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राष्ट्रपति चुनाव: कोविंद वाली गुगली से उड़ी विपक्षी एकता की गिल्लियां

राष्ट्रपति के उम्मीदवार के रूप में कोविंद का चयन निश्चित तौर पर विपक्षी दलों की कतारबंदी को तोड़ेगा

Sanjay Singh | Published On: Jun 20, 2017 11:32 AM IST | Updated On: Jun 20, 2017 11:32 AM IST

राष्ट्रपति चुनाव: कोविंद वाली गुगली से उड़ी विपक्षी एकता की गिल्लियां

बिहार के राज्यपाल रामनाथ कोविंद के राष्ट्रपति बनने की पूरी संभावना है. वह 17 जुलाई को होने वाले राष्ट्रपति चुनाव के लिए सत्तारूढ़ एनडीए के उम्मीदवार हैं और 23 जून तक अपना नामांकन दाखिल करेंगे. चूंकि निर्वाचक मंडल में सत्तारूढ़ गठबंधन के पास 55 प्रतिशत से ज्यादा वोट हैं, इसलिए राष्ट्राध्यक्ष के रूप में कोविंद की पदोन्नति निश्चित है.

कोविंद का नाम सामने आने से कांग्रेस के नेतृत्व वाले विपक्षी गठबंधन में दरार आ गई है. बीएसपी प्रमुख मायावती और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कोविंद की उम्मीदवारी के समर्थन का संकेत दिया है.

एनडीए के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के रूप में कोविंद का नाम घोषित कर नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने एक बार फिर से जता दिया है कि वे अचरज में डालने की कला के उस्ताद हैं - उनसे अनापेक्षित की ही अपेक्षा की जानी चाहिए. उन्होंने मीडिया की सारी अटकलों और वरिष्ठ नेताओं और मंत्रियों के बीच निजी बातचीत की खबरों को गलत साबित कर दिया. आखिरकार अटकलों का दौर चल रहा था तो कोविंद का नाम राडार पर कहीं नहीं था.

Bhubaneswar: Prime Minister Narendra Modi with part president Amit Shah at BJP's National executive meet in Bhubaneswar on Saturday. PTI Photo (PTI4_15_2017_000149B)

सिर्फ राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के नाम को लेकर ही नहीं, इस घोषणा के समय में आश्चर्य का एक तत्व शामिल था. माना जा रहा था कि नामांकन से एक दिन पहले 22 जून को राष्ट्रपति के नाम की घोषणा की जाएगी, क्योंकि प्रधानमंत्री 24 जून को अमेरिका की यात्रा पर जाने वाले हैं. लेकिन मोदी-शाह ने संसदीय बोर्ड की बैठक की तारीख पहले खिसका दी. संसदीय बोर्ड बीजेपी की निर्णय लेने वाली सर्वोच्च संस्था है.

कोविंद के चयन से कई संदेश

इसके साथ ही, कोविंद की राष्ट्रपति के रूप में प्रस्तावित पदोन्नति एक बार फिर इस बात की पुष्टि करती है कि वंशवादी दलों के विपरीत बीजेपी में कोई भी सर्वोच्च पद तक पहुंच सकता है. इसमें उसकी सामाजिक पृष्ठभूमि आड़े नहीं आती. एक चायवाला प्रधानमंत्री बन सकता है, एक साधारण कार्यकर्ता पार्टी के अध्यक्ष पद पर आसीन हो सकता है और राष्ट्रपति के पद के लिए एक अनजाने से दलित के नाम पर विचार किया जा सकता है.

बिहार विधानसभा चुनाव से पहले कोविंद ने 16 अगस्त 2015 को राज्यपाल का पद ग्रहण किया तो इसे बिहार के मतदाताओं को यह बताने की कोशिश के रूप में देखा गया कि बीजेपी गरीबों और दलितों की परवाह करती है. उनकी दिल्ली के 11 अशोक रोड स्थित बीजेपी मुख्यालय में उपस्थिति एक साधारण नेता सरीखी थी. कोविंद दलितों की उपजाति कोली समुदाय के एक परिवार से आते हैं. वे उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले में डेरपुर तहसील के पारौंखा गांव में पैदा हुए थे. वे कड़ी मेहनत नीचे से ऊपर आए हैं. वह एक वकील हैं और बीजेपी दलित मोर्चा के प्रमुख और दो बार राज्यसभा सांसद रह चुके हैं.

वह संसदीय और संवैधानिक परंपराओं से अच्छी तरह से वाकिफ हैं. कोविंद बिहार के राज्यपाल के रूप में गैर-विवादास्पद रहे हैं. उन्होंने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के साथ सौहार्दपूर्ण संबंध बनाए रखा है.

18 अगस्त 2015 को बिहार के आरा में 11 राष्ट्रीय राजमार्गों के लिए 9,700 करोड़ रुपये की परियोजना की आधारशिला समारोह के दौरान बिहार के नव नियुक्त राज्यपाल कोविंद ने राज्य के मुख्यमंत्री के साथ मंच साझा किया. मंच पर प्रधानमंत्री मोदी भी मौजूद थे, जिन्होंने अपनी खास शैली में कोविंद का परिचय कराया और उनकी जमकर तारीफ की.

