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सहारनपुर की घटना से संघ परिवार के प्लान को लगेगा पलीता?

सहारनपुर की घटना पर विरोधी बीजेपी को चौतरफा निशाने पर ले रहे हैं

Amitesh Amitesh Updated On: May 25, 2017 01:15 PM IST

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सहारनपुर की घटना से संघ परिवार के प्लान को लगेगा पलीता?

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सहारनपुर की घटना ने एक साथ कई सवालों को खड़ा कर दिया है. इन सवालों का जवाब देने में केंद्र और राज्य की बीजेपी सरकार के पसीने छूट रहे हैं.

सहारनपुर के शब्बीरपुर गांव में दलितों और ठाकुरों के बीच की लड़ाई ने इस कदर हिंसक रूप अख्तियार कर लिया है, जिसकी आग में योगी सरकार के सबका साथ सबका विकास का नारा फुस्स होता दिख रहा है.

बीजेपी के लिए सबसे बड़ी चिंता की बात यही है कि यहां दलित तबका उससे नाराज है. अभी हाल ही में हुए यूपी विधानसभा चुनाव के वक्त अमित शाह ने सोशल इंजीनियरिंग का जो ताना-बाना बुना था, उसमें बीजेपी की परंपरागत अगड़ी जातियों के साथ-साथ गैर-यादव पिछड़ी जातियों की गोलबंदी की गई थी.

इसके अलावा दलित तबके का भी बड़ा हिस्सा बीजेपी के साथ रहा था. तभी जाकर बीजेपी पहले लोकसभा चुनाव 2014 में और फिर विधानसभा चुनाव में इस कदर बड़ी जीत दर्ज करने में सफल रही थी.

लेकिन, सहारनपुर की घटना के बाद दलित तबके का बीजेपी से मोहभंग हो सकता है. इस बात को बीजेपी के विरोधी भी समझते हैं. यूपी की सियासत में इस वक्त हाशिए पर जा चुकी मायावती फिर से खड़ा होने के मौके के तौर पर इसे देख रही हैं.

UP Home Secy arrives in Saharanpur

यूपी के होम सेक्रेटरी मणिप्रसाद मिश्रा सहारनपुर में अधिकारियों से स्थितियों का जायजा लेते हुए. पीटीआई

मायावती ने सहारनपुर पहुंचकर दलित तबके के साथ-साथ पिछड़े और ब्राह्मण समुदाय के लोगों को भी साधने की कोशिश की है.

मायावती इस तरह के संदेश देकर यूपी के पिछड़ों को बताना चाहती हैं कि बीजेपी ने पिछड़ों और दलितों को साध कर सत्ता पाई लेकिन, सिंहासन पर अगड़ी राजपूत जाति से आने वाले योगी आदित्यनाथ को बैठा दिया.

सहारनपुर के भीतर लडाई भी दलित बनाम ठाकुर ही है. लिहाजा मायावती ने इस पूरे मामले को योगी की जाति से जोड़कर इसका सियासी फायदा लेने की कोशिश की है.

इसी बात से बीजेपी डरी हुई लग रही है. बीजेपी को लगता है कि इस तरह से संदेश जाने से 2019 की यूपी की लड़ाई में उसके लिए मुश्किलें हो सकती हैं.

एससी-एसटी आयोग के पूर्व अध्यक्ष और बीजेपी नेता विजय सोनकर शास्त्री इसके पीछे बड़ी साजिश बता रहे हैं. उनका मानना है कि ‘मायावती की बुरे तरीके से हुई पराजय और दलितों के संदर्भ में आकलन गलत साबित होने के बाद पैदा हुए गैप को भरने के लिए मोदी विरोधी, बीजेपी विरोधी और हिंदू विरोधी ताकतों का खतरनाक खेल चल रहा है.’

यूपी से बीजेपी के पूर्व सांसद विजय सोनकर शास्त्री फ़र्स्टपोस्ट हिंदी से बातचीत में कहते हैं कि ‘वास्तव में इस वक्त यूपी की हार के बाद मायावती के पास उनकी जाति के ही वोट बचे हैं जबकि अनुसूचित  जाति में कुल 1208 जातियां हैं.’

मायावती इस घटना में देख रही हैं अपनी पार्टी के दोबारा उभार की संभावनाएं. फाइल फोटो

मायावती इस घटना में देख रही हैं अपनी पार्टी के दोबारा उभार की संभावनाएं. फाइल फोटो

उनका मानना है कि ‘सहारनपुर की घटना एक बड़ी साजिश का हिस्सा है. यूपीए शासन काल में धर्मांतरित ईसाई और मुस्लिम को एससी में शामिल करने का प्रयास हुआ था,यह उसी साजिश का हिस्सा है. अब वो सत्ता में नहीं हैं  इसलिए बीजेपी के शासन को बदनाम करने और धर्मांतरित करने के लिए एक तीर से दो निशाने साध रहे हैं.’

दरअसल, मायावती  इस वक्त सहारनपुर से ही अपने लिए एक नई उर्जा देख रही हैं. उनको यह लगने लगा है कि जब ‘चंद्रशेखर’ जैसे लोग भीम आर्मी के जरिए दलित आंदोलन को बड़ा कर सकते हैं तो एक बार फिर से वो अपनी बुनियाद को मजबूत क्यों नहीं कर सकती?

