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राहुल गांधी को उन पर बनाए चुटकुलों से ऊपर उठकर देखना होगा

आपको यूएस के दौरे में दिए राहुल के भाषणों पर भी गौर करना चाहिए. शायद मनमोहन सिंह की तरह राहुल गांधी के लिए आने वाला वक्त उतना अनुदार न हो जितना अभी है

Vivek Anand Vivek Anand Updated On: Sep 20, 2017 04:12 PM IST

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राहुल गांधी को उन पर बनाए चुटकुलों से ऊपर उठकर देखना होगा

राहुल गांधी दो हफ्ते के अमेरिका दौरे पर हैं. वो ग्लोबल थिंकर्स, अमेरिकी नेताओं, दक्षिणी एशियाई मामलों के एक्सपर्ट और अमेरिका में बसे भारतीयों से मिल रहे हैं. मंगलवार को वो प्रिंसटन यूनिवर्सिटी के छात्रों से मिले. उन्होंने वाशिंगटन पोस्ट की संपादकीय टीम से भी बातचीत की है. इसके पहले वो बर्कले में कोलंबिया यूनिवर्सिटी के छात्रों से भी मिले थे. उनके इस दौरे पर एक बात जो थोड़ी ज्यादा गंभीरता से कही जा रही है. वो ये है कि राहुल गांधी वैसे बिल्कुल भी नहीं है, जैसा उन्हें दिखाया या बताया जाता है.

सोमवार को अमेरिका में रिपब्लिकन रणनीतिकार पुनीत अहलूवालिया ने राहुल गांधी से मिलने के बाद कहा, ‘मैं कहूंगा कि, वह ऐसे व्यक्ति प्रतीत नहीं हुए, जिन्हें मुद्दों की जानकारी ना हो. वह मुद्दों को समझते हैं. वह जमीनी स्तर की हकीकत समझने वाले नेता के तौर पर दिखे, सभी लोग जब बाहर निकले तो उनके मन में चर्चा को लेकर बहुत सकारात्मक भाव था.’

हिंदुस्तान टाइम्स के हवाले से लिखा गया कि राहुल गांधी ने व्हाइट हाउस के पॉलिसी एक्सपर्ट, पॉलिटिकल एक्सपर्ट और जिन सांसदों से मुलाकात की वो सब कोई आसानी से प्रभावित होने वाले लोगों में से नहीं हैं. जबकि उनमें से ज्यादातर लोगों की राय थी कि राहुल गांधी ऐसे व्यक्ति नहीं हैं, जैसा कि उनके बारे में पढ़ सुनकर उन्होंने अपनी धारणा बना रखी थी. राहुल गांधी ने अपनी बातों से लोगों पर असर छोड़ा है. उन्होंने मजबूती से अपने विचार रखे और उनके विचारों से पता चलता है कि कई मसलों के बारे में उन्हें जमीनी स्तर के मालूमात हैं.

राहुल गांधी को परखने में हम भूल तो नहीं कर रहे

पिछले हफ्ते राहुल गांधी ने बर्कले के कोलंबिया यूनिवर्सिटी में भी असरदार भाषण दिया था. लोगों ने उनके भाषण की तारीफ की थी. राहुल गांधी के बारे में ऐसे विचारों से दो सवाल उठते हैं. पहला कि- क्या राहुल गांधी विदेशों में जाकर अपनी बात ज्यादा अच्छे तरीके से रख पाते हैं? जिसकी वजह से वहां के लोग उनसे इस कदर प्रभावित होते हैं. जबकि वो यहां यानि अपने देश में अपना संदेश लोगों के बीच सही तरीके से नहीं पहुंचा पाते. दूसरा- या फिर राहुल गांधी को यहां सही तरीके से पेश ही नहीं किया जाता, मीडिया उनके साथ नाइंसाफी करता है या फिर जैसे कांग्रेस के नेता आरोप लगाते हैं कि बीजेपी का आईटी सेल जानबूझकर राहुल गांधी के बारे में बेसिरपैर की बातें फैलाकर उनकी छवि को प्रभावित करता है.

