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पूर्वोत्तर में हिंदुत्व: आरएसएस क्या बीजेपी को मजबूत जमीन दे पाएगी

मणिपुर के पहाड़ी, ईसाई बहुल इलाकों में अपनी जगह बनाना संघ के लिए बड़ी चुनौती है

Simantik Dowerah Updated On: Apr 27, 2017 11:00 PM IST

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पूर्वोत्तर में हिंदुत्व: आरएसएस क्या बीजेपी को मजबूत जमीन दे पाएगी

संपादक की बात: फ़र्स्टपोस्ट ने उत्तर पूर्व में बीजेपी और संघ के विकास की कहानी को समझने की कोशिश शुरू की है. इस दिशा में हमारी दो भाग की सीरीज की ये पहली किस्त है. इसमें हम ये समझने की कोशिश करेंगे कि पूर्वोत्तर में बीजेपी के विकास में आरएसएस का कितना रोल है?

असम

असम में आरएसएस की सबसे पहली शाखा 27 अक्तूबर 1946 को गुवाहाटी में खुली थी. संघ के तीन कार्यकर्ता दादारावा परमार्थ, वसंतराव ओक और श्रीकृष्ण परांजपे, उत्तर पूर्व के राज्यों में आरएसएस के प्रचार के लिए गए थे.

1949 में गुवाहाटी और शिलॉन्ग और डिब्रूगढ़  में भी शाखाएं खोली गईं. इन शाखाओं की स्थापना का श्रेय ठाकुर राम सिंह को जाता है. हालांकि उस दौर में संघ पूर्वोत्तर में तेजी से विकास नहीं कर सका. इसकी वजह ये थी कि महात्मा गांधी की हत्या के बाद, संघ सरकार के निशाने पर था.

पूरे असम में आरएसएस की जड़ें मजबूत करने का काम राधिका मोहन गोस्वामी ने आरएसएस के संस्थापक केशव बलिराम हेडगेवार से मिलने के बाद किया.

हेडगेवार ने ही 1925 में नागपुर में आरएसएस की बुनियाद रखी थी. असम मे आरएसएस करीब 70 साल से वजूद में है. अब बीजेपी को मिल रही राजनैतिक कामयाबी के बाद लोग संघ की मौजूदगी को पहचान रहे हैं.

मजबूत हुई है बीजेपी

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असम के प्रांत प्रचारक शंकर दास का कहना है कि अब से पहले असम में बीजेपी कोई ताकत नहीं थी. आज बीजेपी केंद्र में है. कई राज्यों में उसकी सरकार है.

असम में पिछले साल के विधानसभा चुनाव में बीजेपी की जीत वैसी ही चौंकाने वाली थी, जैसी अमेरिका में डोनल्ड ट्रंप का राष्ट्रपति बनना या ब्रिटेन में डेविड कैमरन का ब्रेग्जिट जनमत संग्रह में हार जाना रहा. बीजेपी की इस जीत के पीछे संघ की बरसों की मेहनत का हाथ माना जाता है.

2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने असम की 14 में से 8 सीटें जीती थीं. पिछले साल विधानसभा चुनाव में 126 सीटों में से 60 बीजेपी के खाते में आईं थी. ये सब रातों रात नहीं हुआ था. इस कामयाबी के लिए आरएसएस ने 70 साल तक जी तोड़ मेहनत की थी.

आरएसएस ने बीजेपी को दिलाई 

फिलहाल असम में संघ की 903 शाखाएं, 118 मिलन और 47 मंडलियां काम कर रही हैं. इसके अलावा 3200 स्थानों पर आरोग्य मित्र, 323 जगहों पर कल्याण आश्रम और 450 सेवा भारती प्रोजेक्ट काम कर रहे हैं. यही नहीं इसके अलावा 546 और तरह की सेवाएं भी संघ से जुड़े संगठन स्थानीय लोगों की दे रहे हैं.

