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सिसोदिया ने खोला 'आप' का राज, बढ़ाई केजरीवाल की मुश्किल

पंजाब में सिसोदिया ने जो जोश दिखाया, उससे केजरीवाल का सियासी संकट बढ़ गया है.

Sanjay Singh Updated On: Jan 11, 2017 02:37 PM IST

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सिसोदिया ने खोला 'आप' का राज, बढ़ाई केजरीवाल की मुश्किल

आखिरकार मनीष सिसोदिया ने आम आदमी पार्टी के सबसे गोपनीय राज को बेपर्दा कर ही दिया- अरविंद केजरीवाल को दिल्ली के मुख्यमंत्री पद छोड़ने में खुशी होगी और अगर बगल के राज्य पंजाब में पार्टी की जीत होती है तो वही राज्य के मुख्यमंत्री होंगे.

गुप्त राजनीतिक रणनीति पर और पार्टी में नंबर टू की हैसियत रखने वाले नेता द्वारा आधिकारिक बयान देने में अंतर होता है. सिसोदिया ने इस पतली रेखा को धुंधला कर केजरीवाल की महत्वाकांक्षा को आधिकारिक बना दिया.

दिल्ली छोड़ने को तैयार केजरीवाल

इसका मतलब ये हुआ कि आप सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल दिल्ली में सिर्फ दिन गिन रहे हैं. उन्हें न तो दिल्ली की समस्याओं से कोई लेना-देना है और न ही सरकार के सुचारू रूप के चलने से. वह तो सिर्फ उस मौके की तलाश और इंतजार में हैं जिससे वह अपनी सियासी जमीन कहीं और खिसका सकें. जहां से वह अपनी राष्ट्रीय स्तर की राजनीति करने की महत्वाकांक्षा को आगे कामयाब बना सकें.

दरअसल सिसोदिया ने सबसे पहले पंजाब के मोहाली में चुनावी रैली के दौरान और फिर बाद में पत्रकारों से बातचीत के दौरान ये सियासी बम फेंका था. उन्होंने कहा था कि पंजाब की जनता यह मान कर मतदान करे कि वे केजरीवाल को ही पंजाब का मुख्यमंत्री बना रहे हैं.

हो सकता है कि ये अटकल हो लेकिन इस बयान के बाद आम आदमी पार्टी के अंदर और बाहर सियासी पारा चढ़ने लगा. ऐसे में बड़ा सवाल है कि आखिर अरविंद केजरीवाल को दिल्ली छोड़ने की इतनी जल्दी क्यों है?

हालांकि पंजाब से आम आदमी पार्टी के सांसद भगवंत मान, जिनकी खुद की महत्वाकांक्षा सूबे के मुख्यमंत्री बनने की है, ने इस पर फौरन प्रतिक्रिया दी. उन्होंने कहा कि पंजाब का मुख्यमंत्री सिर्फ एक पंजाबी ही बन सकता है. अरविंद केजरीवाल का ताल्लुक हरियाणा की बनिया जाति से है. मान के बयान से जाहिर है कि पंजाब में मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार को लेकर आम आदमी पार्टी में मतभेद है.

विरोधियों को मिला मुद्दा

सिसोदिया के बयान ने पंजाब के उपमुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल को आप और केजरीवाल के खिलाफ बैठे-बिठाए एक मुद्दा हाथ में पकड़ा दिया. सुखबीर सिंह बादल ने इस पूरे सियासी घटनाक्रम को पंजाबी बनाम बाहरी का रंग देने में देर नहीं की.

फोटो. पीटीआई

फोटो. पीटीआई

एक के बाद एक ट्वीट कर बादल ने कहा. ‘जनता से अपील करना कि वे अरविंद केजरीवाल को पंजाब का मुख्यमंत्री मानकर वोटिंग करें, मनीष सिसोदिया ने आप की रणनीति को सार्वजनिक कर दिया है. आप ने साबित कर दिया है कि उन्हें पंजाबियों पर भरोसा नहीं है.’

अपने ट्वीट में बादल ने यहां तक लिखा है कि ‘सारे राज अब बेपर्दा हो चुके हैं. हाल के घटनाक्रम यह साबित करने के लिए काफी हैं कि केजरीवाल किसी भी तरह से मुख्यमंत्री बनना चाहते हैं और जनता को सिर्फ बेवकूफ बना रहे हैं.’

बादल ने इसे सिख मतदाताओं के लिए भावनात्मक मुद्दा भी बनाने की कोशिश की. उन्होंने कहा ‘यही वजह है कि सिख नेताओं को पार्टी में या तो हाशिए पर रखा जाता है या फिर उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है. सिसोदिया का एलान साबित करता है कि पार्टी से सुचा सिंह छोटेपुर को अरविंद केजरीवाल के लिए ही बाहर का रास्ता दिखाया गया.’

एक अन्य ट्वीट में उन्होंने लिखा, ‘उन्होंने भगवंत मान और हिम्मत सिंह शेरगिल को जलालाबाद और मजीठा से चुनाव लड़ने का दवाब बनाया ताकि केजरीवाल को चुनौती देने वाला कोई बचे ही नहीं.’ एक और ट्वीट में उन्होंने लिखा, ‘मैं हर पंजाबी से इस पंजाब विरोधी पार्टी की गतिविधियों की समीक्षा करने के लिए कहता हूं. पंजाब पर किसी बाहरी को थोपने की कोशिश को नाकामयाब बनाने की अपील करता हूं.’

केजरीवाल की विश्वसनीयता- जो भी थोड़ी बहुत बची है- उसे भुनाने की कोशिश में हो सकता है कि सिसोदिया ने भयंकर भूल कर दी हो.

