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राष्ट्रपति चुनाव 2017: बीजेपी रेस में आगे लेकिन शिवसेना को मनाना जरूरी

शिवसेना की तरफ से आते रहते हैं समय-समय पर विरोधी बयान

Amitabh Tiwari Updated On: May 09, 2017 08:15 PM IST

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राष्ट्रपति चुनाव 2017: बीजेपी रेस में आगे लेकिन शिवसेना को मनाना जरूरी

संपादकीय नोट: फ़र्स्टपोस्ट पर तीन कड़ियों में राष्ट्रपति चुनाव की जटिल प्रक्रिया की चर्चा की जा रही है. पहली कड़ी में हमने चुनाव-प्रक्रिया के बारे में पढ़ा और देखा कि संविधान ने इसमें कैसे केंद्र और राज्यों को बराबर की अहमियत दी है. दूसरी कड़ी में हमने पढ़ा कि निर्वाचक मंडल में अलग-अलग दल और उनके खेमों के पास कितने वोट हैं ? तीसरी कड़ी में आइए जानें कि क्या विपक्ष एकजुट हो जाए तो वह बीजेपी के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार को हरा सकता है ? बीजेपी अपने उम्मीदवार को जीता सकने लायक वोटों के जादुई आंकड़े से बस थोड़ी ही पीछे है लेकिन उसके खेमे में शिवसेना भी शामिल है जिसकी नाराजगी बीजेपी की उम्मीदों पर पानी फेर सकती है.

चुनावों में बीजेपी के हाथों लगातार होती हार से मजबूर पुराना और कद्दावर वाममोर्चा क्षेत्रीय दलों के साथ मिलकर राष्ट्रपति के चुनाव के लिए एक साझा उम्मीदवार खड़ा करने की कवायद में लगा है.

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्ष सोनिया गांधी समझ चुकी हैं कि उनके बेटे और पार्टी के उपाध्यक्ष राहुल गांधी इस संवेदनशील लेकिन अहम मसले पर ठीक से फैसला नहीं ले सकते. इसीलिए एक अंतराल के बाद उन्होंने फिर से कमान संभाल ली है. सोनिया गांधी ने नीतीश कुमार, शरद पवार, शरद यादव, वाम मोर्चा के नेताओं और अन्य क्षेत्रीय दलों के नेताओं के साथ बैठक की है.

समाजवादी नेता स्वर्गीय मधु लिमये की 95वीं जयंती पर बीते बुधवार के दिन एक बैठक में विपक्षी पार्टियों की एकजुटता पर जोर दिया गया.

सभी प्रगतिशील ताकतों को एक होना होगा: दिग्विजय सिंह

Digvijay Singh

इकॉनॉमिक टाइम्स में कांग्रेस के नेता दिग्विजय सिंह का बयान छपा कि, 'सभी प्रगतिशील ताकतों को बीजेपी और आरएसएस के खिलाफ मुद्दों और विचारधारा के आधार पर एकजुट होकर लड़ाई लड़ने की जरूरत है. इस बात का ध्यान रखना बहुत जरुरी है कि सियासी लड़ाई कहीं शख्सियतों का मुकाबला बनकर न रह जाए. बीजेपी और एनडीए अपनी नीतियों और प्रशासनिक नाकामियों से ध्यान बंटाने के लिए ऐसा ही करना चाहते हैं.'

इससे विपक्षी पार्टियों की एकजुटता के बारे में ठीक-ठीक पता चलता है. विपक्ष की राजनीति अब एक कदम आगे बढ़ चुकी है. अब विपक्षी एकजुटता का आधार ‘बीजेपी-विरोध’ है न कि ‘गैर कांग्रेसवाद’. जाहिर है, इस बात से बीजेपी को खुशी होगी.

विपक्ष अब अपनी रणनीतियों में बदलाव करते हुए यह सोचने में लगा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी के उभार को कैसे रोका जाय? मोदी की शख्सियत को निशाना बनाना विपक्ष के लिए उल्टा पड़ रहा है.

