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सियासत के 'संगीत' से ताज को आंच नहीं, देखा है ताज ने हर दौर के बादशाह को करीब से

सियासत में ‘ताजनीति’ कुछ इस कदर हावी हो गई है कि अब इतिहास का ‘संगीत’ किसी शोर सा सुनाई देने लगा है

Kinshuk Praval Kinshuk Praval Updated On: Oct 16, 2017 10:59 PM IST

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सियासत के 'संगीत' से ताज को आंच नहीं, देखा है ताज ने हर दौर के बादशाह को करीब से

जमुना के कोलाहल से गूंजते किनारे पर चांदनी रात में हवाओं के शोर में खामोश खड़ा जो ताजमहल लोगों को अपना दीदार करने को मजबूर करता था उसी ताज की सफेदी पर अब आरोपों के छींटे पड़ रहे हैं. संगरमरमरी दीवारों पर गद्दारी के दाग चस्पा हो रहे हैं. जिस आगरा को ताज ने दुनिया में पहचान दी उसी उत्तर प्रदेश में इतिहास के पन्नों से ताज के एक-एक गुंबद और खंभों को उखाड़ कर बाहर फेंक देने की बात हो रही है.

हां, अब ताज के अपनी खूबसूरती पर इठलाने के दिन चले गए. अब उसके अपनी बेकसी पर रोने के दिन आ गए क्योंकि अब ताजमहल के इम्तिहान का वक्त आ चुका है. ताज साबित करे कि वो किसी हमलावर की निशानी नहीं बल्कि हिंदुस्तान की मुकम्मल पहचान है. ताज साबित करे कि वो मुल्क की संस्कृति के लिए कलंक नहीं है. ताज साबित करे कि उसे ‘गद्दारों’ ने नहीं बनाया.

ताज ये भी साबित करे कि वो गुलामी का पुरजोर दस्तावेज नहीं. ताज ये भी एलान करे कि वो हमलावरों की निशानी नहीं बल्कि मुहब्बत के पैगाम की न खत्म होने वाली कहानी है जिसका मकसद गंगा-जमुनी तहजीब को हर पीढ़ी तक जिंदा रखना है क्योंकि अब ताज को खुद के होने की वजह बताने की जरूरत आ गई है.

इसकी इकलौती वजह आज के दौर के सियासत के वो शहंशाह है जो ताज को कलंक मानते हैं. सियासत में ‘ताजनीति’ कुछ इस कदर हावी हो गई है कि अब इतिहास का ‘संगीत’ किसी शोर सा सुनाई देने लगा है.

मेरठ के सरधना से विधायक संगीत सोम ने ताजमहल को इतिहास का हिस्सा मानने पर ऐतराज जताया है. यूपी सरकार ने पर्यटन की लिस्ट से जिस तरह से ताजमहल को बेदखल किया, उस पर संगीत सोम का कहना है कि ताजमहल भारतीय संस्कृति पर कलंक है और इतिहास बदलने का वक्त आ गया है.

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दरअसल संगीत सोम की पहचान कट्टर हिंदूवादी चेहरे और बीजेपी के फायर ब्रांड नेता के तौर पर होती है. उन पर सांप्रदायिक दंगों की आंच इतनी गहराई तक पहुंची थी कि गिरफ्तारी से वो बच नहीं सके थे. मुजफ्फरनगर दंगों के आरोपी माने जाने वाले संगीत सोम अब ताजमहल पर राजनीति की नई नीति सामने लेकर आए हैं.

उनका कहना है कि  'हमारी सरकार राम से लेकर महाराणा प्रताप और शिवाजी तक का इतिहास किताबों में लाने का काम कर रही है और जो कलंक कथा किताबों में लिखी गई है, वो चाहे अकबर के बारे में हो, औरंगजेब के बारे में हो, चाहे बाबर हो उनके इतिहास को निकालने का काम कर रही है सरकार.'

सवाल ये है कि ‘सबका साथ सबका विकास’ का नारा बुलंद करने की मोदी सरकार की नीति और इरादों को दरकिनार करके ऐसे घोर सांप्रदायिक बयान आखिर क्या साबित करना चाहते हैं?

सवाल ये भी है कि क्या यूपी में राजनीति के लिए राम मंदिर का मुद्दा इतना पुराना हो चुका है जिस वजह से अब ताजमहल को निशाना बनाने की सियासी मजबूरी संगीत सोम के सामने आ गई है?

सवाल ये भी है कि विकास की रफ्तार पकड़ने वाली यूपी की योगी सरकार क्या विकास की मूल भावना से डिरेल हो रही है जिस वजह से उसके नुमाइंदे सांप्रदायिक रथ पर सवार होना चाहते हैं?

यूपी सरकार ने हाल ही में ताजमहल को पर्यटन की सूची से बाहर निकाल दिया था. दिलचस्प ये है कि दुनिया के सात अजूबों में शुमार ताजमहल ने पिछले तीन साल में उत्तर प्रदेश पर्यटन विभाग को 75.91 करोड रुपये कमा कर दिए थे जबकि सरकार ने केवल 11 करोड़ रुपए ताजमहल पर खर्च किए थे.

