विधानसभा चुनाव | गुजरात | हिमाचल प्रदेश
S M L

'विरोध के स्वर दबा बीजेपी अपनी लोकतांत्रिक इमेज को नुकसान पहुंचा रही है...!'

जब शांतिपूर्ण प्रदर्शन के खिलाफ हिंसा हो जाए या फिर सेमिनार के आयोजन को निशाना बनाया जाए तो इस पर कोई बहस नहीं हो सकती

Nilanjan Mukhopadhyay Updated On: Mar 02, 2017 08:03 AM IST

0
'विरोध के स्वर दबा बीजेपी अपनी लोकतांत्रिक इमेज को नुकसान पहुंचा रही है...!'

...इसकी शुरुआत उस कहानी से होनी चाहिए जिसमें प्रशंसा के योग्य एक शख्स के मौजूदा समय में शिखर तक पहुंचने का जिक्र मिलता है. बतौर युवा, स्कूली शिक्षा के बाद आगे की पढ़ाई जारी रखने में उन्हें कोई दिलचस्पी नहीं थी. क्योंकि उनका मकसद तो जीवन के हर पहलू से साक्षात्कार करना था.

जल्दी ही उन्हें ये भरोसा भी हो चला कि उनकी जिंदगी का मकसद भौतिक सुखों की प्राप्ति नहीं है. बल्कि सियासी अभियान का संचालन करना, लोगों को लामबंद करना और किसी व्यवस्था को सुचारू रूप से संभालना उनकी नियति है.

हालांकि, जिस सियासी दल से वो जुड़े वहां के वरिष्ठ ये चाहते थे कि वो अपनी पढ़ाई पूरी करें. लेकिन उनका कहना था कि नौकरी उनकी आखिरी मंजिल नहीं है.

पार्टी के वरिष्ठों का तब ये मानना था कि पढ़ाई को सिर्फ नौकरी पाने का जरिया भर नहीं मानना चाहिए. क्योंकि ज्ञान और जानकारी के इस्तेमाल करने की कोई सीमा नहीं होती. खासकर समाज को सशक्त बनाने में.

आखिरकार, उस शख्स ने दिल्ली यूनिवर्सिटी के पत्राचार विभाग में अपना नामांकन करवाया. तब वर्ष 1974 में देश भर में इंदिरा गांधी के खिलाफ छात्रों के विरोध के चलते सियासी घमासान छिड़ा हुआ था.

ये भी पढ़ें: ये बच्चे नहीं है, इन्हें बहलाना मुश्किल है

इसके ठीक एक साल बाद इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल की घोषणा कर दी थी और अपने विरोधियों को वो गिरफ्तार करवा कर सलाखों के पीछे भिजवा रही थीं.

ऐसे समय में उस शख्स को गिरफ्तारी से बचने और अंडरग्राउंड हो जाने का निर्देश मिला. तब लगभग दो वर्षों तक इस शख्स ने खुद की पहचान बदल कर कई सियासी मिशन को अंजाम दिया.

रेलवे कंपार्टमेंट में उन्होंने कई बार बतौर कॉन्टैक्ट क्लास जाने वाले छात्र के रूप में दिल्ली तक का सफर पूरा किया. जबकि, उस दौरान उनके साथ 'इंडियन प्रेस गैग्ड', 'फैक्ट्स वर्सेज इंदिराज लायज', 'ट्वेंटी लायज ऑफ इंदिरा गांधी', 'वेन डिसओबिडियेंस टू लॉ इज ए ड्यूटी', 'ए डिकेड ऑफ इकोनॉमिक कैऑस' जैसे हानिकारक दस्तावेज हुआ करते थे

बाद में इन्हीं दस्तावेजों को दिल्ली में राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ के कार्यकर्ता विदेशी प्रतिनिधियों को बांटा करते थे. बाद के दिनों में दो यूनिवर्सिटी प्रोफेसरों से इस शख्स ने सियासी आंदोलनों के बारे में और कुछ जाना.

लेकिन, जिस वक्त ये शख्स सरकार विरोधी साहित्य को गुपचुप तरीके से एक जगह से दूसरे जगह ले जाया करते थे. उसी वक्त एक दूसरे शख्स जो बाद में उनके राजनीतिक दोस्त और सहायक बने तब दिल्ली यूनिवर्सिटी स्टूडेंड्स यूनियन के अध्यक्ष पद पर तैनात थे.

90 के दशक में अटल-आडवाणी-जोशी . फोटो: रायटर्स

बीजेपी के कई बड़े नेता अपने लोकतांत्रिक रवैये के लिए जाने जाते हैं

प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री

बीते रविवार, 26 फरवरी को जब यही शख्स लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में एक संबोधन दे रहे थे तब उन्होंने कहा कि 'अलायंस ऑफ सबवर्जन’ (विध्वंस के गठजोड़) की वजह से भारत के कैंपस में हिंसा को उकसाया जा रहा है.

