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नोटबंदी@एक साल: न तो कांग्रेस के 'मौन' में, न हाहाकार में कोई ताकत

संसद में भी उन्होंने कम शब्दों में ज्यादा बात कहने की कोशिश की थी और नोटबंदी के एक साल पूरा होने पर भी कमोबेश वही सब दोहराया

Kinshuk Praval Kinshuk Praval Updated On: Nov 07, 2017 06:31 PM IST

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नोटबंदी@एक साल: न तो कांग्रेस के 'मौन' में, न हाहाकार में कोई ताकत

नोटबंदी का एक साल पूरा हो गया. 8 नवंबर की आधी रात के बाद से उठे सियासी हाहाकार का भी एक साल पूरा हो गया. लेकिन नोटबंदी पर सियासत की जुगलबंदी का अलग सुर-ताल के साथ समय-समय पर और ख़ास मौकों पर गूंजना जारी है. पहले यूपी चुनाव के वक्त नोटबंदी के फैसले पर घमासान चला. अब गुजरात और हिमाचल प्रदेश के विधानसभा चुनाव के वक्त एक बार फिर राजनीति की टेबल पर नोटबंदी का 'पोस्टमार्टम' किया जा रहा है.

पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने नोटबंदी को सबसे बड़ी लूट बताया है. वो इसे संगठित लूट मानते हैं. उनका आरोप है कि नोटबंदी के बाद जीएसटी को गलत तरीके से लागू करने की वजह से देश की अर्थव्यवस्था चरमरा गई है. कांग्रेस को देश के वरिष्ठ आर्थिक विशेषज्ञ से इस तरह के बयान की अपेक्षा थी. कांग्रेस ने गुजरात चुनाव प्रचार में नोटबंदी और जीएसटी को बड़ा मुद्दा बनाया है. ऐसे में मनमोहन सिंह का बयान कांग्रेस के आरोपों के लिये ब्रह्मास्त्र माना जा सकता था. लेकिन इस बयान में भी उनके संसद में दिये गए बयान से नया कुछ नहीं निकला. संसद में भी उन्होंने कम शब्दों में ज्यादा बात कहने की कोशिश की थी और नोटबंदी के एक साल पूरा होने पर भी कमोबेश वही सब दोहराया. ऐसे में पूर्व पीएम को नोटबंदी पर आगे करने की कांग्रेस की रणनीति कामयाब नहीं कही जा सकती. पूर्व प्रधानमंत्री का ये बयान महज़ सियासी खानापूर्ति की भरपाई कहा जा सकता है.

बीजेपी ने भी तुरंत ही वरिष्ठ अर्थशास्त्री के आरोपों का जवाब देते हुए दावा किया कि नोटबंदी से न सिर्फ कालेधन पर लगाम कसी गई बल्कि कैशलेस इकॉनॉमी को बढ़ावा भी मिला है. बीजेपी ने नोटबंदी के बदले यूपीए सरकार के वक्त मनमोहन सिंह को टूजी स्पेक्ट्रम घोटाला, सीडब्ल्यूजी और कोयला घोटाले जैसे भ्रष्टाचार के मामले याद दिलाए. इस बहाने पीएम मोदी का नोटबंदी पर राज्यसभा में दिया बयान भी याद किया जा सकता है. मोदी ने तब कहा था कि ‘पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कार्यकाल में इतने भ्रष्टाचार हुए लेकिन उन पर एक दाग़ तक नहीं लगा. बाथरूम में रेनकोट पहनकर नहाने की कला तो कोई डॉक्टर साहब से सीखे’.

दरअसल कांग्रेस ने बीजेपी को अपने शासन के वक्त हुए घोटाले इस कदर विरासत में सौंपे हैं जो कि जनता को भी याद हैं तो बीजेपी कांग्रेस को भी याद दिलाना नहीं भूलती है. इस बार भी यही हुआ. कांग्रेस को उसके ही आरोपों में बीजेपी ने घेरने की कोशिश की.

जब कभी सरकारें कोई ऐसा फैसला लेती है जो जनहित के खिलाफ हो और उससे आम आदमी बुरी तरह प्रभावित होता है तो फैसले से उपजा आक्रोश आंदोलन की शक्ल अख्तियार कर लेता है.