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प्रिंसटन यूनिवर्सिटी में राहुल गांधी

इस यूएस दौरे में दिए राहुल गांधी के दो भाषणों से ही समझा जा सकता है कि उनकी राजनीतिक परिपक्वता को कम आंकने वालों को उन पर फिर से विचार करने की जरूरत है. प्रिंसटन यूनिवर्सिटी में राहुल गांधी ने कहा कि मोदी सरकार का मेक इन इंडिया ही एक ऐसा प्रोजेक्ट है, जिसके बारे में वो कह सकते हैं कि ऐसा प्रोजेक्ट कांग्रेस के राज में शुरू होना चाहिए था.

राहुल गांधी ने कहा, 'मुझे मेक इन इंडिया का कॉन्सेप्ट पसंद है. लेकिन ये प्रोजेक्ट उसको टारगेट नहीं कर रहा है जिसे करना चाहिए. पीएम मोदी को लगता है कि इसके जरिए बड़े उद्योगों को टारगेट करना चाहिए, जबकि मुझे लगता है कि छोटी और मंझोली कंपनियों को टारगेट करना ज्यादा सही रहेगा. इन्हीं कंपनियों से रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे.’

अपने इस एक बयान से राहुल गांधी ने दो संदेश एकसाथ दे दिए. पहली- कि वो सिर्फ विपक्ष में होने की वजह से विरोध की राजनीति नहीं कर रहे हैं. इसलिए उन्होंने मेक इन इंडिया प्रोजेक्ट की तारीफ भी कर दी. लेकिन दूसरे ही लाइन में उन्होंने ये भी बता दिया कि प्रोजेक्ट अच्छा होने से कुछ नहीं होता अगर उसे ठीक से लागू नहीं किया जाए. इसे राहुल गांधी का सधा हुआ जवाब माना जाना चाहिए.

मोदी सरकार को सधा हुआ जवाब दे रहे हैं राहुल गांधी 

राहुल के यूएस दौरे में ये दूसरा मौका है, जब उन्होंने पहली लाइन में पीएम मोदी की तारीफ की और दूसरे ही लाइन में सधा हुआ तंज भी कर डाला. इसके पहले उन्होंने बर्कले के कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी में पीएम मोदी के अच्छे कम्यूनिकेटर होने की बात कबूल करते हुए तारीफ की थी. लेकिन अपने बयान के दूसरे हिस्से में ये भी कह डाला था कि पीएम मोदी अच्छे वक्ता हैं लेकिन अच्छे श्रोता बिल्कुल भी नहीं है. वो बीजेपी के नेताओं की भी नहीं सुनते.

राहुल गांधी ने कहा था, 'मैं विपक्ष का नेता हूं लेकिन मिस्टर मोदी मेरे भी प्रधानमंत्री हैं. उनके पास कुछ खास काबिलियत है. वो एक अच्छे कम्यूनिकेटर हैं, वो मेरे से भी अच्छे वक्ता हैं और वो अच्छी तरह जानते हैं कि एक भीड़ के तीन और चार ग्रुप्स को किस तरह से मैसेज देना है. लेकिन वो बीजेपी के नेताओं की भी नहीं सुनते हैं.'

अमेरिका में राहुल गांधी, पीएम मोदी और उनकी सरकार पर चालाकी भरा हमला कर रहे हैं. इस हमले का असर भी हो रहा है. बीजेपी को उनके बयानों पर जवाब देना पड़ रहा है. एक हफ्ते पहले बर्कले में राहुल गांधी ने कांग्रेस में राजनीतिक वंशावली की परंपरा पर कहा था कि ये परंपरा तो हमारे देश में पहले से है. उनके इस बयान पर बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह आज तक उन्हें जवाब दे रहे हैं. अगर ये नौबत आई है कि राहुल के बयान का एक हफ्ते बाद भी बीजेपी अध्यक्ष जवाब देने को मजबूर हैं तो इसे राहुल के बयानों के असर से जोड़कर ही देखा जाना चाहिए.