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ऐसे में विपक्ष देश के सामने वैकल्पिक एजेंडा रखते हुए सरकार की नीतियों और कार्यक्रमों पर हमला करना चाहता है. इस रणनीति को आगे बढ़ाते हुए जनता दल के नेता शरद यादव पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मिले और यशवंत सिन्हा की अगुवाई वाले गुट के ‘नागरिक पहल’ वाले प्रस्ताव को समर्थन देने की बात कही.

बीजेपी ने अभी अपने उम्मीदवार का नाम तय नहीं किया है. फिलहाल कई नाम चर्चा में हैं जैसे सुषमा स्वराज, सुमित्रा महाजन, नजमा हेपतुल्लाह आदि.

दौड़ से बाहर हुए लालकृष्ण आडवाणी

India's main opposition Bharatiya Janata Party (BJP) leader Lal Krishna Advani, gestures during a party meeting at his residence in New Delhi May 18, 2009. Congress' alliance took 261 seats, sweeping aside its nearest rival, the bloc led by the Hindu-nationalist BJP, which won only 159 combined. REUTERS/Adnan Abidi (INDIA POLITICS) - RTXIOHC

लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी बाबरी मस्जिद वाले मामले में कोर्ट का फैसला आने के बाद दौड़ से बाहर हो गए हैं. उम्मीदवार खड़ा करने के मामले में बीजेपी चौंका भी सकती है, किसी ऐसे व्यक्ति का नाम आ सकता है जिसकी उम्मीद लोगों को न हो. राष्ट्रपति पद के लिए प्रणब मुखर्जी के नाम का दोबारा प्रस्ताव किया जाता है तो विपक्ष की एकजुटता धरी की धरी रह जाएगी.

विपक्ष शरद पवार, शरद यादव या फिर मुलायम सिंह में से किसी एक को अपना उम्मीदवार बना सकता है. इन पंक्तियों के लेखक को यह भी लग रहा है कि विपक्ष मायावती के नाम पर पर विचार कर सकता है. विपक्षी दलों के बीच किसी एक व्यक्ति के नाम पर सहमति बनाना सबसे मुश्किल काम है और उम्मीदवार के नामांकन में इसी की निर्णायक भूमिका रहेगी.

जैसा कि दूसरी कड़ी में विस्तार से बताया जा चुका है, संसद के दोनों सदन और राज्यों की विधानसभा की मौजूदा स्थिति के मुताबिक निर्वाचक-मंडल में अलग-अलग पार्टियों की ताकत कुछ इस प्रकार है—

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source: www.politicalbaba.com

इन पंक्तियों के लेखक के शोध के मुताबिक बीजेपी के पास राष्ट्रपति का चुनाव जीतने के लिए जरूरी बहुमत से 20,390 वोट कम हैं.

अगर बीजेपी देश के सभी निर्दलीय जन प्रतिनिधियों के वोट अपने पाले में जुटा ले तब भी उसके पास 5000 वोट कम रहेंगे.

फिर, यह बात भी ध्यान रखनी होगी कि हर निर्दलीय सांसद-विधायक बीजेपी के उम्मीदवार को वोट देने को तैयार हो जाए. इसकी संभावना बहुत कम है.

इसके लिए बीजेपी को हर निर्दलीय जन-प्रतिनिधि से अलग-अलग बात करनी होगी जो कि अपने आप में बहुत कठिन काम है.

ऐसे में तटस्थ रुख अपनाने वाले तीन दल ( एआईएडीएमके, टीआरएस तथा बीजेडी) बीजेपी के लिए बहुत महत्वपूर्ण हो जाते हैं.

अगर इन दलों को हासिल सभी वोटों को आपस में जोड़ दें तो आंकड़ा 1.19 लाख वोटों का होता है. तमिलनाडु में एआईएडीएमके के पास 59,000 वोट हैं, ओडिशा में बीजेडी के पास 36,500, तथा तेलंगाना में टीआरएस के 23,200 वोट हैं.

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बीते तीन सालों में इन दलों ने बीजेपी के कई विधेयक को अपना समर्थन दिया है. तीनों राज्यों में प्रमुख विपक्षी पार्टी अबतक कांग्रेस रही है ( ओडिशा और तेलंगाना में कांग्रेस तथा तमिलनाडु में डीएमके जो यूपीए की साझीदार है).

राज्यों में विपक्ष की भूमिका निभाने के कारण इन पार्टियों ने अभी तक कांग्रेस का पक्ष नहीं लिया है.

