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प्रतापपुर विधानसभा: वोट केवल जातीय आधार पर पड़ेगा

इलाहाबाद से सटे प्रतापपुर विधानसभा क्षेत्र में कम विकास के बावजूद वोट जातीय आधार पर ही पड़ेंगे

Badri Narayan Updated On: Feb 18, 2017 08:02 AM IST

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प्रतापपुर विधानसभा: वोट केवल जातीय आधार पर पड़ेगा

हम एक सोच के साथ उत्तर प्रदेश के उन इलाकों की तरफ बढ़ रहे थे जो विकास के दावों-वादों से शोर अपनी समस्याओं के अंधेरे में जीने को मजबूर हैं. हम ये जानना चाहते हैं कि यूपी के ऐसे दूरस्थ ग्रामीण इलाकों में लोगों की लोकतंत्र और चुनाव को लेकर क्या सोच है?

इसी यात्रा में एक पड़ाव बना बरेठी गांव. इलाहाबाद से सटे प्रतापपुर विधानसभा क्षेत्र का ग्रामसभा बरेठी. यहां 12 पट्टियां हैं. जहां अलग अलग जातियों का वर्चस्व है. लेकिन वर्चस्व वाली जातियां दलित समाज से ही जुड़ी हैं.

तकरीबन छह हजार वोटों वाली इस ग्रामसभा की तस्वीर भी दूसरे गांवों से अलग नहीं. विकास की गोधूली बेला भी यहां तक छन कर नहीं पहुंच पाती है.

दलित बहुल होने से विकास से महरूम

barethi

शायद गांव का दलित बहुल होना भी इसकी एक वजह है. बरेठी की 12 पट्टियों में एक है गोसाई चकिया जहां कुर्मी, चमार और गोसाई जाति के लोग हैं. सऊदपुर में श्रीवास्तव और ब्राह्मण की तादाद ज्यादा है. बिहवा में मौर्या, चमार और मुसलमानों की तादाद ज्यादा है.

सैतापुर में मुस्लिम, कुर्मी और पासी मिल जाएंगे. बुगतीपुरा में मुस्लिम समुदाय के लोग ज्यादा है. बड़ी चमौरत और बगिया चमौरत में चमार जाति के लोग ज्यादा हैं. नयापुरा में कुर्मी, गड़रिया और मुस्लिम हैं तो कटरा में कुशवाहा और मुसलमान.

बरेठी में चमार और बनिया हैं तो बरेठी बाजार में बनिया, मुस्लिम और कुर्मी बहुत हैं. बरेठी में जातीय समीकरण एक नजर में चुनाव की तस्वीर साफ कर सकते हैं कि ये वोटर दलित वोट बेस का बड़ा हिस्सा है. लेकिन ऐसा नहीं है. यहां का वोटर भी अपनी सोच रखता है.

इनके लिये चुनाव और लोकतंत्र का केवल एक ही मतलब है. ये चाहते हैं कि जो भी सरकार बने वो इनके लिये समाजिक कल्याण की योजना लाए. ये चाहते हैं कि सरकार इनके लिये योजनाएं लाएं ताकि मूलभूत बुनियादी सुविधाएं ये हासिल कर सकें. लेकिन ये वोट देंगे तो सिर्फ जाति के आधार पर.

जाति से कोई समझौता नहीं. सरकार चाहे किसी की भी हो या कोई भी हो इनकी मांग समाजिक कल्याण की योजनाओं की है. उसकी एक बड़ी वजह ये भी है कि यहां के वोटरों में सपा सरकार के प्रति नाराजगी भी है.

मायावती के शासन में हुए थे कई काम

मायावती के समर्थक

तस्वीर: पीटीआई

दरअसल मायावती के शासनकाल में इस गांव में कई काम हुए थे. महामाया योजना के तहत अंबेडकर ग्राम सभा से इस गांव के जुड़ने के बाद यहां के हालात बदल गए थे. लेकिन अखिलेश सरकार ने सत्ता में आने के बाद महामाया योजना ही बंद कर दी गई.

पांच साल से ये गांव फिर उसी अंधेरे में गुम हो गया जहां राजनीति वोटरों को टटोल-टटोल कर ढूंढ निकालती है. महामाया योजना की वजह से चमरौत इलाके में रोड और लाइट पहुंचे थे.

