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संघ से लड़ाई के लिए नहीं कांग्रेस को बचाने के लिए राहुल पढ़ें गीता-उपनिषद

राहुल अपने क्रोध और आवेग की वजह से आतर्किक होने के साथ वर्तमान राजनीति में अप्रासंगिक भी नजर आ रहे हैं

Kinshuk Praval Kinshuk Praval Updated On: Jun 05, 2017 03:09 PM IST

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संघ से लड़ाई के लिए नहीं कांग्रेस को बचाने के लिए राहुल पढ़ें गीता-उपनिषद

गीता में जीवन का सार है. श्रीकृष्ण ने महाभारत में अर्जुन को उपदेश दिए थे. उन उपदेशों से अर्जुन के लिये युद्ध जीतना आसान हो गया. कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी भी राष्ट्रीय सेवक संघ के खिलाफ युद्ध लड़ रहे हैं. ये 'धर्मयुद्ध' संघ की विचारधारा के खिलाफ है. इस युद्ध के लिये वो गीता और उपनिषद का सहारा ले रहे हैं.

पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक राहुल ने कहा कि ‘इन दिनों मैं उपनिषद और गीता पढ़ रहा हूं, क्योंकि मैं आरएसएस और बीजेपी से लड़ रहा हूं. भारत सिर्फ एक विचार नहीं है, भारत हजारों विचारों वाला है और संघ का यह एक विचार कभी भी हजारों विचारों के भारत को कुचल नहीं सकता.'

महाभारत में धर्मयुद्ध के समय गीता के उपदेश अर्जुन के लिए थे. लेकिन यहां राहुल गांधी के बयान से ये विरोधाभास हो रहा है कि कलियुग के धर्मयुद्ध में श्रीकृष्ण कौन हैं तो अर्जुन कौन?

दूसरी बात ये है कि राष्ट्रीय सेवक संघ के साथ राहुल गांधी गीता पढ़कर कौन सी आध्यात्मिक लड़ाई लड़ना चाहते हैं?

संघ खुद को हमेशा सामाजिक संगठन मानता है. ऐसे में संघ के साथ राहुल कौन सी राजनीतिक लड़ाई लड़ रहे हैं जिसके लिये उन्हें गीता के उपदेश पढ़ने और फिर अपने कार्यकर्ताओं में जोश भरने की जरूरत महसूस हो रही है.

बड़ा सवाल ये है कि 47 साल की उम्र का तजुर्बा, देश के सबसे बड़े राजनीतिक परिवार के बेटे और देश की सबसे पुरानी और बड़ी पार्टी के उपाध्यक्ष को उत्तराधिकार के सिलसिलों के बावजूद संघ और बीजेपी से राजनीतिक लड़ाई के लिये गीता और उपनिषद की जरूरत कैसे पड़ गई?

श्री कृष्ण के गीता उपदेश हर युग, काल, परिस्थिति में अपना प्रभाव रखते हैं. गीता में कहा गया है कि ‘मनुष्य को सबसे पहले अपने क्रोध पर काबू करना चाहिये. क्रोध से भ्रम पैदा होता है. भ्रम से बुद्धि व्यग्र होती है. जब बुद्धि व्यग्र होती है तब तर्क नष्ट हो जाता है. जब तर्क नष्ट होता है तब व्यक्ति का पतन हो जाता है.’

गीता के ये उपदेश कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी और उनकी पार्टी कांग्रेस का अक्स नजर आते हैं. इस समय कांग्रेस पार्टी की स्थिति तर्कहीन होने की वजह से पतन की तरफ है और राहुल अपने क्रोध और आवेग की वजह से अतार्किक होने के साथ वर्तमान राजनीति में अप्रासंगिक भी नजर आ रहे हैं. जब वो बांहें चढ़ाते हुए प्रेस कॉन्फ्रेंस में कागज फाड़ते हैं तब उनका क्रोध नजर आता है और जब वो संसद में भूचाल लाने की बात करते हैं तब उनका आवेग फूट पड़ता है.

Rahul Gandhi hoisting flag at TNCC office

अपने बयानों से पार्टी को मुश्किल में डालते हैं राहुल गांधी

राहुल गांधी का एक सूत्री एजेंडा ही कांग्रेस को मुश्किलों की तरफ ले जा रहा है. संघ पर राहुल गांधी लगातार तीखे हमले कर रहे है. इससे पहले उन्होंने ये तक पूछा था कि आजादी की लड़ाई में संघ का क्या योगदान था?

राहुल अपने बयानो से पार्टी को मुश्किलों में डालने का काम करते आए हैं. साल 2014 में महाराष्ट्र के भिवंडी में एक रैली में राहुल गांधी ने सार्वजनिक रूप से कहा कि गांधी जी की हत्या के पीछे संघ का हाथ है. जिसके बाद संघ ने बिना देर किये राहुल के खिलाफ मानहानि का मुकदमा दर्ज कर दिया.

