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नोटबंदी पर राष्ट्रपति का संदेश: देश की जनता सैनिक नहीं है

देश के गरीब लोगों के साथ जबरन सेना में भर्ती किए गए सैनिकों की तरह बर्ताव नहीं करना चाहिए

Narayanan Madhavan Updated On: Jan 06, 2017 07:22 PM IST

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नोटबंदी पर राष्ट्रपति का संदेश: देश की जनता सैनिक नहीं है

एक टीवी चैनल पर चले रहे एक विज्ञापन की ये आवाज लगभग चीखती सी सुनाई पड़ती है, ‘इस नई अर्थव्यवस्था के असली योद्धा हम हैं’ और इस विज्ञापन के जरिए ही ये भी ऐलान हो जाता है कि काले धन के खिलाफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जंग में हम यानि देश की जनता उनके साथ है.

लेकिन पीएम मोदी को साउथ ब्लॉक से बड़े ही सादे तरीके से एक संयमित संदेश देने की कोशिश की जा रही है. ये संदेश राष्ट्रपति भवन से आ रहा है. अब समय आ गया है कि हमें नोटबंदी के अभियान से जुड़े मानवीय पहलुओं पर भी ध्यान देना चाहिए.

राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी हमारे देश के प्रथम नागरिक हैं और वे किसी भी तरह से साधारण व्यक्तित्व नहीं हैं. वे एक से ज्यादा बार देश के वित्तमंत्री रह चुके हैं. वे देश में घटित हर तरह की राजनैतिक और आर्थिक उतार-चढ़ाव के गवाह रह चुके हैं. चाहे वो 1997 का आपातकाल का समय रहा हो या फिर 1991 का सुधारवाद, तब वे योजना आयोग के उप-सभापति हुआ करते थे. उस दौरान मनमोहन सिंह देश के वित्तमंत्री थे.

हैदराबाद में एक कार्यक्रम के दौरान बोलते हुए रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के पूर्व गवर्नर डी.सुब्बाराव ने कहा - ‘बीते 8 नवंबर को नोटबंदी का जो फैसला लिया गया उसका उद्देश्य क्या था, उसमें कितने पैसे खर्च हुए और इस पूरी प्रक्रिया से हमें क्या-क्या फायदा हुआ ये बहस का मुद्दा था. सुब्बाराव ने नोटबंदी के इस अभियान को 1991 के बाद लिया गया सबसे ज्यादा अशांत करने वाला नीतिगत फैसला करार दिया है.’

कैश से महरूम गरीब

सिलिकॉन वैली में ‘अशांत’ एक कूल दुनिया को कहा जाता है. एक ऐसी दुनिया जहां आरामादायक जीवन शैली और नए उपक्रमों में पैसा लगाने वाले कई लोगों का शगल होता है और उनके जीवन को रोमांचकारी बनाता है. लेकिन यही बात तिरुपुर और ठाणे के औद्योगिक इलाकों में काम करने वाले मजदूरों के बारे में नहीं कहा जा सकता है न ही ग्रामीण सहकारी बैंकों के सामने लगे किसानों की लंबी लाइनों के बारे में जो नकद पैसों से पूरी तरह से महरूम हो चुके हैं. ये नकद रुपया ही उनकी व्यवस्था का संचालक था.

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नोटबंदी के कारण देश की जनता को अपने ही पैसे से वंचित होना पड़ा है

यही वो जगह है जहां राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के संदेश का महत्व बढ़ जाता है. उन्होंने कहा - ‘लंबे समय में जिस विकास को हम हासिल करना चाहते हैं उसमें गरीबों की तकलीफों को दूर कर पाना मुश्किल हो सकता है. इसलिए हमें बहुत सावधानी बरतने की जरुरत है.’

राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने ये संदेश नए साल के मौके पर राज्यपालों और उपराज्यपालों को संबोधित करते हुए कहा.

जब मनमोहन सिंह और प्रणब मुखर्जी ने 1991 के दौरान देश में उदारवाद की अगुवाई की तब उस समय रुपए का अमूल्यन भी हुआ. उस दौरान सरकार ने अपने खर्चों में कटौती के साथ-साथ कई और कड़े कदम उठाए. उस दौरान सरकार ने बार-बार ऐसी शब्दावली का इस्तेमाल किया जिसमें ‘मानवीय दृष्टि से सुधार’ की बात की गई ताकि वे अपने उठाए गए कदमों का बचाव कर सके.