अब तक पाठकों को इन दोनों शख्स के बारे में पता चल चुका होगा. क्योंकि इनमें से एक शख्स प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं, तो दूसरे शख्स वित्त मंत्री अरुण जेटली हैं.

दूसरे लोगों की तरह ही जो लोग राज्य और राष्ट्रीय सियासत से जुड़े रहे हैं, इन दोनों को भी यह अहसास है कि युवाओं के लिए आंदोलन किस स्तर का रोमांटिक अपील पैदा करता है.

ये भी पढ़ें: अब सहवाग पर बरसे उमर खालिद

राज्य-सत्ता के खिलाफ आवाज बुलंद करने की शक्ति होने के भरोसे से बड़ा कोई आदर्श छात्रों के लिए नहीं हो सकता है और छात्रों के लिए इससे बड़ी कोई सच्चाई नहीं हो सकती है कि वो जिन बातों पर भरोसा करते हैं वही सच है.

भारतीय संस्कृति में सवाल-जवाब करने की परंपरा काफी पुरानी है. शास्त्रार्थ यानी धार्मिक विषयों पर बहस करना हिंदू दर्शन का अभिन्न हिस्सा रहा है. विद्रोहियों का महान नेतृत्व देने का इतिहास काफी समृद्ध रहा है.

लेकिन ये भी जरूरी नहीं है कि विद्रोही हमेशा महान नेता के तौर पर कामयाब रहे हों. विचारों की जीत या हार खुली सड़क पर तय नहीं होना चाहिए. बल्कि वाद-विवाद जहां होता है वहां इसे तय किया जाना चाहिए.

राजनीतिक नेतृत्व के सामने युवा जोश और ताकत को दिशा देना, उसकी शक्ति को देशहित में इस्तेमाल करने की चुनौती है. तो युवा शक्ति के चलते सियासी अराजकता की स्थिति पैदा न हो इसे भी सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी है और ये दोनों मकसद हिंसा से नहीं पूरे हो सकते हैं

डॉयलाग के जरिए ज्यादा से ज्यादा संवाद कायम करने की कोशिश होनी चाहिए. अगर विरोधियों को मनाने में मुश्किल हो तो जो ज्यादा से ज्यादा गैर-राजनीतिक छात्रों को संवाद कायम करने के लिए चुना जाना चाहिए.

छात्र संगठनों को आपस में एक दूसरे से बात करने की जरूरत है. जरूरत तो शक्ति प्रदर्शन के बजाए तर्क के आधार पर अपनी बात को स्वीकार योग्य बनाने की भी है.

New Delhi: Students and teachers of Delhi University, JNU and Jamia during their protest march against ABVP at North Campus in New Delhi on Tuesday. The sudents held placards with messages like "Save the varsities from the onslaught of ABVP" and "Your nationalism is not above our democracy". PTI Photo by Shahbaz Khan (PTI2_28_2017_000169B)

रामजस कॉलेज में आयोजित सेमिनार में एबीवीपी के छात्रों ने हिंसात्मक रवैया अपनाया

जेएनयू बनाम रामजस

पिछले साल जो घटना जेएनयू में हुई या इस साल जो रामजस कॉलेज में हो रहा है. उससे साफ है कि एबीवीपी की रणनीति बहुसंख्यकों में अल्पसंख्यकों के प्रति असुरक्षा की भावना पैदा कर उसके सियासी इस्तेमाल करने की है. ये कहना कि एबीवीपी राष्ट्रीयता की जो परिभाषा गढ़ रही है वही लोकतंत्र है, गलत होगा.

1974 में जब इंदिरा गांधी के खिलाफ आंदोलन की आग गुजरात और बिहार से होते हुए समूचे देश में फैलने लगी थी. तब इस आंदोलन को समर्थन देने वालों में एबीवीपी प्रमुख संगठन था. उस वक्त कांग्रेस का छात्र संगठन एनएसयूआई विरोधियों के आंदोलन की धार को कुंद करने में लगा हुआ था. तब एनएसयूआई भी तत्कालीन प्रधानमंत्री के उस दावे को सही ठहराने में लगा था कि गुजरात में नवनिर्माण आंदोलन हो या फिर बिहार में छात्र संघर्ष समिति – ये सभी देशद्रोही हैं जिन्हें ‘फॉरेन हैंड’ का समर्थन हासिल है.

