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जाधव पर फैसलाः भारत के लिए जीत है, लेकिन मोदी के लिए बहुत बड़ी जीत है

जाधव को फांसी से बचाने और उनकी सुरक्षित रिहाई के लिए भारत ने विदेश नीति के कई अलिखित नियम तोड़ दिए हैं

Sreemoy Talukdar | Published On: May 19, 2017 05:45 PM IST | Updated On: May 19, 2017 05:45 PM IST

जाधव पर फैसलाः भारत के लिए जीत है, लेकिन मोदी के लिए बहुत बड़ी जीत है

गुरुवार को इंटरनेशन कोर्ट ऑफ जस्टिस (आईसीजे) ने भारतीय नागरिक कुलभूषण जाधव को फांसी देने पर रोक लगा दी. पाकिस्तान की मिलिट्री कोर्ट ने जाधव को जासूसी और आतंकी गतिविधियों के आरोप लगाकर मौत की सजा सुनाई थी.

आईसीजे से राहत मिलना भारत के लिए बड़ी कूटनीतिक और कानूनी जीत है. इससे भी बढ़कर यह नरेंद्र मोदी के लिए एक बड़ी राजनीतिक जीत है.

अंतर्राष्ट्रीय फोरम में न जाने की परंपरा टूटी

भारत इससे पहले पाकिस्तान के साथ द्विपक्षीय मसलों को अंतर्राष्ट्रीय फोरम पर ले जाने से कतराता रहा है. अपनी अथाह राजनीतिक पूंजी के बावजूद प्रधानमंत्री और उनकी कैबिनेट के लिए आईसीजे का दरवाजा खटखटाने का फैसला आसान नहीं था क्योंकि इसके नतीजे क्या होंगे इसका कोई अंदाजा नहीं था.

हमें इस चीज पर गौर करना होगा कि 8 मई को जब सीनियर काउंसल हरीश साल्वे हेग गए, उस वक्त आईसीजे का सेशन भी नहीं चल रहा था. साल्वे ने एक अर्जेंट एप्लिकेशन यूएन कोर्ट के रजिस्ट्रार के यहां दाखिल की. इसके साथ ही उन्होंने 20 मिनट की एक गहन ब्रीफिंग भी रजिस्ट्रार के सामने दी.

बड़े जोखिमों और आशंकाओं को दरकिनार किया

इसके साथ बड़े जोखिम जुड़े हुए थे. आईसीजे सीधे तौर पर भारत के आवेदन को खारिज कर सकता था. और अगर वह इस पर सुनवाई के लिए राजी भी हो जाता तो भी यह तय नहीं था कि इसका फैसला भारत के पक्ष में आएगा.

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संयुक्त राष्ट्र की न्यायिक संस्था का दरवाजा खटखटाने के फैसले से कई शंकाएं जुड़ी हुई थीं. इस बात की आशंका जताई गई कि इससे एक द्विपक्षीय मसला बहुपक्षीय मसले में तब्दील हो सकता है. इस बात का भी डर पैदा हुआ कि पाकिस्तान इसका इस्तेमाल अंतर्राष्ट्रीय जगत में कश्मीर का मसला उठाने में कर सकता है.

यह भी तर्क दिया गया कि चूंकि आईसीजे के पास फैसला लागू करवाने की ताकत नहीं है, ऐसे में भारत के हाथ इससे कुछ लगने वाला नहीं है. कहा गया कि इसके उलट भारत अपने आप को अंतर्राष्ट्रीय जांच-पड़ताल के लिए खोल देगा.

द हेग स्थित आईसीजे के प्रेसीडेंट जज रोनी अब्राहम ने जाधव की फांसी पर रोक लगाने का आदेश दिया

द हेग स्थित आईसीजे के प्रेसीडेंट जज रोनी अब्राहम ने जाधव की फांसी पर रोक लगाने का आदेश दिया

मोदी को जोखिम लेने का फायदा मिला 

अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आईसीजे का दांव खेलने का बड़ा जोखिम लेने का साहस दिखाया है तो उन्हें इसका पुरस्कार भी मिला है. गुरुवार का आदेश भारत की कूटनीतिक हैसियत को मजबूत करने वाला और मोदी को और ताकत देने वाला है.