इसके बाद सुप्रीम कोर्ट से भी राहुल गांधी को झटका मिला. सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि राहुल गांधी अगर अपने बयान के लिये माफी नही मांगना चाहते तो उन्हें निचली अदालत में मुकदमे का सामना करना चाहिये.

जिसके बाद साल 2017 के विधानसभा चुनावों में सियासी फायदा देखते हुए कांग्रेस ने कोर्ट में दाखिल वो याचिका वापस ले ली जिसमें संघ के मानहानि के मुकदमे को खारिज करने की अपील की गई थी. कांग्रेस ने इसे विचारधारा की लड़ाई बताते हुए संघ पर निशाना साधते हुए कहा कि ये लड़ाई संघ और कांग्रेस की भारतीयता की विचारधारा के बीच है.

लेकिन एक दूसरी विचारधारा ये कहती है कि गांधी के आदर्शों की हत्या तो आजादी के पहले ही हो चुकी थी. तभी गांधी जी ने निराश हो कर आजादी के बाद कहा था कि कांग्रेस को अब समाप्त कर देना चाहिये क्योंकि कांग्रेस का असली मकसद पूरा हो गया है.

अब जबकि देश की राजनीति में एक नए परिवर्तन का दौर दिख रहा है जिसमें कांग्रेस हाशिए पर जाती दिख रही है तो राहुल गांधी संघ पर निशाना लगाते हुए कांग्रेस को रिवाइव करने की कोशिश कर रहे हैं.

Harish Rawat Rahul Gandhi

कांग्रेस के पुनर्जीवित करने का प्रयास रंग लाएगा

संघ पर हमले के जरिये राहुल गांधी ये जताने की कोशिश कर रहे हैं कि आजादी के बाद जिस धर्मनिरपेक्षता को कांग्रेस ने अपना आधार बनाया था, संघ उसी भारतीयता को ही तार-तार कर रहा है. राहुल बार बार जनता से कहते हैं कि उसे कांग्रेस और संघ की विचारधाराओं के बीच चुनाव करना है. लेकिन हालिया चुनावी नतीजों को देखें तो राहुल को ये समझ जाना चाहिये कि वो बिना तथ्य के किसी संगठन पर आरोप लगा कर जनता को बरगला नहीं सकते हैं. अगर संघ एक विचारधारा है तो बीजेपी को मिल रही देशभर में लगातार जीत किस तरफ इशारा कर रही है?

संघ के खिलाफ अपने तथाकथित धर्मुयद्ध में राहुल गीता का ज्ञान बटोर रहे हैं. उन्हें ये ज्ञान जरूर प्राप्त हो चुका है कि देश में सिमटती कांग्रेस की जमीन के पीछे संघ की बड़ी भूमिका है. कांग्रेस मुक्त भारत के ऐजेंड पर बीजेपी और संघ काफी आगे बढ़ चुके हैं. ऐसे में कांग्रेस की रणनीति सीधे संघ को निशाने पर लेकर एक बार फिर धर्मनिरपेक्षता की आड़ में अल्पसंख्यक वोटों को अपनी तरफ लुभाने की कोशिश भर है.

अब राहुल उम्र के इस पड़ाव में गीता का ज्ञान बटोर रहे हैं तो ये जानना भी जरूरी है कि राहुल आध्यात्म की राह पर राजनीति की पाठशाला कैसे चलाएंगे?

कांग्रेस से जुड़ने वाली नई पीढ़ी दिल वाले दुल्हनिया देख कर बड़ी हुई. उसके युवा कांग्रेसियों में शाहरूख खान आइकॉन रहे. इस नई पीढ़ी ने राहुल गांधी का ग्लैमर देख कर ही कांग्रेस से जुड़ने का फैसला किया. ऐसे में सवाल ये है कि क्या ये नई पीढ़ी राहुल से मिले गीता के ज्ञान को समझने के लिये आज का अर्जुन बनने को तैयार होगी?

आखिर राहुल आध्यात्म अवतार में क्यों नजर आने लगे हैं? सोशल मीडिया में सवाल उठ सकता है कि क्या गीता के उपदेशों में संघ और बीजेपी को डीकोड करने का कोई फॉर्मूला कांग्रेस उपाध्यक्ष के हाथ लग गया है?

राहुल को कभी हर धर्म के पैगंबर और संत में कांग्रेस का हाथ दिखाई देता है तो दलित अधिकार सम्मेलन में दलितों के उत्थान के लिये वो इस्केप वेलोसिटी की ताकत की जरूरत की बात करते हैं. बेहतर होगा कि संघ से लड़ाई करने के लिये गीता पढ़ने की बजाए राहुल गीता पर हाथ रखकर कसम खाएं कि कांग्रेस के उत्थान के लिये वो 'इस्केप वेलोसिटी' की ताकत इकट्ठा करेंगे.

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