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पूर्वोत्तर में हिंदुत्व: बीजेपी को कमजोर बना सकते हैं ईसाई

त्रिपुरा और मेघालय में आरएसएस की मजबूत पकड़ के बावजूद पूर्वोत्तर में बीजेपी कमजोर पड़ सकती है

Simantik Dowerah | Published On: Apr 27, 2017 10:04 PM IST | Updated On: Apr 27, 2017 11:01 PM IST

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पूर्वोत्तर में हिंदुत्व: बीजेपी को कमजोर बना सकते हैं ईसाई

संपादक की बात: फर्स्टपोस्ट ने उत्तर पूर्व में बीजेपी और संघ के विकास की कहानी को समझने की कोशिश शुरू की है. इस दिशा में हमारी दो भाग की सीरीज की ये पहली किस्त है. इसमें हम ये समझने की कोशिश करेंगे कि पूर्वोत्तर में बीजेपी के विकास में आरएसएस का कितना रोल है?

उत्तर पूर्व के राज्यों में बीजेपी इस वक्त तेजी से सियासी ताकत के तौर पर उभरी है. बीजेपी का पूर्वोत्तर में विस्तार भले नया हो, मगर, हिंदुत्ववादी संगठन आरएसएस के लिए ये इलाका नया नहीं. संघ की इस इलाके में मौजूदगी आजादी से पहले के दौर की है.

संघ ने इस इलाके में पहुंच बनाने की कोशिश 1946 से शुरू कर दी थी. उस वक्त असम बहुत बड़ा राज्य था. आज के मिजोरम, नागालैंड और मेघालय भी असम का हिस्सा थे. लेकिन इस इलाके में आरएसएस की पैठ की चर्चा आज इसलिए हो रही है क्योंकि सियासी लेवल पर बीजेपी को बड़ी कामयाबियां मिल रही हैं. और इसका क्रेडिट संघ को दिया जा रहा है.

पिछले साल बीजेपी ने असम में चुनाव जीतकर सरकार बनाई. इस साल पार्टी ने मणिपुर में बड़ी चुनावी कामयाबी हासिल की और सरकार बनाई. वैसे तो अरुणाचल प्रदेश में भी बीजेपी की सरकार है, मगर वहां बीजेपी ने ये सरकार चुनाव जीतकर नहीं बनाई. अभी अरुणाचल प्रदेश में बीजेपी की चुनावी ताकत परखी जानी बाकी है.

पूर्वोत्तर में कामयाबी का श्रेय किसको?

कुछ लोग पूर्वोत्तर में बीजेपी की कामयाबी का श्रेय आरएसएस को देते हैं. इनका कहना है कि बरसों से संघ के प्रचार इन इलाकों में मेहनत कर रहे थे.

उन्हीं की तैयार की हुई सियासी जमीन पर बीजेपी ने चुनावी कामयाबी की फसल काटी है. वैसे कुछ लोग इस बात से इत्तेफाक नहीं रखते. हमारी कोशिश है कि हम अरुणाचल प्रदेश, असम और मणिपुर में बीजेपी के विस्तार की वजह तलाशें. इन तीनों ही राज्यों में आज बीजेपी की सरकारें हैं.

मणिपुर और अरुणाचल प्रदेश, आरएसएस के दक्षिण असम प्रभाग में आते हैं. वहीं असम, संघ के उत्तर और दक्षिण असम प्रभाग में स्थित है.

अरुणाचल प्रदेश

सुनील मोहंती, दस सालों से दिल्ली यूनिवर्सिटी में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर थे. उनकी जिंदगी मजे में चल रही थी. करीब दस साल पहले उन्होंने संघ के लिए काम करने का फैसला किया.

जेएनयू से डॉक्टरेट करने वाले सुनील मोहंती आज अरुणाचल प्रदेश में आरएसएस के प्रांत प्रचारक हैं. वो पिछले छह साल से अरुणाचल प्रदेश में संघ के लिए काम कर रहे हैं. वो मानते हैं कि आज संघ को राज्य में लोग जानने और मानने लगे हैं.

सुनील मोहंती बताते हैं कि जब पिछले साल दिसंबर में संघ प्रमुख मोहन भागवत अरुणाचल प्रदेश आए तो, उन्हें सुनने के लिए दस हजार लोग इकट्ठे हुए. सिर्फ 14 लाख की आबादी वाले प्रदेश में ये तादाद काफी बड़ी मानी जाएगी.

वो भी तब, जब अरुणाचल प्रदेश के लोगों के लिए मोहन भागवत की भाषा समझनी मुश्किल हो. मोहंती बताते हैं कि राज्य प्रशासन से भी बहुत से लोग मोहन भागवत के कार्यक्रम में शामिल हुए. वो इसलिए नहीं आए थे कि राज्य में बीजेपी की सरकार थी. मोहंती के मुताबिक वो लोग संघ को और करीब से जानना चाहते थे. इसीलिए मोहन भागवत के कार्यक्रम में शामिल हुए.

बिना लड़े कैसे बना ली सरकार?

31 दिसंबर 2016 को अरुणाचल पीपुल्स पार्टी के 33 विधायक मुख्यमंत्री पेमा खांडू की अगुवाई में बीजेपी में शामिल हो गए. इस तरह पार्टी ने बिना चुनाव लड़े राज्य में सरकार बना ली.