यानी आरएसएस के साथ बीजेपी अकेले नहीं है. बल्कि इस जैसी 21 अन्य संस्थाएं भी हैं जो अपना काम कर रही हैं. इनमें अखिल भारती विद्यार्थी परिषद की भूमिका काफी अहम है. इस वक्त असम में करीब 500 विद्या भारती स्कूल हैं जहां करीब 8000 आचार्य 1,40,000 बच्चे को पढ़ाते हैं. इन स्कूलों से अब तक लगभग 20 हजार बच्चे तालीम हासिल कर चुके हैं. इसके अलावा कई और संस्थाएं भी अपने स्तर पर पढ़ने-पढ़ाने का काम कर रही हैं.

आरएसएस बगैर किसी भेदभाव के करता है काम

पिछले साल स्टेट बोर्ट की मैट्रिक परीक्षा में विद्या भारती स्कूल के एक छात्र सरफराज हुसैन ने टॉप किया था. जो इस बात की सनद है कि आरएसएस बिना किसी भेदभाद के सेवा का काम अंजाम देती है.

असम में आरएसएस की लोकप्रियता तो बढ़ रही है लेकिन इसके साथ ही एक मुश्किल भी बढ़ती जा रही है. केंद्र में आरएसएस से जुड़ी पार्टी बीजेपी की सरकार है. अब आरएसएस पर ये आरोप लग रहा है कि केंद्र की मोदी सरकार 1971 के बाद आकर असम में बसे बांग्लादेशी हिंदुओं को नागरिकता देने जा रही है.

ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (आसू ) इसका विरोध कर रही है. आसू का कहना है कि ये असम समझौते के खिलाफ है. मौजूदा मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनोवाल खुद ऑल असम स्टूडेंट यूनियन के अध्यक्ष रहे थे. उन्होंने ही इस मुद्दे को अदालत ले जाने में अहम रोल निभाया था.

हालांकि इस मुद्दे पर आरएसएस की विचारधार बिल्कुल अलग है. संघ का मानना है कि दुनिया भर के हिंदुओं की रक्षा करना भारत की जिम्मेदारी है. इसीलिए वो चाहते हैं कि बांग्लादेशी हिंदुओं को भारत की नागरिकता दी जाए. इसका असम के लोग कड़ा विरोध करते हैं.

शरणार्थियों और घुसपैठिये का फर्क समझना होगा

इसीलिए संघ ने अब कहना शुरू किया है कि आबादी का पूरा बोझ सिर्फ असम पर नहीं पड़ेगा. कोशिश ये होनी चाहिए कि दूसरे राज्यों में भी बांग्लादेश से आए हिंदुओं को बसाया जाए. संघ ये भी कहता है कि लोगों को शरणार्थियों और घुसपैठियों के बीच फर्क समझना होगा.

इस समस्या से बड़ी एक और समस्या है जो असम झेल रहा है. यह है लव जिहाद की समस्या. खास तौर से दक्षिणी असम में ये समस्या बड़े पैमाने पर फैल गई है. बराक वैली में तो बड़े पैमाने पर मुस्लिम लड़के, हिंदू लड़कियों से शादी कर रहे हैं.

मणिपुर

नॉर्थ ईस्ट में मणिपुर कांग्रेस का गढ़ रहा है. लेकिन इस साल मार्च महीने में बीजेपी ने कांग्रेस के इस गढ़ में भी अपना झंडा फहरा दिया. हालांकि कांग्रेस को सीटें ज्यादा मिली थी. लेकिन जिस तरह से सियासी समीकरण बदले थे, उसमें कांग्रेस को सरकार बनाने के खेल में मात मिली.

मणिपुर में बीरेन सिंह की अगुवाई में बीजेपी ने अपनी सरकार बना ली. इससे पहले साल 2012 में बीजेपी 60 सदस्यों वाली मणिपुर विधान सभा में एक भी सीट अपने नाम नहीं कर पाई थी.