पाकिस्तान की आपत्तियों को दरकिनार करते हुए अस्थाई उपायों (प्रोविजनल मेजर्स) के लिए साल्वे की अपील के पक्ष में फैसला देने के साथ आईसीजे ने मोदी को एक जबरदस्त राजनीतिक जीत दी है. इसके दूरगामी रणनीतिक परिणाम हो सकते हैं.

विदेश नीति के मोर्चे पर भारत लंबे वक्त से पराजयवाद का शिकार रहा है. इस मानसिक जकड़ से निकलने के लिए मोदी सरकार की ओर से एक बोल्ड कदम उठाया जाना जरूरी था.

आईसीजे में बड़ी जीत से हमारे अंदर यह भरोसा आया है कि भारत पाकिस्तान की तरह एक बदमाश मुल्क नहीं है. आईसीजे का सर्वसम्मति से सुनाया गया फैसला यह साफ करता है कि अंतर्राष्ट्रीय कानूनों की कद्र करने वाले एक नियमों पर आधारित देश को विवादों को द्विपक्षीय से बहुपक्षीय मंच पर ले जाने से फायदा होने की ज्यादा उम्मीद रहती है.

विदेश नीति के बदले युग की शुरुआत

हकीकत यह है कि पाकिस्तान जैसे गैर-जिम्मेदार मुल्क, जहां जम्हूरियत की बुनियाद बेहद कमजोर हैं, वो तभी अंतर्राष्ट्रीय कानूनों और नियमों को मानते हैं जब बड़ी वैश्विक ताकतें ऐसा करने के लिए उनकी बांह मरोड़ती हैं. इस लिहाज से जाधव का मामला आईसीजे ले जाना भारत की विदेश नीति के एक बदले हुए युग की शुरुआत मानी जा सकती है. इसका पूरा क्रेडिट नरेंद्र मोदी को जाता है.

दुनिया में पाकिस्तान की किरकिरी

न केवल कोर्ट का आदेश पाकिस्तान के खिलाफ आया है, बल्कि इसकी भाषा भी काफी सख्त है. कोर्ट ने पाकिस्तान की इस आपत्ति को भी खारिज कर दिया जिसमें इस केस की अर्जेंसी (तात्कालिकता) पर सवाल उठाए गए थे.

कोर्ट ने भारत के उठाए गए विएना कनवेंशन के आर्टिकल 36 के न्यायक्षेत्र के अधिकार को भी सही ठहराया है. कोर्ट ने कहा कि, ‘पाकिस्तान यह सुनिश्चित करे कि न्यायिक प्रक्रियाओं के पूरे होने तक जाधव को फांसी न दी जाए. साथ ही पाकिस्तान इन उपायों को लागू करने के बारे में कोर्ट को सूचित करे.’

आईसीजे के फैसले पर खुशी जताते भारतीय (फोटो: पीटीआई)

आईसीजे के दिए फैसले पर देश भर में खुशी की लहर दौड़ गई (फोटो: पीटीआई)

अंतर्राष्ट्रीय अदालत के पास फैसलों को लागू करवा पाने की ताकत के अभाव के बावजूद यह कहा जा सकता है कि भारत की जीत कानूनी की बजाय कूटनीतिक और तकनीकी ज्यादा है. आईसीजे ने हालांकि साफ किया है कि उसका आदेश पाकिस्तान पर बाध्यकारी है और इसके उल्लंघन के नतीजे अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबंधों के तौर पर दिखाई दे सकते हैं.

पाक को बड़ी कूटनीतिक पराजय दी मोदी ने

अगर पाकिस्तान इसके बावजूद आदेश का उल्लंघन करते हुए जाधव को फांसी देता है तो वह न सिर्फ अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबंधों को आमंत्रण देगा, बल्कि इससे एक बार फिर से यह साबित हो जाएगा कि पाकिस्तान एक बदमाश मुल्क है जिसकी कोई अंतर्राष्ट्रीय साख नहीं है. पाकिस्तान को इसकी भारी कूटनीतिक कीमत चुकानी होगी.

इससे यह भी साबित होता है कि मोदी ने पाकिस्तान के खिलाफ किसी तरह का बल प्रयोग किए बगैर एक बड़ी कूटनीतिक जीत हासिल कर ली है. हालांकि, इस तरह के फायदे मोदी को मिलने वाले तगड़े राजनीतिक लाभ के सामने बौने हैं.

