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इन सीनियर नेताओं को नजरअंदाज नहीं कर सकते राहुल!

कभी युवाओं को पार्टी में तरजीह देने वाले राहुल अब तजुर्बेकार नेताओं में जीतने की क्षमता देख रहे हैं

FP Staff Updated On: Oct 17, 2017 10:43 PM IST

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इन सीनियर नेताओं को नजरअंदाज नहीं कर सकते राहुल!

पार्टी का अध्यक्ष चुने जाने से पहले लगता है कि कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने अपनी रणनीति बदल दी है. इसे राजनीति की जरूरत कहिए कि कभी युवाओं को पार्टी में तरजीह देने वाले राहुल अब तजुर्बेकार नेताओं में जीतने की क्षमता देख रहे हैं.

इसका उदाहरण हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनावों के लिए वीरभद्र सिंह का अभियान समिति के अध्यक्ष के रूप में चुना जाना है. ये बात साबित करती है कि एक तरफ भले ही कांग्रेस पीढ़ीगत परिवर्तन की तैयारी में है, लेकिन वो अभी भी वरिष्ठ नेताओं को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं कर सकती.

राहुल ने हाल के दिनों में कुछ कटाक्ष भरे ट्वीट्स और आक्रामक अभियान से सभी का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है, लेकिन जब बात असल राजनीति और दूसरे क्षेणी के नेतृत्व को खड़ा करने की बात आती है तो वो अब तक विफल रहे हैं.

परिपक्व नहीं हुए हैं युवा नेता

राहुल उस पार्टी के अध्यक्ष बनने जा रहे हैं जो इस वक्त अपनी अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है, उन्हें किसी ताकतवर का समर्थन नहीं हासिल है.

उनके आमपास कुछ सक्षम और उज्जवल नेता जैसे सचिन पायलट, ज्योतिरादित्य सिंध्या, आरपीएन सिंह, राम्या, जितिन प्रसाद और मिलिंद देवड़ा हैं लेकिन अभी भी वो राजनीति में पूरी तरह परिपक्व नहीं हैं.

हाल के राज्यसभा चुनावों में चतुर राजनेता अहमद पटेल ने नई पीढ़ी के नेताओं का ये दिखा दिया था कि उन्हें अभी बहुत कुछ सीखना बाकी है जिससे वो अपने विरोधियों को मात दे सके.

न्यूज़ 18 को पता लगा है कि जहां एक तरफ राहुल गांधी एक युवा टीम बनाने में जुटे हैं, वहीं महत्वपूर्ण आगामी चुनावों के लिए वो तजुर्बेकार नेताओं पर ही भरोसा दिखा रहे हैं.

नेतृत्व का उम्र से कोई नाता नहीं 

कांग्रेस पर कई किताबें लिखने वाले पत्रकार रशीद किदवई कहते हैं कि राहुल को ये समझना होगा कि नेतृत्व का उम्र से कोई नाता नहीं है.

रशीद किदवई कहते हैं, 'वीरभद्र सिंह ने 78 साल की उम्र में 2012 में हिमाचल जीता था जब कांग्रेस की लोकप्रियता घट रही थी. कैप्टन अमरिंदर सिंह ने 75 साल की उम्र में पार्टी के लिए पंजाब जीता. महात्मा गांधी 45 की उम्र में भारत लौटे और अगले तीन दशकों में राजनीति के चरम पर पहुंचे. इंदिरा गांधी के खिलाफ जेपी आंदोलन चलाने वाले जयप्रकाश नारायण भी उस वक्त बुज़ुर्ग हो चुके थे. वीपी सिंह और अन्ना हजारे भी ऐसे ही कुछ उदाहरण हैं.'

एक और बढ़िया उदाहरण है राजस्थान जहां साबित हुआ है कि तजुर्बेकार नेता अभी भी प्रासंगिक हैं. राहुल गांधी के करीबी सचिन पायलट को पिछले एक साल से पार्टी का राज्य प्रमुख बनाया गया है. पायलट पूरे राजस्थान में घूम-घूमकर सुनिश्चित कर रहे हैं कि 2018 विधानसभा चुनावों में कांग्रेस कड़ी टक्कर दे सके.

rahul gandhi- ahmed patel

लेकिन अशोक गहलोत फैक्टर को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है. इस बात को सुनिश्चित करने के लिए कि गहलोत हस्तक्षेप न करें, उन्हें गुजरात प्रभारी बनाया गया था.

सूत्रों के मुताबिक गहलोत की अभी भी राजस्थान में पकड़ है. गहलोत के पास ताकत, संख्या और जाति समीकरण है जिसका मतलब है कि राहुल को बूढ़े घोड़े पर जीत के लिए आश्रत होना पड़ेगा.

कर्नाटक में भी पार्टी ने सिद्धारमैया पर भरोसा जताया है. उम्मीद है कि एक बार प्रचार का काम शुरू हो जाए तो राहुल आधिकारिक तौर पर उनका नाम मुख्यमंत्री के लिए घोषित कर दें.

खतरा उठाने की हालत में नहीं है कांग्रेस

मध्यप्रदेश में हालात अभी साफ नहीं हैं और इसे जानबूझकर ऐसा रखा गया है. ये एक ऐसा राज्य है जहां कांग्रेस पार्टी के कई ग्रुप बने हुए हैं और पार्टी कई हिस्सों में विभाजित दिख रही है. भले ही प्रतीत हो रहा है कि दिग्विजय सिंह ने खुद को रेस से बाहर रखा है, उनकी 'नर्मदा यात्रा' मानों दर्शा रही है कि वो सभी को दिखाना चाहते हैं कि मध्यप्रदेश की राजनीति में अभी भी वो प्रासंगिक हैं.

कमलनाथ ने साफ कर दिया है कि मुख्यमंत्री की रेस में वो शामिल नहीं हैं जिससे ज्‍योतिरादित्‍य सिंधिया इस पद के लिए अहम दावेदार हो गए हैं. लेकिन ऐसे वक्त पर जब विधानसभा चुनावों में एक साल से भी कम वक्त रह गया है, पार्टी किसी का विरोध कर खतरा नहीं मोलना चाहती. इसलिए उसने अभी तक औपचारिक रूप से सिंधिया के नाम की घोषणा नहीं की है.

एक वरिष्ठ नेता ने कहा, 'हां, हमें पीढ़ीगत परिवर्तन की जरूरत है, लेकिन क्या किसी ने नई पीढ़ी को प्रशिक्षित किया है. कांग्रेस आज अपने अस्तित्व और प्रासंगिकता की लड़ाई लड़ रही है और ऐसे में हम कोई खतरा नहीं उठा सकते. इसलिए वरिष्ठ नेता सबसे सटीक हैं.'

एक ऐसा सच जिसे हाल ही में राहुल गांधी ने भी अमेरिका में स्वीकारा था जब उन्होंने कहा था कि, 'हमें वरिष्ठों के अनुभव की भी जरूरत पड़ेगी.' ये साफ है कि कांग्रेस अभी भी अतीत से दूर जाने के लिए तैयार नहीं है.

(सीएनएन न्यूज 18 के लिए पल्लवी घोष की रिपोर्ट)

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