हो सकता है कि इसका परिणाम भी आम आदमी पार्टी को ही भुगतना पड़े, क्योंकि पहले से ही पार्टी को पंजाब में पंजाबी बनाम बाहरी की लड़ाई से दो-चार होना पड़ रहा है.

अव्वल तो ये कि जिस तरीके से पंजाब में संगठन और चुनावी रणनीति के प्रबंधन के लिए दिल्ली से वरिष्ठ नेताओं ने पंजाब में डेरा डाला. दूसरा, भ्रष्टाचार के आरोप लगा कर जिस तरीके से राज्य में पार्टी के सिख चेहरे सुचा सिंह छोटेपुर को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाया गया. इससे पार्टी के खिलाफ पंजाबी बनाम बाहरी की अवधारणा को हवा मिली.

फिर भगोड़ा कहलाएंगे अरविंद केजरीवाल?

जाहिर है सिसोदिया ने पंजाब और दिल्ली में अपने सियासी विरोधियों को आलोचना का मौका थमा दिया है. पंजाब के चुनाव में पंजाबी बनाम बाहरी को थोपने के मुद्दे पर चर्चा छिड़ सकती है. दिल्ली में केजरीवाल पर दोबारा से ‘भगोड़ा’ कहलाने का जोखिम बढ़ सकता है.

केजरीवाल ने महज 49 दिनों के बाद ही दिल्ली में मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था और बनारस संसदीय चुनाव क्षेत्र से नरेंद्र मोदी के खिलाफ चुनावी समर में कूद पड़े थे. इसके बाद केजरीवाल ने दिल्ली की जनता से जब बिना शर्त माफी मांगी, तब कहीं जाकर केजरीवाल का सियासी करियर वापस पटरी पर लौट सका.

फोटो. पीटीआई

फोटो. पीटीआई

इसमें दो राय नहीं कि मौजूदा वक्त में दिल्ली में सरकारी मशीनरी पूरी तरह चरमराई हुई है. गर्वनेंस पूरी तरह ठप है. प्रदूषण से लेकर सड़क में गड्ढे जैसे मामलों को लेकर कोई देखने सुनने वाला नहीं है. नगर निगम सफाई कर्मचारियों के हड़ताल पर चले जाने के बाद से सड़कों पर कचड़े का अंबार लगा हुआ है. इतना ही नहीं जब दिल्ली में चिकनगुनिया से लोग दम तोड़ रहे थे तब न तो खुद मुख्यमंत्री केजरीवाल और न ही उनके मंत्री दिल्ली में मौजूद थे.

इस बात में शक नहीं कि कुछ महीनों से केजरीवाल अपनी ऊर्जा और समय सिर्फ इस बात पर लगा रहे हैं कि दिल्ली से बाहर पंजाब और गोवा में उनकी पार्टी की राजनीतिक जमीन कैसे मजबूत हो सके. दिल्ली में गर्वनेंस उनकी प्राथमिकताओं में नहीं है.

जब केजरीवाल ने अपने पास कोई मंत्रालय नहीं रखा था, तभी से इस बात के कयास लगाए जा रहे थे कि केजरीवाल दरअसल खुद को इन जिम्मेदारियों से मुक्त रखना चाहते हैं. ताकि वो दिल्ली से बाहर पार्टी का जनाधार बढ़ाने के लिए आसानी से यात्रा कर सकें. अगर केजरीवाल पंजाब जाते हैं तो ऐसे में सिसोदिया को बड़ा राजनीतिक लाभ हासिल हो सकेगा. उनके उपमुख्यमंत्री से दिल्ली के मुख्यमंत्री बनने की राह आसान हो सकेगी. हालांकि इन बातों से अभी कई किंतु-परंतु जुड़े हुए हैं.

जुलाई 2016 में इस बात की समीक्षा करते हुए कि - आखिर आम आदमी पार्टी में केजरीवाल ने नवजोत सिंह सिद्धू को क्यों एंट्री नहीं दी?- फर्स्टपोस्ट ने लिखा था कि इससे सिद्धू और केजरीवाल के मुख्यमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा का टकराव निश्चित था.

दिल्ली से बड़ी पंजाब की मिल्कियत

दरअसल केजरीवाल पंजाब के मुख्यमंत्री बनने को इसलिए भी लालायित हैं, क्योंकि पंजाब एक बड़ा राज्य है. सीमावर्ती राज्य होने के साथ ही इसे पूर्ण राज्य का दर्जा प्राप्त है. इसका मतलब है कि पुलिस पर नियंत्रण और मौजूदा और संभावित मामले, जिनकी जांच चल रही है, उससे अपने तरीके से निपटने की आजादी उन्हें होगी. आप नेतृत्व को ये भरोसा है कि पंजाब के मुख्यमंत्री बन जाने से केजरीवाल का सिर्फ राजनीतिक कद ही नहीं बढ़ेगा, बल्कि वर्ष 2019 में उनके पास नरेंद्र मोदी से टकराने के लिए राजनीतिक करिश्मा भी होगा. पहले ही केजरीवाल ने कई बार नरेंद्र मोदी से सीधे राजनीतिक टकराव मोल लेने का दावा किया है.

जाहिर है पंजाब में अपनी पहली रैली के दौरान सिसोदिया ने जो जोश दिखाया है उससे न सिर्फ केजरीवाल का सियासी संकट बढ़ गया है, बल्कि दिल्ली में उनके खुद के मुख्यमंत्री बनने की राह में अब रोड़े नजर आ रहे हैं.

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