उन्होंने कहा, ‘मैं नए राज्यपाल रामनाथ कोविंद जी का स्वागत करता हूं. उनका सम्मान करता हूं. वह ऐसे व्यक्ति हैं जिसने दलितों, गरीबों, वंचितों और पिछड़े लोगों के उत्थान के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित किया है. कोविंद जी उन लोगों में हैं जो बिहार के लोगों की सेवा के लिए हमेशा उपलब्ध होंगे.’

किसी ने यह नहीं सोचा होगा कि दो सालों से कम समय में कोविंद को एक और बड़ी भूमिका निभानी होगी.

दरअसल, कोविंद तीन मानदंडों को पूरा करते हैं - पहला, वह पार्टी के जमीनी स्तर के नेता हैं, जो 1977 से पार्टी से जुड़े हैं, यानी तब से जब बीजेपी की पूर्व अवतार जनसंघ जनता पार्टी का घटक हुआ करती थी. बीजेपी का संसद में पूर्ण बहुमत है और 17 राज्यों में उसकी सरकारें (14 में अकेले और बाकी में सहयोगियों के साथ मिलकर) हैं. उसे राष्ट्रपति निर्वाचक मंडल में 55 प्रतिशत वोट हासिल हैं. ऐसे में मोदी-शाह के साथ ही संघ परिवार का बाकी नेतृत्व अपने किसी नेता को राष्ट्रपति बनाने का उत्सुक था. बीजेपी और आरएसएस अपनी कतार से एक बार उप राष्ट्रपति (भैरों सिंह शेखावत) और दो बार प्रधानमंत्री (अटल बिहारी वाजपेयी और नरेंद्र मोदी) बना चुके हैं, लेकिन अब तक खुद का राष्ट्रपति पाने में सफल नहीं हुए हैं.

अगर प्रणब मुखर्जी के बाद कोविंद राष्ट्रपति बनते हैं तो यह बीजेपी-आरएसएस के इतिहास में एक नया अध्याय होगा.

विपक्ष के लिए मुश्किल होगा एका

राष्ट्रपति के उम्मीदवार के रूप में कोविंद का चयन निश्चित तौर पर विपक्षी दलों की कतारबंदी को तोड़ेगा. यह कदम सोनिया गांधी की विपक्षी एकता की परिकल्पना के लिए गंभीर खतरा पैदा करता है. विपक्ष के सबसे प्रमुख नेता नीतीश कुमार ने कोविंद की प्रस्तावित पदोन्नति को व्यक्तिगत खुशी और बिहार के लिए गौरव का विषय बताया है.

नीतीश ने सोनिया और लालू प्रसाद यादव के साथ टेलिफोन पर बातचीत की थी और उन्होंने उन्हें अपनी व्यक्तिगत संतुष्टि और खुशी से अवगत कराया. कांग्रेस के अध्यक्ष के तौर पर राष्ट्रपति पद के लिए एक दलित की उम्मीदवारी का विरोध करना मुश्किल होगा. कोविंद की उम्मीदवारी के विरोध से दलित समुदाय में अच्छा संदेश नहीं जाएगा. इससे दलितों में कांग्रेस का आधार और कमजोर होगा. इस मामले में लालू की आरजेडी भी बेहतर स्थिति में नहीं होगी.

Sonia-Nitsh

बीएसपी प्रमुख मायावती को भी इसी तरह की दुविधा का सामना करना पड़ेगा. क्या वह सबसे बड़े संवैधानिक पद के लिए एक दलित का विरोध कर सकती है, वह भी जो यूपी से है? उनके लिए समस्या यह है कि बीजेपी पहले ही दलित समुदाय में सेंध लगा चुकी है और उसका यह ताजा कदम दलितों के नेता के रूप में उनकी स्थिति को और ज्यादा प्रभावित करेगा.

हालांकि मायावती ने कोविंद की उम्मीदवारी पर कुछ आपत्ति जाहिर की और सशर्त समर्थन की बात की. अगर विपक्ष कोविंद की तुलना में कोई दूसरा बेहतर दलित उम्मीदवार खड़ा नहीं करता तो मायावती का समर्थन रहेगा.

कोविंद की उम्मीदवारी से समाजवादी पार्टी के लिए भी मुश्किल खड़ी हो गई है. अपने गृह राज्य से राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार का विरोध करते वक्त मुलायम सिंह यादव या उनके बेटे अखिलेश यादव दो बार जरूर सोचेंगे.

तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव ने मोदी से टेलीफोन पर बातचीत के बाद अपनी पार्टी टीआरएस के समर्थन की घोषणा की. वाईएसआर कांग्रेस प्रमुख जगन मोहन रेड्डी ने पहले ही समर्थन का वादा किया है. एआईएडीएमके के दोनों गुटों के साथ आने की उम्मीद है. नवीन पटनायक की बीजेडी भी साथ है.

गुलाम नबी आजाद की प्रेस कॉन्फ्रेंस से साफ तौर पर संकेत मिला कि मोदी-शाह की रामनाथ कोविंद नामक गुगली ने कांग्रेस के विकेट चटखा दिए हैं और बनने से पहले ही यूपीए-3 में दरारें आ गई हैं.

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