इंदिरा गांधी अपने शासनकाल के ज्यादातर दिनों तक एक तरह की सियासी धारणा को मजबूत करती रहीं कि, उनके खिलाफ किए जा रहे सभी विरोधों के पीछे विदेशी ताकत की साजिश है

सरकार और बीजेपी में एबीवीपी और इसके समर्थकों के जो साथ देने वाले हैं, वो आज उसी प्रकार की असुरक्षा की रणनीति को अमल में ला रहे हैं. लेकिन वो ये नहीं समझ रहे हैं कि इससे प्रधानमंत्री के विकास के एजेंडे को चोट पहुंच रही है.

इतिहास में अपनी छाप छोड़ने की कोई भी कोशिश विकास के एजेंडे को हकीकत में तब्दील कर ही कामयाब हो सकती है, ना कि संकीर्णवाद और अलगाववाद की भावना को उकसा कर.

ये भी पढ़ें: पुलिस ने कहा, कन्हैया कुमार को नहीं दी क्लीन चिट

क्योंकि मोदी सरकार की बेटी पढ़ाओ-बेटी बचाओ योजना का भविष्य पर जितना सकारात्मक असर होगा वो शायद गुरमेहर कौर को निशाना बनाने से नहीं हो सकता. सियासी रणनीति कभी भी बेहतर गर्वनेंस का मॉडल नहीं हो सकती.

विरोधी छात्र संगठन के एक सेमिनार के आयोजन को रोक कर या फिर विरोध प्रदर्शन कर रहे लोगों पर हमला कर एबीवीपी अपने उन राजनीतिक सिद्धांतों को खतरा पहुंचा रही है, जिसकी बदौलत ये छात्र संगठन इतनी ऊंचाइयों तक पहुंची है.

DU Vivad

बीजेपी नेता चाहते हैं कि विरोधी छात्रों की गतिविधियां क्लासरूम से बाहर न जाए

एबीवीपी को अपने गौरवशाली अतीत की ओर झांकने की जरूरत है. इसे याद करना चाहिए कि साल 1949 में एबीवीपी ही पहला देशव्यापी छात्र संगठन था. अपनी वेबसाइट में ये संगठन इस बात का दावा करता है कि वो विभाजनकारी सियासत के खिलाफ है.

क्लासरूम तक सीमित गतिविधि

संगठन का मानना है कि मोटे तौर पर समाजिक गतिविधियां कभी भी गैर-राजनीतिक नहीं हो सकतीं. संगठन का विश्वास है कि देश के नागरिक होने के नाते छात्रों को मौजूदा सामाजिक और राजनीतिक विषयों पर प्रतिक्रिया देना चाहिए.

इस लिहाज से अगर विरोधी अलग-अलग विषयों पर अपनी विचारधारा को आगे बढ़ा रहे हैं तो इसके जवाब में एबीवीपी को भी अपनी विचारधारा को आगे बढ़ाना चाहिए. लेकिन विरोधियों की आवाज को दबाने के लिए कैंपस में वाद- विवाद को रोकना या हिंसात्मक रास्ता अख्तियार करना कहीं से भी सही नहीं कहा जा सकता.

कई बीजेपी नेताओं ने छात्रों से क्लासरूम तक अपनी गतिविधियों को सीमित रखने की अपील की जो यूनिवर्सिटी की बुनियादी धारणा के विपरीत है. लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में जेटली ने कहा कि इस बात पर बहस होना चाहिए कि क्या अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर भारत की संप्रभुता पर सवाल खड़े किए जा सकते हैं

लेकिन, जब शांतिपूर्ण प्रदर्शन के खिलाफ हिंसा हो जाए या फिर सेमिनार के आयोजन को निशाना बनाया जाए तो इस पर कोई बहस नहीं हो सकता. हालांकि, आजादी शब्द को लेकर तब सवाल खड़े हो जाते हैं जब इसका इस्तेमाल शाब्दिक अर्थ से ज्यादा किसी धारणा के तौर पर किया जाने लगता है.

Arun-Jaitley

रामजस कॉलेज की घटना पर दिए बयान के लिए अरुण जेटली को विरोधियों की आलोचना झेलनी पड़ी

कॉलेज के कैंपस विचारधारा और सिद्धान्तों के टकराव का अखाड़ा बने रहें. सरकार के पोषित गुंडों को कुछ भी कर गुजरने के लिए आजाद करने के बजाए शब्दों के जरिए विचारधारा की जंग को जीतने का असर कहीं ज्यादा होता है.

सरकारी योजनाओं के खिलाफ विरोध करने का अधिकार या बीजेपी के विरोध में दी गई राय को कुचलने से मोदी और उनके कई साथियों के सियासी अतीत, वर्तमान और भविष्य को एक तरह से अवैध साबित करने जैसा होगा.

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi