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व्यंग्य: जान नहीं, जाति की फिक्र करो प्रभु!

भले ही कर्ज, भूख, फसल बर्बाद होने से किसान धरती से उठ रहे हैं पर सुखद है कि सरकारी आंकड़ों में भी वो गरीबी रेखा से ऊपर हैं

Shivaji Rai Updated On: Jul 06, 2017 10:53 AM IST

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व्यंग्य: जान नहीं, जाति की फिक्र करो प्रभु!

मॉनसून ने मौजूदगी क्‍या दर्ज कराई. भाव प्रधान देश में स्‍थाई भाव का ही अभाव हो गया है. नेताओं और अभिनेताओं की तो बात छोड़िए, किसानों तक की भाव-भंगिमा समझ से परे है. सबकी भौहें टेढ़ी दिख रही हैं. कर्ज माफी को लेकर कोई आंदोलन कर रहा है, तो कोई न्‍यूनतम समर्थन मूल्‍य को लेकर धरना-प्रदर्शन. पूरा देश धरना-प्रदर्शन और आंदोलन के मोड पर है.

घटनाक्रमों को देखते हुए ज्ञानीजनों का तो सुझाव है कि भारत माता को कृषि प्रधान देश की पदवी, आगामी अवॉर्ड वापसी के दौरान लौटा देनी चाहिए और उसकी जगह धरना-प्रदर्शन और आंदोलन प्रधान देश की सहिष्‍णु पदवी अपनानी चाहिए. वैसे भी खाने पीने की चीजों की महंगाई देखकर कृषि प्रधान देश का उपनाम बेमानी ही लगता है. पदवी लौटाने का मतलब यह कतई नहीं कि हम किसानों को नजरअंदाज करने की बात कर रहे हैं.

एक साधे सब सधे

दरअसल किसान की हिमायत अपनी जगह है लेकिन इस बात का भी ध्‍यान रखा जाना चाहिए कि देश में जान की फिक्र जात की फिक्र से अधिक करने को हमेशा से मूर्खतापूर्ण ही कहा गया है. ‘एक साधे सब सधे’ के सिद्धांत पर सरकार को जान से अधिक जाति की फिक्र करनी चाहिए. खेती-किसानी की फिक्र अंधेरे में तीर चलाने की तरह है. जहां मौसम, महीना और मुद्दा कोई भी हो सटीक निशाना संभव नहीं है.

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किसानों की तो बात दूर, साग-सब्जियों तक के अपने-अपने मुद्दे हैं. कोई महंगाई के साथ खड़ा है तो कोई मंदी की मार से चोटिल पड़ा है. प्‍याज की अपनी पीड़ा है, तो टमाटर के अपने तेवर हैं.

Bhopal : Farmers throwing vegetables on a road during their nation-wide strike and agitation over various demands, in Bhopal on Sunday. PTI Photo (PTI6_4_2017_000113B)

यानी सबके चेहरे पर अलग-अलग भाव हैं और अलग-अलग नखरे हैं. प्‍याज भाव के अभाव में सड़क पर फेंकी जा रही है. तो टमाटर बढ़ते भाव को लेकर किचन का भाग्‍य हो गया है. किसी की चर्चा सड़क पर हो रही है, तो कोई संसद की चर्चा में छाया हुआ है.

भाव विभोर सांसद और मंत्रीगण मुद्दे पर विशेष सत्र की मांग कर रहे हैं. श्रीमति का हाल तो और बुरा है. सब्‍जी का नाम लेते ही चेहरे पर ऐसा भाव लाती हैं, जैसे बचपन में गणित के सवालों को देखकर हमारा चेहरा भाव शून्‍य हो जाता था. आलू तक तो ठीक पर टमाटर के नाम पर ऐसे बिदक रही हैं. जैसे जवानी के दिनों में शॉपिंग जाने से मना करने पर बिदक जाती थीं.

मांग और उत्पादन का शास्त्र 

अमर्त्‍य सेन के जैविक वंशज इस बदलती भाव-भंगिमा पर दलील दे रहे हैं कि यह जाति और वर्गवाद का मामला नहीं है. यह उत्‍पादन और मांग से जुड़ा मामला है. किसी का उत्‍पादन अधिक है और मांग कम है. तो किसी की मांग अधिक है और उत्‍पादन कम है.

अवधू गुरु तो इस दलील को सिरे से खारिज कर रहे हैं, गुरु का कहना है कि आबादी का पेट फटने से भी जिस देश में बच्‍चों की मांग नहीं घट रही है. वहां खाने-पीने वाले चीजों की मांग घटना हास्‍यास्‍पद नहीं तो क्‍या है. गुरु का कहना है कि जो मांग घट नहीं रही है, घोटाला कर के घटाई जा रही है.

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वैसे भी जो घट ही जाए वो मांग कैसी? इस देश में कौन सी मांग घटी है- रोटी, कपड़ा, मकान से लेकर आरक्षण तक की मांग आजादी से लेकर आज तक बरकरार है. कितनी योजनाएं आई और गईं, पर मजाल क्‍या मांग में एक फीसदी की भी कमी आई हो. वो तो सरकारी नुमाइंदें हैं जो अपने नारे से ऐसा भम्र पैदा करते हैं कि लगता है कि मांग ही छू-मंतर से गायब हो गई है.

farmer-agriculture

खुशहाल देश के खुशहाल किसान

वैसे ही अर्थशास्त्रियों की दलील हमेशा भ्रम ही पैदा करती है, जीडीपी का हवाला देकर ऐसा हो-हल्‍ला मचाते हैं कि लगता है कि देश एक झटके से विकास के शिखर पर पहुंच गया है. आंकड़ों पर सरकारी अधिकारी भी ऐसा संजीदा बयान देते हैं कि लगता है अब न फसल बर्बाद होने से कोई हल्‍कू मरेगा. और न ही कोई दबंग सहना किसी गरीब से पैसा ऐंठेगा. चारों ओर राम राज्य होगा.

जैसे रेलवे ट्रैक के पास रहने वालों को ट्रेन का आना-जाना, मछली बाजार में रहने वालों को मछली की गंध, सरकारी दफ्तरों में काम करने वालों को भ्रष्टाचार, पुलिसवालों को हत्‍या और वकीलों को झूठ परेशान नहीं करते. वैसे ही कृषि प्रधान देश में किसानों की खुदकुशी कोई सनसनी पैदा नहीं करती.

लिहाजा सरकारी विज्ञापनों ‘खुशहाल किसान, खुशहाल देश’ पर बहस से बेहतर है कि इसके पीछे के सियासी भावार्थ की दिल खोलकर तारीफ की जाए. और इस बात पर सरकार का आभार जताया जाए कि भले ही कर्ज, भूख, फसल बर्बाद होने से किसान धरती से उठ रहे हैं पर सुखद है कि सरकारी आंकड़ों में भी वो गरीबी रेखा से ऊपर हैं.

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