नॉर्थ ईस्ट में मणिपुर पहला ऐसा राज्य था जहां बीजेपी की कामयाबी और संघ की पहुंच में फासला दिखता है. हालांकि कुछ लोगों का कहना है कि मणिपुर में कांग्रेस से कम सीट मिलने के बाद भी अगर बीजेपी अपनी सरकार बना पाई तो इसमें मुख्य भूमिका आरएसएस की रही. वहीं कुछ लोग इस बात से इंकार भी करते हैं.

क्या है बीजेपी का मकसद?

एक प्रचारक कहाना कि संघ का काम सिर्फ बीजेपी का विस्तार करना नहीं. आरएसएस ना तो बीजेपी को कंट्रोल करता है और ना ही बीजेपी के लिए काम करता है. ये बात और है कि संघ के ऐसे बहुत से कार्यकर्ता रहे जो राजनैतिक तौर पर भी काफी कामयाब हुए.

संघ के प्रचारकों का कहना है कि आरएसएस कभी भी किसी को किसी खास पार्टी को वोट देने के लिए नहीं कहती. हां इतना जरूर है कि वो लोगों को चुनाव में वोट जरूर देने की बात कहती है. मणिपुर चुनाव में भी आरएसएस ने यही किया था.

जीत की रणनीति?

हालांकि मणिपुर के प्रांत प्रचारक प्रमुख दयानंद राजकुमार का कहना है कि मणिपुर में चुनाव से पहले आरएसएस बहुत तरह की चुनावी सरगर्मियों में शामिल थी.

उनका कहना है कि उन्हों ने बीजीपी की जीत के लिए कई तरह के फोरम भी बनाए थे. पार्टी को ज्यादा से ज्यादा सीटों पर जीत मिले इसके लिए भी कोशिशें की गई थीं. लेकिन इस सबके बावजूद उनके प्रयास मणिपुर के ईसाई आबादी वाले इलाकों में लोगों को अपने साथ नहीं ला सके.

हिंदू मेइती समुदाय पर आरएसएस की खास पकड़

हां हिंदू मेइती समुदाय के लोगों के बीच संघ और बीजेपी ने अच्छी पैठ बना ली है. लेकिन मणिपुर में बीजेपी की जीत की सिर्फ यही वजह नहीं.

इसमें कांग्रेस की सरकार के खिलाफ लोगों के गुस्से ने भी अहम रोल निभाया. स्थानीय लोगों को लग रहा था कि ओकराम इबोबी सिंह की सरकार उनके हक में अच्छा काम नहीं कर रही. इसीलिए उन्होंने बीजेपी में एक विकल्प देखा तो उसे मौका दिया.

मणिपुर में संघ की फिलहाल 107 शाखाएं हैं. यहां के प्रांत प्रचारक राजकुमार का कहना है कि ये संख्या अभी काफी कम है. मणिपुर में संघ के विस्तार की काफी गुंजाइश है. लेकिन दिक्कत ये है कि बीजेपी की चुनावी कामयाबी के बाद अब बहुत से लोग सत्ता के करीब आने के लिए संघ से जुड़ रहे हैं.

क्या है संघ की चुनौती?

इसके अलावा मणिपुर के पहाड़ी, ईसाई बहुल इलाकों में अपनी जगह बनाना संघ के लिए बड़ी चुनौती है. संघ से जुड़े संगठन वनवासी कल्याण आश्रम और एकलव्य विद्यालय की तारीफ ईसाई समुदाय के लोग भी कर रहे हैं.

इन संस्थाओं में बच्चों को मुफ्त में पढ़ाया जाता है. आरएसएस के और संगठन जैसे अखिल भारती पूर्व सैनिक सेवा परिषद और विद्या भारती भी मणिपुर में अहम भूमिका निभा रहे हैं.

प्रांत प्रचारक राजकुमार का कहना है कि अभी तो पूर्वोत्तर में उन्होंने कामयाबी के सफर का आगाज किया है. वो मानते हैं कि आने वाले दिनों में मणिपुर में भी संघ अपनी जड़ें मजबूत कर लेगा.

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