इसके ठीक उलट, हमारे सामने अब एक ऐसी सरकार है जिसका ये सोचना है कि काले धन पर जो लड़ाई वो लड़ रहा है वो उसका कर्तव्य नहीं है, बल्कि एक ऐसा धर्मयुद्ध है जिसमें देश के लोगों को तकलीफ उठानी पड़ेगी. ये सुनने में बहुत अच्छा लग सकता है लेकिन सच्चाई ये कि नोटबंदी की पूरी प्रक्रिया से जितना नुकसान देश के दुश्मनों को नहीं उठाना पड़ रहा है उससे कहीं ज्यादा आम लोगों को इससे तकलीफ हो रही है.

ठगी हुई जनता

आइये आपको बताते हैं कैसे...

जब सरकार ने सितंबर महीने के अंत में इनकम डिक्लरेशन स्कीम बंद करने की घोषणा की थी, तब हमें लगा कि इसके बाद का अगला कदम ये होगा कि जो लोग टैक्स चोरी के मामले में पकड़े गए हैं, उनकी या तो पूरी संपत्ति जब्त कर ली जाएगी या फिर उन्हें बहुत भारी सजा दी जाएगी. लेकिन इसके बदले में हमने जो देखा वो एक बार फिर स इनकम टैक्स स्कीम का दूसरा संस्करण था न कि पहले के जुर्म के लिए किसी तरह की कोई सजा.

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नोटबंदी से सबसे ज्यादा नुकसान मजदूरों और किसानों को उठाना पड़ा है

अब, एक नजर डालते हैं उन हजारों-लाखों किसानों और मजदूरों पर जिन्हें अपना पैसा निकालने के लिए बैंकों के सामने लाइन में खड़ा होना पड़ रहा है या फिर वे लोग जिन्हें नकद की कमी के कारण अपने मालिकों से उनकी ही कमाई के पैसे नहीं मिल पा रहे है.

कोई भी समाज आसानी से कैशलेस नहीं हो सकता है, ये एक लंबी प्रक्रिया है और सरकार ने जिस तरह से जल्दबाजी में इसे देश की गरीब जनता के ऊपर काले धन पर जंग के नाम पर थोप दिया है उससे ये पूरी कार्रवाई एक जबरन की गई मिलिट्री कार्रवाई की तरह लग रही है.

जनता या सैनिक

आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्था में नागरिकों को जबरन सेना में भर्ती नहीं कराया जाता है. वियतनाम युद्ध के दौरान अमेरिका में जिस तरह से युद्ध् का विरोध किया गया वो सिर्फ अमनपसंदगी के लिए नहीं किया गया था बल्कि इसके पीछे की बड़ी वजह ये थी कि देश के सामान्य नागरिक एक थोपे हुए युद्ध के कारण तकलीफ नहीं उठाना चाहते थे. उन लोगों का कहना था कि जिस चीज के लिए वे जिम्मेदार नहीं है उसके नतीजे वो क्यों भुगतें?

नए साल के मौके पर पीएम मोदी ने जो भाषण दिया था ब्याज के दरों में बहुत ही मामूली कटौती की है, गर्भवती महिलाओं और वरिष्ठ नागरिकों को भी मामूली सुविधा दी है. लेकिन आबादी के एक बड़े हिस्से को जबरदस्ती उस लड़ाई में धकेल दिया गया है जिसके लिए कोई और जिम्मेदार है.

सरकार को ये बात भूलनी नहीं चाहिए कि रिफॉर्म या किसी भी तरह के सुधार का मानवीय पहलू होना जरूरी है. खासकर, अगर ये सुधार अशांतिकारक हैं तो ये जरूरी है कि ये सुधार न सिर्फ मानवीय हो बल्कि जिन लोगों पर इसका असर हो रहा है उन्हें सीधे तौर पर उससे फायदा होना चाहिए.

राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का संबोधन सरकार के लिए एक चेतावनी है.

देश के गरीब लोगों के साथ जबरन सेना में भर्ती किए गए सैनिकों की तरह बर्ताव नहीं करना चाहिए.

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