खैर, अब इन तीनों राज्यों में स्थिति बदल चुकी है. ओडिशा में फरवरी 2017 में पंचायत के चुनाव हुए तो बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी, बीजेडी और कांग्रेस को सीटों का घाटा उठाना पड़ा.

बीजेपी के सीटों में आठ गुने (36 से बढ़कर 306) का इजाफा हुआ और वोट शेयर 18 प्रतिशत से बढ़कर 33 फीसद पर जा पहुंचा.

बीजेपी ने अप्रैल में अपनी राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक भुवनेश्वर में करते हुए साफ जता दिया है कि 2019 के चुनावों में वह नवीन पटनायक से गद्दी छीनना चाहती है.

बीजेडी समझी चुकी कि बीजेपी का हो रहा है उभार

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बीजेडी को समझ में आ गया है कि ओडिशा में बीजेडी उभार पर है और बीजेडी का सिंहासन डोल रहा है. एक तो सत्रह सालों के एकक्षत्र शासन के बाद नवीन पटनायक की सरकार से ओडिशा के लोग ऊबे हुए हैं दूसरे इस सूबे में कांग्रेस खस्ताहाली की शिकार है. इन दो वजहों से बीजेपी को सूबे में बढ़त हासिल हो सकती है.

इन तमाम बातों से नवीन बाबू की चिंता बढ़ चली है. बीजेपी विरोधी मोर्चे की ओर से ममता बनर्जी ने नवीन पटनायक से मुलाकात की और कहा है कि बीजेपी के मंसूबे को नाकाम करने के लिए एकजुटता बहुत जरूरी है.

बीजेडी दुविधा में है, अगर वह बीजेपी के उम्मीदवार का समर्थन करती है तो सूबे में उसका कुछ वोटशेयर निश्चित ही बीजेपी की ओर खिसक जाएगा. दूसरी तरफ, यह भी सच है कि बीजेडी पहले के वक्त में एनडीए के घटक दलों में शामिल रही है और सर्व-सम्मति की दशा में अब भी बीजेपी के उम्मीदवार को अपना समर्थन दे सकती है. तटस्थ रुख अपनाने वाली तीन पार्टियों में अकेले बीजेडी ही समर्थन कर दे तो एनडीए का उम्मीदवार राष्ट्रपति का चुनाव जीत जाएगा.

जहां तक तेलंगाना का सवाल है, दक्षिण में विस्तार के लिहाज से अमित शाह ने इस सूबे पर अपनी नजरें टिका रखी हैं. इस कारण टीआरएस के लिए फिलहाल मामला कुछ उलझा हुआ है.

टीआरएस ने अभी तक एनडीए को संसद में मुद्दा आधारित समर्थन दिया है. सूबे में कांग्रेस के कमजोर होने का अर्थ है 2019 में बीजेपी और टीडीपी का मजबूत विपक्ष बनकर उभरना.

एक सच्चाई यह भी है कि 2019 में लोकसभा के चुनावों के साथ ही तेलंगाना और ओडिशा में विधानसभा के चुनाव होंगे. तब मोदी लहर अपने चरम पर होगी. बीजेडी और टीआरएस के लिए इस बात को भी ध्यान में रखना जरूरी है.

बीजेपी के उम्मीदवार को समर्थन देने से अपने सूबे में उनका कुछ आधार खिसक सकता है. यह बात भी दिलचस्प है कि अकेले टीआरएस ही समर्थन दे दे तो वह बीजेपी के उम्मीदवार की जीत के लिए काफी होगा.

एआईएडीएमके का मामला तनिक जटिल है. पार्टी फिलहाल ओ. पन्नीरसेल्वम और शशिकला खेमे में बंटी हुई है. दोनों खेमे पार्टी पर कब्जा जमाने की होड़ कर रहे हैं.

दोनों के बीच सुलह की बात शुरू होकर फिलहाल रुक गई है. एआईडीएमके के ज्यादातर सांसद ओ पन्नीरसेल्वम के समर्थन में हैं जबकि ज्यादातर विधायक पलानीसामी के समर्थक हैं.