पिछले साल ही असम के विधानसभा चुनाव में बीजेपी को जबरदस्त जीत हासिल हुई. पिछले महीने मणिपुर में पार्टी ने बड़ी चुनावी कामयाबी हासिल की. उत्तर-पूर्वी राज्यों में बीजेपी की जीत चौंकाने वाली है.

हालांकि बीजेपी ने 1960 में ही पूर्वोत्तर में जड़ें जमाने की कोशिशें शुरू कर दी थीं. उस वक्त नगालैंड के मौजूदा गवर्नर पद्मनाभ आचार्य ने 'भारत मेरा घर' के नाम से अभियान शुरू किया था. आचार्य आरएसएस से जुड़े हुए थे.

सुनील मोहंती कहते हैं कि, 'आरएसएस को इस इलाके में लोगों ने 90 के दशक से अहमियत देनी शुरू की थी. आज लोग संघ को मानने लगे हैं. पहले तो उन्हें संघ के बारे में पता ही नहीं था. लेकिन अब लोगों को ये अंदाजा है कि आरएसएस लोगों और समाज के भले के लिए काम कर रहा है. लोगों का हम पर भरोसा बढ़ रहा है. हम समाज को आत्मनिर्भर बनाने की कोशिश कर रहे हैं'.

क्या संघ बाहर के विचार थोप रहा है?

सुनील मोहंती इस आरोप से इनकार करते हैं कि संघ, बाहर के विचार और तजुर्बे को यहां के लोगों पर थोप रहा है. वो कहते हैं कि 'संघ की सोच विश्व स्तर की है. मगर हम स्थानीय बातों को भी पूरी अहमियत देते हैं. हम किसी को बांट नहीं रहे हैं. हम धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं करते. हम किसी पर कोई चीज थोप नहीं रहे. हम एकता में अनेकता पर भरोसा करते हैं. हमें लगता है कि सांस्कृतिक तौर पर हम एक ही हैं. यही हमारे देश के सनातन धर्म का मूल है'.

अरुणाचल प्रदेश की आधे से ज्यादा आबादी आदिवासियों की है. इनमें से बहुत से लोग डोन्यी-पोलो और रंगफ्रा जैसे स्थानीय संप्रदाय को मानने वाले हैं. अक्सर ये आरोप लगता है कि संघ इन सभी को हिंदुत्व के झंडे तले इकट्ठा करने की कोशिस करता रहा है.

क्या स्थानीय लोगों के हित में है अरुणाचल विकास परिषद?

मगर, सुनील मोहंती कहते हैं कि, 'डोन्यी-पोलो को मानने वाले पश्चिमी अरुणाचल में रहते हैं. वहीं रंगफ्रा के अनुयायी पूर्वी अरुणाचल प्रदेश में बसते हैं. ये लोग अपने संप्रदायों को बचाने में लगे हैं. हम उन्हें ऐसा करने में मदद कर रहे हैं.'

'अरुणाचल विकास परिषद इस काम में उनकी मदद कर रही है. हम किसी पर हिंदुत्व को नहीं थोप रहे हैं. हम यहां न तो घुसपैठ करने आए हैं और न ही यहां पर अपनी धाक जमाना चाहते हैं. लोगों को ये समझना चाहिए कि ऊपर से जबरदस्ती थोपी गई चीज ज्यादा दिनों तक नहीं टिकती'.

अरुणाचल विकास परिषद, संघ की वनवासी कल्याण परिषद का ही एक नाम है.

विरोध के बावजूद बढ़ रही हैं आरएसएस की शाखाएं

विरोध के बावजूद अरुणाचल प्रदेश में संघ की शाखाओं की तादाद बढ़ रही है. आज अरुणाचल के कमोबेश हर अहम इलाके में आरएसएस की शाखा लगती है. इसी से साफ है कि संघ का असर राज्य में बढ़ रहा है.

सुनील मोहंती बताते हैं कि अरुणाचल प्रदेश में 36 शाखाएं लगती हैं. इसके अलावा राज्य में संघ की मिलन के नाम से 50 बैठकें होती हैं. ये बैठकें हर हफ्ते होती हैं. अरुणाचल प्रदेश में हर वर्ग किलोमीटर में सिर्फ 17 लोग रहते हैं. इस हिसाब से देखें तो संघ का काफ़ी असर अरुणाचल में देखने को मिल रहा है.

स्थानीय लोगों की मदद करता है संघ

संघ से जुड़े दूसरे संगठन जैसे सेवा भारती यहां मुफ्त में कोचिंग देते हैं. सेवा भारती लोगों को गणित पढ़ने में मदद करती है. और सिविल सेवाओं की तैयारी में भी मदद करती है.

बीजेपी ने गली गली और मोहल्ले में जाकर बहुत तरह से लोगों को अपने पक्ष में किया है लेकिन बीजेपी के लिए असल परीक्षा 2019 में होगी जब अरुणाचल प्रदेश में विधानसभा चुनाव होंगे.

बीजेपी और आरएसएस में बड़ा फर्क ये है कि बीजेपी सियासी दल है, जबकि संघ सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन. वैसे दोनों के बीच गहरा ताल्लुक रहा है.

संघ के प्रचारक सुनील मोहंती कहते हैं कि दोनों संगठनों में संबंध होने के बावजूद ऐसा नहीं है कि आरएसएस बीजेपी को निर्देश देता है. या बीजेपी, संघ के इशारे पर चलती है. मोहंती का कहना है कि संघ के कार्यकर्ता सिर्फ सेवा भाव से काम करते हैं. वहीं बीजेपी में राजनैतिक महत्वाकांक्षा वाले लोग हैं.

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