लेकिन, अंदर खाने मायावती के भीतर एक बेचैनी भी साफ झलक रही है. डर है कि यूपी के भीतर उनके सफाए के बाद दलित राजनीति के केंद्र में ‘चंद्रशेखर’ जैसे नायक उनके स्पेस को न दखल कर लें. वरना मायावती सहारनपुर पहुंचने की इतनी जल्दबाजी नहीं करती.

संघ के प्लान को पलीता !

MOHAN BHAGWAT

संघ परिवार की सबसे बड़ी चिंता यही है कि सहारनपुर की हिंसा दलितों के खिलाफ अगड़ों की लड़ाई के तौर पर पेश किया जा रहा है.

एक तरफ संघ परिवार की तरफ से जहां अलग-अलग जगहों पर घरवापसी की मुहिम चलाई जा रही है वहीं दूसरी तरफ दलित परिवारों के हिंदू धर्म छोड़कर दूसरे धर्म को अपनाने की खबरें भी उसी यूपी से आ रही हैं जहां संघ का सबसे बड़ा गढ़ है और यहां तक की अब सूबे का मुखिया भी हिंदुत्व के चेहरे योगी आदित्यनाथ हैं.

आरएसएस के करीबी सूत्रों के मुताबिक, संघ दलितों के खिलाफ हो रही घटनाओं से काफी चिंतित है. संघ को इस बात का डर सता रहा है कि दलितों के भीतर भरोसा बहाली और उन्हें अपने साथ जोड़ने की कवायद को इस तरह की घटनाओं के कारण झटका लग सकता है.

यही वजह है कि संघ के मंडल स्तर के भी शाखाओं में जाने वाले स्वयंसेवकों को इस बात का निर्देश दिया जा रहा है कि वो अपने क्षेत्र में दलित समुदाय के लोगों से संपर्क में रहें और उनके भीतर की गलतफहमी को दूर करने की कोशिश भी करें.

इसके पहले रोहित बेमुल्ला की घटना और गुजरात के ऊना की घटना ने भी संघ को हिला कर रख दिया था. अब सहारनपुर की घटना के बाद संघ ज्यादा सतर्क हो गया है. संघ को डर है कि इस तरह की घटनाओं के चलते धर्म परिवर्तन की कोशिशों को बढ़ावा मिलेगा.

गौरतलब है कि संघ ने 2015 की अपनी अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की बैठक में हर गांव में एक कुंआ, एक मंदिर और एक श्मशान के फॉर्मूले को आगे बढ़ाने को लेकर प्रस्ताव पास किया था. संघ की पूरी कोशिश थी कि दलितों के साथ होने वाले भेदभाव को खत्म कर उन्हें हिंदूत्व की डोर में बांधा जाए. लेकिन, इस तरह की घटनाएं उस डोर को तोड़ने का ही काम करेंगी.

2019 में हो सकती है मुश्किल

Narendra Modi

संघ परिवार और बीजेपी के सामने सबसे बड़ी चुनौती 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी के प्रदर्शन को फिर से दोहराने की है. इसी कोशिश के तहत यूपी जैसे संवेदनशील राज्य में संघ की सहमति के बाद बीजेपी ने भगवाधारी हिंदूत्ववादी योगी आदित्यनाथ को हाथों में सत्ता की कमान सौंप दी थी.

सबको इस बात की उम्मीद थी कि योगी के चेहरे को सामने रखकर जात-पात की गुटबाजी से उपर उठकर हिंदुत्व के चेहरे के सहारे बीजेपी सबको साध लेगी. लेकिन, इस तरह की घटनाओं ने बीजेपी को सकते में डाल दिया है.

वरिष्ठ पत्रकार अंबिकानंद सहाय के मुताबिक, ‘कांग्रेस के सत्ता में रहने के दौरान समाज में ऊंची जातियों का प्रभुत्व था. अब ढाई दशक बाद एक बार फिर से यूपी में बीजेपी सरकार आने के बाद यूपी में सवर्ण जातियों का प्रभुत्व बढ़ा है.’

अंबिका नंद सहाय का मानना है कि ‘पिछड़े और दलित समुदाय मिलकर एक बार फिर से 1993 की तरह ही बीजेपी को सबक न सिखा दें जैसा 1993 में हुआ था. उस वक्त मंदिर लहर पर सवार होकर बीजेपी ने 1991 में बड़ी जीत हासिल की थी. लेकिन, 1993 में मुलायम सिंह यादव और कांशीराम ने एक होकर बीजेपी को पटखनी दे दी थी. अब एक बार फिर से अखिलेश और मायावती उस कहानी को दोहरा सकते हैं.’

बीजेपी के विरोधी यूपी के भीतर अधिकारियों की ट्रांसफर और पोस्टिंग में भी एक खास जाति विशेष के लोगों को तरजीह दिए जाने को लेकर सवाल खड़े कर रहे हैं. विरोधियों का तर्क है कि अखिलेश सरकार के कार्यकाल में जो तरजीह उनकी जाति के लोगों को दी जाती थी. अब वही तरजीह योगी सरकार में उनकी जाति के लोगों को दी जा रही है.

इन सारे सवालों ने संघ परिवार और बीजेपी की परेशानी को बढ़ा दिया है. उनको इस बात का डर सताने लगा है कि अगर बीजेपी के सोशल इंजीनियरिंग के फॉर्मूले में सेंधमारी हो गई तो 2019 की लड़ाई मुश्किल हो जाएगी.

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