विचारधारा के हिसाब से देखें तो एआईएडीएमके बीजेपी के निकट रही है और बीते वक्त में वह एनडीए के घटक दलों में शामिल रही है. अगर एआईडीएमके के एक तिहाई सांसद और विधायक(20000 वोट) बीजेपी के उम्मीदवार का समर्थन कर दें वह बहुमत से राष्ट्रपति पद का चुनाव जीत जाएगा.

एआईएडीएमके बीजेपी का समर्थन करेगी या नहीं, यह बहुत कुछ दोनों खेमे के बीच सुलह को लेकर चलने वाली बातचीत पर निर्भर है. अगले कुछ हफ्तों में सुलह की बातचीत का नतीजा सामने आ सकता है. फिलहाल बीजेपी ने ओ पन्नीरसेल्वम वाले खेमे से अतिरिक्त वोट हासिल करने की उम्मीद बांध रखी है.

जैसा कि हमने लेख के ऊपर वाले हिस्से में देखा, अगर तटस्थ नजर आ रही इन तीन पार्टियों में से कोई भी एक बीजेपी का समर्थन कर दे तो अगला राष्ट्रपति बीजेपी का ही उम्मीदवार होगा. इन तीन दलों में कोई एक अगर मतदान में भाग नहीं लेता तब भी यह स्थिति बीजेपी को फायदा पहुंचाएगी.

विपक्ष की नजर बीजेपी खेमे के नाराज दलों पर है, खासकर बीजेपी के लिए जब-तब परेशानी खड़ा करने वाली शिवसेना पर विपक्षी दलों ने नजरें टिका रखी हैं.

उद्धव ठाकरे का ऐलान है कि शरद पवार राष्ट्रपति का चुनाव लड़ते हैं तो शिवसेना ‘मराठा-गर्व’ की हिफाजत के नाते उनकी उम्मीदवारी का समर्थन करेगी. शिवसेना ने यूपीए के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार प्रतिभा पाटिल का 2007 में बहुत कुछ ऐसी ही परिस्थितियों में समर्थन किया था.

शिवसेना के पास 25,893 वोट हैं और बीजेपी के लिए जरूर होगा कि वह शिवसेना को समझा-बुझाकर अपनी तरफदारी में बनाये रखे वर्ना बीजेपी का गणित गड़बड़ा सकता है, बीजेपी के पास अभी जरुरत से 20,390 वोट कम हैं लेकिन शिवसेना के छिटकने पर बीजेपी के पास अपने उम्मीदवार को जिताने के लिए 46,000 वोटों की कमी हो जायेगी. ऐसे में बीजेपी के लिए निर्दलीय उम्मीदवारों और टीआरएस तथा बीजेडी में किसी एक का समर्थन हासिल करना जरुरी हो जायेगा.

राज्यों की विधानसभाओं में विभिन्न दलों के वोट-

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source: www.politicalbaba.com

निष्कर्ष के तौर पर कहा जा सकता है कि राष्ट्रपति पद के लिए होने जा रहे इस बार के चुनाव में बेशक कांटे की लड़ाई है.  हिन्दुस्तान टाइम्स ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि 1969 के बाद अबतक का सबसे कठिन मुकाबला है. लेकिन फिलहाल बीजेपी अपने प्रतिद्वन्द्वी खेमे से आगे है और इन पंक्तियों के लेखक का मानना है कि जीत बीजेपी के उम्मीदवार की ही होगी.

हां, इस चुनाव ने बेशक विपक्षी दलों को 2019 से पहले बीजेपी-विरोधी मोर्चा बनाने का एक मंच प्रदान किया है.

इस मंच से जुड़े कई सवालों का उत्तर आना अभी शेष है, जैसे बीजेपी-विरोधी मोर्चे का रूप-रंग कैसा होगा, इसकी अगुवाई कौन करेगा, कितनी पार्टियां शामिल होंगी, क्या बीजेपी-विरोध की सोच कामयाब होगी, इस सोच की सबसे बड़ी चुनौती क्या है और इस सोच का सबसे आकर्षक पहलू क्या होने जा रहा है?

इन प्रश्नों का जवाब चाहे जो निकले यह बात तय है कि इस बार राष्ट्रपति पद का चुनाव बीजेपी का ही उम्मीदवार जीतेगा.

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