खुद ये जानकारी बीजेपी के ही मंत्री ने सरकार को सौंपी थी. लेकिन अब ताजमहल जो भारत की पहचान है उसे सियासी चश्मे की नजर कलंक की तरह देख रही है.

भारत में सिर्फ ताजमहल ही मुगलों की निशानी नहीं है. देश की कई इमारतें और स्मारक भी मुगलकालीन हैं. जिस तरह से सैकड़ों साल का मुगल काल भारत के इतिहास और संस्कृति का हिस्सा है उसी तरह ताजमहल भी भारतीय संस्कृति का हिस्सा है. भारत के इतिहास से मुगल काल हटाना उसी तरह नामुमकिन है जिस तरह दूध और पानी को आपस में मिला कर दोबारा अलग-अलग करने की कोशिश करना.

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इतिहास से वर्तमान के लिए सबक सीखा जाता है ताकि भविष्य में गलतियां दोहराई न जा सकीं. कागजों पर इतिहास के अध्याय मिटाने से अगर इतिहास बदला जा सकता होता तो आज देश में इतने सालों के बाद भी राम-कृष्ण कथाएं जीवित न होतीं. जो किरदार, कथाएं और स्मारक संस्कृति और आस्था का हिस्सा बन चुके हैं उन पर किए गए प्रहार ने केवल उन्हें मजबूत करने का ही काम किया है.

राम मंदिर का मुद्दा इसका सबसे बड़ा उदाहरण है. इतिहास के पन्नों में उसे बाबरी ढांचे का नाम दिया गया तो आस्था ने राम का जन्म स्थान बताया. आज मामला कोर्ट में विचाराधीन है. आस्था और स्मारक पर होने वाले प्रहारों ने ही इस मुद्दे को मजबूत करने का काम किया है.

ऐसे में ताजमहल को भारतीय संस्कृति पर कलंक बता कर न मालूम संगीत सोम सियासत की कौन सी साधना करना चाहते हैं?

संगीत सोम इतिहास बदलने की बात कर रहे हैं लेकिन वो ये भूल रहे हैं कि पूरा का पूरा ही भारत बदल रहा है. खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कह चुके हैं कि ये बदलता भारत है. 'न्यू इंडिया' बनते बनते मंदिर और मस्जिद के मुद्दे इतने पुराने हो चुके होंगे कि नई पीढ़ी को इनमें सिर खपाने और जान गंवाने की फुर्सत नहीं होगी. ये मुद्दे भी इतिहास का हिस्सा हो चुके होंगे क्योंकि जरूरत कहती है कि अब भविष्य की तरफ देखना है.

ऐसे में सरधना के फायरब्रांड नेता के बयानों से गूंजा संगीत बीजेपी के लिये शोर बन सकता है. ताजमहल पर संगीत सोम के बेबाक बयान से बीजेपी निजी राय बताते हुए पल्ला झाड़ रही है. बीजेपी को ये सफाई देनी पड़ रही है कि ताजमहल न सिर्फ ऐतिहासिक धरोहर है बल्कि पर्यटकों का सबसे बड़ा केंद्र भी है और सरकार को ताजमहल पर गर्व है.

बात सिर्फ ताजमहल तक ही नहीं हुई थी बल्कि निकलते निकलते पाकिस्तान तक पहुंची थी. संगीत सोम का कहना था कि यूपी में अगला चुनाव हिंदुस्तान और पाकिस्तान के बीच जंग की तरह हैं. उन्होंने कहा कि यूपी में बीजेपी को हराना यहां पाकिस्तान बनाने के बराबर है.

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संगीत सोम का इशारा विपक्ष को पूरी बात कहने और समझाने का मौका दे गया. कुछ इसी तरह के बयानों की वजह से बीजेपी ने कभी वरुण गांधी से भी दूरी बनाई थी. अब संगीत सोम के साथ भी बीजेपी कहीं वरुण वाला पुराना इतिहास न दोहरा जाए क्योंकि ‘सबका साथ सबका विकास’ के फॉर्मूले में संगीत सोम का हिंदुत्व कार्ड कहीं से फिट नहीं हो सकता है.

बीजेपी ने नई रणनीति के तहत राम के रथ से उतर कर विकास के रथ पर यात्रा शुरू की है जिसकी वजह से ही पहले केंद्र तो फिर यूपी में भी भारी बहुमत से सरकार बनाई है. लेकिन बीजेपी के सिपहसलारों के अपने ही भड़काऊ बयान यूपी में योगी सरकार के लिए डगर मुश्किल करने का काम कर सकते हैं. वैसे भी बीजेपी के लिए यूपी की सत्ता सबसे बड़ी अग्निपरीक्षा है जहां एक भगवाधारी आध्यात्मिक योगी को बीजेपी ने सत्ता का संचालन दिया है. ऐसे में योगी पर सबकी नजर है. तभी ये सवाल जायज है कि फिर क्यों ताजमहल पर संगीत सोम की तिरछी नजर है?

ताज मुल्क की पहचान है और उसे बनाने वाले हाथ हिंदुस्तान की मिट्टी में ही हुनरमंद बने थे. उन हाथों पर किसी कौम या सल्तनत का पहरा नहीं था. आज अगर ताजमहल कलंक होता तो लोग अपने घर को ताजमहल बनाने के लिए दीवारों पर मुमताज नहीं लिखते.

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