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भारत ने पाकिस्तान के उस दावे का खंडन किया है कि जाधव एक जासूस है. एक बार को भले ही यह मान भी लिया जाए कि जाधव जासूसी की गतिविधि में शामिल थे तो भी इससे उनको छुड़ाने के लिए भारत के प्रयासों का नैतिक दायित्व कम नहीं होता है.

मोदी के लिए भारतीय नागरिक का जीवन महत्वपूर्ण

शासन कला नैतिकता के सवालों से नहीं चलती. हालांकि, आम तौर पर जासूस पकड़ लिए जाते हैं तो उनकी सरकारें उन्हें स्वीकारने से इनकार कर देती हैं. इस मोर्चे पर मोदी ने एक बड़ी नैतिक और राजनीतिक जीत हासिल की है.

Pakistan Lawyer in ICJ

नीदरलैंड में पाकिस्तान के राजदूत मो. आज़म ख़ान जाधव मामले में सुनवाई के बाद मीडिया से बात करते हुए (फोटो: पीटीआई)

इंडियन एक्सप्रेस में प्रवीन स्वामी ने लिखा है, ‘जासूस के काम को कभी शाबाशी नहीं मिलती है. शायद ही कोई सरकार ने अपने नागरिक के लिए इतनी मजबूती से लड़ाई लड़ी है जितनी नई दिल्ली ने जाधव के लिए कोशिशें की हैं. परंपरा के मुताबिक, खुफिया सेवा में लगे लोगों को उन्हें टॉर्चर करने वालों के हवाले छोड़ दिया जाता है.’

नई दिल्ली आसानी से जाधव के साथ सभी रिश्ते तोड़ सकता था और मुश्किल भरे सवालों का सामना करने से बच सकता था. हालांकि, सरकार ने दावा किया कि जाधव जासूस नहीं हैं, लेकिन भारत के तर्क पर कई तरह के ऐसे सवाल हैं जिनके जवाब नहीं मिले हैं.

सवाल यह है कि क्या नौसेना से रिटायर हुए अफसर जाधव केवल एक प्राइवेट सिटीजन थे जो कि चाबहार पोर्ट पर अपना कारोबार कर रहे थे? याद रखिए कि आईसीजे में इस मामले को रखते हुए भारत काफी सतर्क रहा है. एक भारतीय नागरिक को रिहा कराने में सरकार ने जबरदस्त नैतिक प्रतिबद्धता दिखाई है.

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विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने अपने ट्वीट में लिखा, ‘मैं देश को भरोसा दिलाती हूं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में हम कुलभूषण जाधव को बचाने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे.’

मोदी की इमेज और मजबूत हुई

जाधव को फांसी से बचाने और उनकी सुरक्षित रिहाई के लिए भारत ने विदेश नीति के कई अलिखित नियम तोड़े हैं. इससे दिखाई देता है कि मोदी के लिए शासन कला से ज्यादा एक भारतीय नागरिक का जीवन कहीं अधिक महत्वपूर्ण है.

पीएम मोदी को इस फैसले से ज्यादा ताकत मिलेगी

पीएम नरेंद्र मोदी को इस फैसले से ज्यादा ताकत मिलेगी

पहले से मजबूत उनके राजनीतिक कद को इस फैसले से और ज्यादा ताकत मिलेगी. साथ ही विरोधी दलों को उनके खिलाफ माहौल बनाने में और ज्यादा मुश्किलें पेश आएंगी.

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चूंकि, जाधव का मामला पाकिस्तान से जुड़ा हुआ है, ऐसे में इससे मोदी की दमदार नेता की इमेज और मजबूत हुई है. उनकी छवि एक ऐसे नेता की बन रही है जो कि पाकिस्तान जैसे बदमाश मुल्क से डरने वाला नहीं है. इस लिहाज से आईसीजे का फैसला सर्जिकल स्ट्राइक 2.0 माना जा सकता है.

निश्चित तौर पर हम यह लड़ाई अभी पूरी तौर पर नहीं जीते हैं. यह भी तय है कि पाकिस्तान और अधिक कटुता के साथ पेश आएगा. लेकिन, फिलहाल वह कोर्ट के खिलाफ जाने का जोखिम नहीं उठाएगा. इस वक्त जो भविष्य दिखाई दे रहा है उससे साफ है कि यह फैसला मोदी के लिए एक अभूतपूर्व जीत लेकर आया है.

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