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बापू और नेहरू का जिक्र कर कब तक खुद को बचाएंगी सोनिया

भारत छोड़ो आंदोलन के समय को याद करके सोनिया गांधी ने आरएसएस पर निशाना साधा है

Vivek Anand Vivek Anand Updated On: Aug 09, 2017 05:36 PM IST

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बापू और नेहरू का जिक्र कर कब तक खुद को बचाएंगी सोनिया

भारत छोड़ो आंदोलन की 75वीं वर्षगांठ पर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी संसद में जमकर बोलीं. उन्होंने देश के लिए कुर्बान होने वाले शहीदों को याद किया. लेकिन इस मौके पर वो संघ को निशाने पर लेने से नहीं चूकीं. बिना नाम लिए सोनिया गांधी ने संघ पर निशाना साधते हुए कहा, 'भारत छोड़ो आंदोलन हमारी आजादी की लड़ाई में क्रांतिकारी परिवर्तन की मिसाल बन गया. लेकिन इसके लिए हमें अनगिनत कुर्बानियां देनी पड़ीं.'

'आज यही कुर्बानियां हमें मौका देती हैं कि हम उनके प्रति आभार व्यक्त करते हुए उन्हें याद करें. आज जब हम इन शहीदों को नमन कर रहे हैं, हमें नहीं भूलना चाहिए कि उस दौर में ऐसे संगठन और लोग भी थे, जिन्होंने भारत छोड़ो आंदोलन का विरोध किया था. उन तत्वों का भारत को आजादी दिलाने में कोई योगदान नहीं रहा.'

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भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान की तस्वीर

सोनिया गांधी का साफ इशारा संघ की तरफ था. संघ का विरोध करने वाले लोग अक्सर ये बातें दोहराते रहते हैं. अपने सबसे बुरे दौर में चल रही कांग्रेस के लिए ये बचने का सबसे अच्छा तरीका है कि वो आजादी के आंदोलन से अपने नेताओं का जुड़ाव दिखाकर उसी संदेश को बार-बार स्थापित करने की कोशिश करे जो वो पिछले 70 सालों से करती आ रही है.

लेकिन इसके बीच एक सवाल ये भी है कि अपने हिसाब से भारत छोड़ो आंदोलन को याद करने वाली सोनिया गांधी को क्या ये नहीं पता कि भारत छोड़ो आंदोलन के विरोध में कम्युनिस्ट पार्टियां भी थीं जो आज उनकी साझीदार बनी हुई हैं. ऐसे तत्वों को अपने सहूलियत के लिए वो क्यों भूल जाती हैं?

इस बात से सभी वाकिफ हैं कि बीजेपी के आदर्श और तत्कालीन हिंदू महासभा के अध्यक्ष वीडी सावरकर ने भारत छोड़ो आंदोलन का विरोध किया. गैर राजनीतिक संगठन होने के नाम पर संघ ने भी इसका विरोध किया था. लेकिन विरोध सिर्फ संघ और सावरकर ने ही नहीं किया था. बाबा साहेब आंबेडकर ने भी इसका विरोध किया था. सी राजा गोपालाचारी ने भी विरोध किया था. तत्काल आजादी की मांग रखने वाले वाम दलों ने भी इस आंदोलन का विरोध किया था.

आजादी के वक्त को याद करके महान विभूतियों की कुर्बानी को याद करना अलग बात है. लेकिन उस दौर की सियासत के पन्ने उधेड़कर आज की राजनीति में अपना बचाव करना बिल्कुल अलहदा बात है. और ये सिर्फ एक कमजोर बचाव के तौर पर समझा जाएगा.

कांग्रेस को ये बात समझनी होगी कि हमें आजाद हुए 70 साल बीत चुके हैं. अब वो गिनेचुने लोग बचे हैं जिन्होंने उस दौर में भारत के संघर्ष को नजदीक से देखा हो. आज की पीढ़ी उस दौर को याद करना चाहती है लेकिन सिर्फ उस दौर के नेताओं से अपना जुड़ाव दिखाकर अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता बनाए रखने की कोशिश को पचा पाना मुश्किल है.

सोनिया गांधी कहती हैं, ‘मुझे लगता है कि अब जब हम भारत छोड़ो आंदोलन की 75वीं वर्षगांठ मना रहे हैं. कुछ आशंकाएं अब भी हैं. ये एहसास बढ़ रहा है कि अंधकार की शक्तियां हमारे बीच फिर तेजी से उभर रही हैं.’ वो कहती हैं, ‘क्या जहां आजादी का माहौल था, वहां भय नहीं फैल रहा. क्या जनतंत्र की इस बुनियाद को नष्ट करने की कोशिश नहीं हो रही. जो विचारों की आजादी, सामाजिक न्याय, स्वेच्छा की आजादी पर आधारित है. ऐसा लगता है कि सेकुलर और उदारवादी मूल्य खतरे में पड़ते नजर आ रहे हैं. पब्लिक स्पेस में असहमति और विचारों की गुंजाइश कम होती जा रही है. कानून के राज में भी गैर-कानूनी शक्तियां हावी दिखाई देती हैं.’

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स्पष्ट तौर पर वो बीजेपी को निशाने पर लेकर ऐसी बातें बोल रही हैं. लेकिन सिर्फ ये बोलकर विपक्ष की जिम्मेदारी से क्या वो बच निकलने की कोशिश नहीं कर रही हैं. सत्ता में रहने पर कांग्रेस पार्टी ने जिस तरह की लिजलिजी राजनीति का कई बार प्रदर्शन किया है उसके बाद क्या आज की बदले की राजनीति पर सवाल पूछने का हक वो खो नहीं चुकी है.

मौजूदा दौर की राजनीति में क्या इतिहास को याद करके अपना अस्तित्व बचाए रखा जा सकता है. कांग्रेस के बड़े-बड़े नेताओं को लगने लगा है कि ये दौर बदलाव का है. कांग्रेस अगर नहीं बदली तो उसका अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा.

कांग्रेस के सीनियर लीडर जयराम रमेश तक मानते हैं कि कांग्रेस संकट के दौर से गुजर रही है. सोमवार को कोच्चि में उन्होंने कहा था कि कांग्रेस ने 1996 से 2004 तक 'चुनावी संकट' का सामना किया जब वह सत्ता से बाहर थी. पार्टी ने 1977 में भी चुनावी संकट का सामना किया था जब वह आपातकाल के ठीक बाद चुनाव हार गयी थी. आज कांग्रेस अस्तित्व के संकट का सामना कर रही है. यह चुनावी संकट नहीं है. सचमुच पार्टी गंभीर संकट में है.'

भारत छोड़ो आंदोलन पर सोनिया गांधी का संसद में दिया भाषण में कांग्रेस के उन पुराने नारों की भरमार थी जो वर्षों से लगाए जा रहे हैं. उन्हें समझना होगा कि अब इन घिसे पिटे नारों से काम नहीं चलने वाला. जयराम रमेश ने भी कहा है, 'पुराने नारे काम नहीं करते, पुराना फॉर्मूला काम नहीं करता, पुराना मंत्र काम नहीं करता. भारत बदल गया है, कांग्रेस पार्टी को भी बदलना होगा.'

जयराम रमेश जैसे सीनियर नेता भी इस बात को समझते हैं लेकिन जब भी कुछ नया करने का मौका आता है. तो उन्हीं पुराने घिसे पिटे फॉर्मूलों पर भाषण तैयार होते हैं, नारे गढ़े जाते हैं और जुमले उछाले जाते हैं. जनता इन सबसे ऊब चुकी है. कांग्रेस को ये समझना होगा.

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