यहां चाहे अमीर हो या गरीब सबके लिये लोकतंत्र या चुनाव का मतलब सिर्फ इतना ही है कि उनके कल्याण के लिए सरकार कुछ करे और समाजिक योजनाएं लाए. यही वजह है कि यहां लोग मायावती के शासन को शिद्दत से याद करते हैं. चमार, पासी, धोबी और धरिकार का बीएसपी के प्रति रुझान है.

दलित जो बीएसपी को वोट दे रहे हैं उसमें जाति तो मुद्दा है साथ ही चमार के अलावा भी वोट दे रहे हैं. उनका कहना है कि जब दलित शासन हो तो पुलिस परेशान नहीं करती. दरअसल दलित बस्तियों में खाकी की बेरोकटोक धमक पूरी पट्टी को दहलाने के लिये काफी रहती है. दलितों के लिये बहू-बेटियों का सबसे बड़ा सवाल होता है.

वहीं किसी भी सरकारी काम के लिये बिना घूस काम पूरा नहीं होता. लेकिन मायावती के शासन में न इन्हें घूस देनी पड़ती है और दलित बहू-बेटियो को सुरक्षा भी मिलती है. मायावती की समाजिक योजना इनके लिये मिसाल है जिसकी वो दूसरी सरकारों से तुलना करते हैं.

गांव की चाहे गुलाबी देवी हों या फिर कौशल्या देवी, सबकी शिकायत एक ही है कि समाजवादी पार्टी की सरकार से दलित होने के बावजूद कुछ नहीं मिला. गांव को जो भी फायदा हुआ वो केवल अंबेडकर ग्राम सभा योजना के वक्त हुआ.

जाहिर तौर पर इन लोगों को लिये लोकतंत्र का मतलब बुनियादी संसाधनों का मिलना है. ये अनपढ़ जरूर हैं लेकिन जिंदा रहने की शर्तों को बखूबी समझते हैं. तभी इनकी मांग चांद-सितारों की नहीं बल्कि अंधेरे में डूबी और ऊबड़-खाबड़ रास्तों में कहीं कीचड़ तो कहीं गड्ढे से पटी सड़कों के लिये एक अदद रोड और थोड़ी सी रोशनी की है.

एक नजर में लोग बरेठी को दलितों का गांव कह कर आगे बढ़ सकते हैं. शायद ये सोचकर कि इस गांव के वोटर की सोच से देश को क्या फर्क पड़ेगा? लेकिन ऐसे ही छोटे-छोटे टुकड़ों में बसी बस्तियां संविधान के हर्फ में कहीं न कहीं मौजूद होती हैं जिन पर सियासतदां की नजर नहीं होती. उनके फैसले शहरी मानसिकता की ओट में ग्रामीण जनजीव को किस तरह आहत करते हैं इसकी बानगी है नोटबंदी.

नोटबंदी का पड़ा असर

barethi

बरेठी गांव में सबसे गरीब धरिकार जाति के माने जाते हैं. धरिकार जाति का एक युवक है सूजन. उसकी चिंता दो जून की रोटी है. वो बैठकर सरकारी खाना नहीं खाना चाहता है. वो मेहनत से कमाना चाहता है ताकि सम्मान से अपना घर चला सके. परिवार पाल सके और दो वक्त का खाना खा सके. लेकिन नोटबंदी के बाद बदले हालात ने उसकी छोटी सी ख्वाहिश को भी पहाड़ बना दिया.

नोटबंदी यहां भी बड़ा मुद्दा है जिसने लोगों के रोजगार पर असर डाला. पहले इलाहाबाद जा कर लेबर चौक पर काम मिल जाता था. आजकल वो सब बंद है क्योंकि मकानों का निर्माण नहीं हो रहा. न कोई दूसरा काम है जिस वजह से दो वक्त के खाने के भी लाले पड़े गए हैं.

ऐसे लोगों के लिये भला चुनाव और लोकतंत्र के क्या मायने हो सकते हैं? ये सवाल हम समझ भी रहे हैं और लोगों से पूछ भी रहे हैं. सबकुछ जानते और देखते हुए भी.

राजनीति की बात करें तो यहां भी ऊंची जाति के लोग बीजेपी को वोट देते हैं. वहीं कुर्मी जाति के लोगों का रुझान अपना दल की तरफ है. यहां के वोटरों का संदेश साफ है. वोट केवल जाति के आधार पर ही देंगे.

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