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राष्ट्रपति चुनाव 2017: मोदी के एजेंडा में फिर फंस गया विपक्ष!

मोदी ने दलित उम्मीदवार उतारा तो विपक्ष भी उसके नक्शे-कदम पर चल पड़ा

Amitesh Amitesh | Published On: Jun 22, 2017 08:14 PM IST | Updated On: Jun 22, 2017 08:18 PM IST

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राष्ट्रपति चुनाव 2017: मोदी के एजेंडा में फिर फंस गया विपक्ष!

जेडीयू की गैर-मौजूदगी में 17 विपक्षी दलों के नेताओं की दिल्ली में मैराथन बैठक हुई और मीरा कुमार के नाम पर मुहर लग गई. ऐलान कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी ने किया और इसके साथ ही सभी दलों से मीरा कुमार के लिए समर्थन की अपील भी कर दी.

दलित बनाम दलित की जंग शुरू

अब राष्ट्रपति चुनाव की लड़ाई ‘दलित’ बनाम ‘दलित’ की हो गई है. मुकाबला रामनाथ कोविंद और मीरा कुमार के बीच है. लेकिन, मीरा कुमार की उम्मीदवारी के बाद चर्चा इस बात पर हो रही है क्या विपक्ष के पास कोई दूसरा विकल्प नहीं था?

क्या विपक्ष बीजेपी के दलित कार्ड के खिलाफ कुछ दूसरा दांव चलने की हिम्मत नहीं जुटा सका. जवाब ना में ही मिलेगा. इस वक्त विपक्ष मोदी के दलित दांव से इस कदर हैरान और परेशान है कि उसको समझ में ही नहीं आ रहा था कि आखिरकार किस तरह से निपटा जाए.

मायावती को खोने का था डर

बीएसपी अध्यक्ष मायावती के रामनाथ कोविंद को लेकर नरम रूख ने पहले ही विपक्ष को परेशान कर दिया था. डर था कहीं मायावती भी दलित सियासत की मजबूरी के नाम पर नीतीश की राह ना पकड़ लें.

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लिहाजा, तमाम नामों को अलग रखकर बाबू जगजीवन राम की बेटी मीरा कुमार के नाम पर ही मुहर लग गई. मोदी ने 2019 को ध्यान में रखकर ऐसा मास्टर स्ट्रोक खेला जिससे कांग्रेस समेत पूरे विपक्ष का चक्रव्यूह फिलहाल फेल होता नजर आ रहा है.

अगर ऐसा नहीं होता तो विपक्ष ‘दलित कार्ड’ के ट्रैप में आने के बजाए किसी आदिवासी या फिर किसी पिछड़े-अति पिछड़े व्यक्ति को ही अपने उम्मीदवार के तौर पर सामने लाकर मोदी-शाह की जोड़ी को जवाब देता. लेकिन, ऐसा हो न सका. अब तो लगता है हर मुद्दे पर एजेंडा मोदी सेट कर रहे हैं, जिस एजेंडे पर झक मारकर भी विपक्ष को आना पड़ता है.

विपक्ष ने क्यों लिया मीरा कुमार का नाम ?

दरअसल, जब विपक्ष ने दलित नेता को ही आगे करने का फैसला किया तो उस कड़ी में मीरा कुमार के अलावा, महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री सुशील कुमार शिंदे और बाबा साहब भीमराव अंबेडकर के पौत्र प्रकाश अंबेडकर का भी नाम सामने आ रहा था. लेकिन, सोनिया गांधी की पसंद मीरा कुमार बाकी सब पर भारी पड़ी.

शायद विपक्ष को लगा कि हारना तय है. लेकिन, जब बात महज संदेश देने की ही है तो मीरा कुमार को आगे कर एक बेहतर संदेश दिया जा सकता है. दरअसल मीरा कुमार और रामनाथ कोविंद में काफी समानताएं हैं.

मीरा कुमार का कनेक्शन यूपी और बिहार दोनों से है

रामनाथ कोविंद यूपी के रहने वाले हैं और बिहार के गवर्नर रह चुके हैं. कोविंद दो बार यूपी से ही राज्यसभा सांसद भी रहे हैं. जबकि, मीरा कुमार बिहार की रहने वाली हैं, बिहार के सासाराम से सांसद बनने से पहले यूपी के बिजनौर से लोकसभा सांसद रह चुकी हैं. दोनों का कनेक्शन बिहार और यूपी से ही है.

हालाकि, रामनाथ कोविंद गैर-जाटव दलित तबके से आते हैं, लेकिन, मीरा कुमार जाटव तबके से आती हैं. बीजेपी का फोकस यूपी में गैर-जाटव तबके के दलित समुदाय पर रहा है, जिन्होंने पिछले यूपी विधानसभा और लोकसभा चुनाव में बीजेपी का साथ दिया था.

मायावती को भी साध लिया

दूसरी तरफ, मीरा कुमार के बहाने कांग्रेस ने मायावती को साधा है जो खुद जाटव समुदाय से आती हैं और आज भी उस समुदाय की वो सबसे बड़ी नेता हैं.

इसके अलावा विपक्ष को लग रहा था कि मीरा कुमार का महिला होना, एक साथ दलित-महिला दोनों को साधने में सफल रहेगा. यही बात प्रकाश अंबेडकर और सुशील कुमार शिंदे पर भारी पड़ गई.

पूर्व राजनयिक मीरा कुमार कांग्रेस के बड़े नेता बाबू जगजीवन राम की पुत्री हैं. इसीलिए मीरा कुमार को राजनीति विरासत में मिली थी. अपनी विदेश सेवा की नौकरी के बाद 1985 में वो पहली बार यूपी के बिजनौर से सांसद बनी. इस चुनाव में उन्होंने मायावती और रामविलास पासवान दोनों को हराया था.

इसके बाद वो दिल्ली के करोलबाग से आठवीं, ग्यारहवीं और बारहवीं लोकसभा के लिए चुनी गई. मीरा कुमार यूपीए-2 कार्यकाल के दौरान 2009 से 2014 तक लोकसभा की स्पीकर बनाई गई. इस दौरान वो बिहार के सासाराम से सासंद थी.

विपक्ष को लगता है कि स्पीकर के तौर पर सभी दलों के भीतर उनकी स्वीकार्यता और अलगअलग दलों के नेताओं के साथ उनके संबंध का फायदा भी उन्हें मिल सकता है. लिहाजा उनका नाम आगे कर दिया गया.

क्या मान जाएंगे नीतीश ?

अब विपक्ष की कोशिश है कि एक बार फिर से मीरा कुमार के नाम पर बाकी दलों को राजी किया जाए. खास तौर से जेडीयू अध्यक्ष नीतीश कुमार को साथ लाने के लिए एक कोशिश फिर से की जाएगी.

Lalu-Nitish

नीतीश के साथ बिहार के गठबंधन में शामिल आरजेडी अध्यक्ष लालू यादव ने विपक्षी दलों की बैठक के बाद साफ तौर पर कहा कि मैं नीतीश कुमार से इस मामले में बात कर फिर से फैसले पर पुनर्विचार के लिए कहूंगा.

विपक्ष की तरफ से विरोध करने की खानापूर्ति के कारण उसके अंदर का अंतरविरोध सामने आ गया है. लेकिन, विपक्षी नेताओं को शायद अबतक ये बात समझ में नहीं आ रही कि वो कैसे धीरे-धीरे मोदी के ट्रैप में फंसते जा रहे हैं.

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