ही गौ-रक्षकों का मनोबल बढ़ा हुआ है. गौवंश की रक्षा के नाम पर तथाकथित गौरक्षक कानून अपने हाथ में ले रहे हैं. इनके निशाने पर सिर्फ मुसलमान ही नहीं हैं बल्कि चमड़े के कारोबार से जुड़े दलित भी हैं.

यह सच है कि मुसलमानों के अलावा दलित भी बीफ खाते हैं. पिछले साल गुजरात के उना में मरी हुई गाय की खाल उतार रहे दलितों को सरेआम पीटा गया था. चूंकि दलित चमड़े के कारोबार में लगे हैं ऐसे में वे आगे भी गौ-रक्षकों के निशाने पर रहेंगे.

खास बात है कि दलितों को लुभाने के लिए संघ परिवार समावेशी हिंदुत्व की बात करता है तो उसका गौ-वंश अभियान उन्हें अलग-थलग भी करता है. केंद्र सरकार के हालिया नियमों से दलित समुदाय के खान-पान पर भी असर पड़ेगा. ऐसे समावेशी हिंदुत्व का प्रोजेक्ट भी प्रभावित होगा और दलितों को बीजेपी की तरफ खींचने में दिक्कत आएगी.

दरअसल, मोदी और शाह के नेतृत्व में बीजेपी पूरे देश में कांग्रेस वाली पूर्व हैसियत पाने की कोशिश कोशिश कर रही है. बीजेपी की अपने सहयोगियों के साथ 17 राज्यों में सरकारें हैं.

लेकिन सही मायने में अब तक पूरे देश में बीजेपी के फुटप्रिंट नहीं हैं. दक्षिण के राज्यों में कर्नाटक को छोड़कर बीजेपी की खास पकड़ नहीं है. पूर्वोत्तर में उसे कुछ उपलब्धि हासिल हुई है लेकिन अभी बहुत काम बाकी है. ऐसे में गौ-रक्षा मुहिम से होने वाले नुकसान का बीजेपी को एहसास होने लगा है.

यही वजह है कि सरकार मवेशी कारोबार नियमन अधिसूचना में बदलाव की बातें करने लगी है. सरकार ने पहले ही संकेत दिया कि इन नियमों के दायरे से भैंसों को हटाया जा सकता है. पर्यावरण मंत्री ने कहा है कि सरकार विभिन्न समूहों की तरफ से मिले सुझावों पर गंभीरता से विचार कर रही है.

ऐसे में लगता है कि मवेशी कारोबार के नियमों में कुछ ढील दी जा सकती है लेकिन गौ-वंश के मामले में कोई छूट देकर मोदी सरकार संघ की नाराजगी मोल नहीं ले सकती. लिहाजा यह देखना दिलचस्प होगा कि भविष्य में बीजेपी हिंदुत्व के साथ अपने चुनावी हितों को कैसे साधती है.

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