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अमेरिका में राहुल गांधी

यूपीए 2 के शासनकाल के दौरान उस वक्त के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह सरकार के घोटालों में बुरी तरह से फंस गए थे. उनके लिए जवाब देना मुश्किल पड़ रहा था. मनमोहन सिंह की भीषण आलोचना हो रही थी जबकि उनकी ईमानदारी और विश्वसनीयता पर किसी को भी संदेह नहीं था. मनमोहन सिंह ने ऐसी स्थिति पर कहा था कि मीडिया उनके प्रति जितना अनुदार है, शायद इतिहास उतना न हो. इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो लगता है कि राहुल गांधी के साथ भी ऐसी ही परिस्थितियां बन गई हैं या फिर बना दी गई हैं. उनके प्रति मीडिया जितना अनुदार है, उतना होना नहीं चाहिए.

राहुल गांधी को विरासत में कांग्रेस की नाकामियां भी मिली हैं

राहुल गांधी ने अभी किया ही क्या है जिसके लिए उन्हें इतनी आलोचनाओं का सामना करना पड़े. उन्हें तो आलोचनाएं भी विरासत में मिली हैं. कांग्रेस के दौर की नाकामियां उनके हिस्से में आई हैं, जिनका बचाव करने में उन्हें मुश्किल आती है. वो लच्छेदार भाषण नहीं दे पाते. अपने बयानों में कई बार गलतियां कर जाते हैं. कभीकभार अपनी भाषा में अटक जाते हैं. शायद अंग्रेजी में वो ज्यादा कंफर्टेबल महसूस करते हों, इसलिए विदेशों में उनकी भाषणों की इतनी तारीफ भी हो रही है.

हिंदुस्तान टाइम्स के हवाले से राहुल के अमेरिका दौरे में उनसे मिले एक शख्स ने कहा, मैं उन्हें जानता हूं, कुछ वक्त से मिलता रहा हूं. वो अपने विचारों और तथ्यों में एकदम परफेक्ट दिखे. एक शख्स ने कहा, ‘हममें से ज्यादातर लोग उनको बोलते देखकर इम्प्रेस दिखे. उन्होंने अपनी बात शानदार तरीके से रखी.’ सोमवार को हुई बैठक से बाहर निकलकर आए एक शख्स ने कहा, जैसा मैंने सुन रखा था, उससे वो ज्यादा अच्छे निकले. तथ्यों के साथ अपनी बात रखी.’

इन बैठकों में राहुल के साथ मौजूद सैम पित्रोदा का कहना है, ‘लोगों ने कहा कि हमें जैसा बताया गया था, वह बिलकुल उसके विपरीत हैं. उन्होंने कहा कि वह तर्कपूर्ण हैं, गंभीरता से विचार करते हैं, वह मुद्दों को समझते हैं.’ सैम पित्रोदा का आरोप है कि राहुल गांधी की नकारात्मक छवि बना दी गई है.

राहुल गांधी को अभी और परखने की जरूरत है. इसी के साथ एक सवाल है कि राहुल गांधी का नाम सुनते ही आपको उनकी कौन सी बात याद आती है. शायद आपको याद आएगी- आलू की फैक्ट्री, या नारियल जूस वाली कहानी, या फिर याद आएंगे उनके ऊपर चल रहे सोशल मीडिया के जोक्स. क्या इनके आधार पर राहुल को जज करना उनके साथ ज्यादती नहीं है. आपको यूएस के दौरे में दिए उनके भाषणों पर भी गौर करना चाहिए. शायद मनमोहन सिंह की तरह राहुल गांधी के लिए आने वाला वक्त उतना अनुदार न हो जितना अभी है.

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