कई बार जनता के आक्रोश से बना जनांदोलन

तीस साल पहले के राजनीतिक इतिहास को ही टटोलें तो वीपी सिंह की सरकार के वक्त मंडल कमीशन के बाद देशभर में हुआ आरक्षण आंदोलन इसकी याद दिलाता है. आरक्षण आंदोलन की आंच और फिर राम मंदिर आंदोलन की तपिश से तत्कालीन वीपी सरकार बुरी तरह झुलसी. इसी तरह भ्रष्टाचार के खिलाफ 7 साल पहले अन्ना ने भी एक आंदोलन खड़ा किया. लोकपाल बिल पर अन्ना का आंदोलन जंतर-मंतर से देश के कोने-कोने तक पहुंच गया. अन्ना के आंदोलन ने केंद्र सरकार के खिलाफ जन-मन को कुछ इस तरह तैयार किया कि बाद में उसी मन:स्थिति से आम आदमी पार्टी फूट पड़ी जिसकी स्वीकार्यता पर आम आदमी ने ही मुहर लगाई. इसी तरह सत्तर के दशक में चला जय प्रकाश नारायण का आंदोलन आज भी देश की सियासत को बदलने के लिए याद किया जाता है.

Rahul Gandhi and Mamata Banerjee at PC

मशहूर लेखक और कवि रामधारी सिंह दिनकर की पंक्तियों को जयप्रकाश ने अपने आंदोलन में आवाज़ दी. 'सिंहासन खाली करो कि जनता आती है' की गूंज का ही जलाल था कि '77 के आम चुनाव में कांग्रेस उत्तर भारत के 11 राज्यों में अपना खाता भी नहीं खोल पाई थी.

आज खुद कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी भी जेपी के आंदोलन में गूंजते नारे सिंहासन खाली करो....को अपने ट्वीट में जगह दे रहे हैं.

हालांकि इसी नारे को दोहराते हुए पटना के गांधी मैदान में पीएम उम्मीदवार रहे नरेंद्र मोदी हुंकार रैली कर जनता को अपने साथ जोड़ने में कामयाब रहे थे.

केंद्र के किसी अप्रत्याशित फैसले के खिलाफ आंदोलन भी तभी सफल हो पाते हैं जब उसमें जनता की भागेदारी जुड़े. ऐसे में सवाल ये है कि नोटबंदी के खिलाफ सियासी पार्टियों की मुहिम में जनता की भागेदारी क्यों नहीं हो सकी?

वाकई अगर नोटबंदी कुछ ऐसा ही जनविरोधी फैसला है और पूर्व प्रधानमंत्री के नज़रिए से ‘संगठित लूट’ तो फिर तमाम राजनैतिक दल इसके विरोध स्वरूप एक क्यों नहीं हो सके? आखिर क्यों नोटबंदी के खिलाफ एक जनआंदोलन सड़कों पर सैलाब नहीं बन सका? आखिर क्यों बैंकों की कतारों में घंटों खड़े लोगों को नोटबंदी के फैसले में राष्ट्रवाद दिखाई देता रहा?

कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने नोटबंदी को देश का सबसे बड़ा घोटाला बताया था. दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने नोटबंदी को लाख करोड़ रुपए का घोटाला बताया. पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी अपना विरोध दर्ज कराने दिल्ली तक आ गईं. संसद में विरोध जताया गया तो पूरा सत्र ही हंगामे की भेंट चढ़ गया. खुलासों की धमकी से संसद में भूचाल लाने का दावा तक किया गया और नोटबंदी के खिलाफ सियासी पार्टियों ने पैदल मार्च भी किया . लेकिन उसके बाद फिर क्या?

ममता बनर्जी वापस कोलकाता लौट गईं. आरोप लगा कर केजरीवाल दिल्ली के गवर्नर के साथ अपनी ‘जंग’ में उलझ गए. राहुल विदेश दौरे पर निकल गए. दूसरे राजनीतिक दल भी आरोप लगा कर यूपी-उत्तराखंड, गोवा, पंजाब और मणिपुर के चुनाव में व्यस्त हो गए. नोटबंदी के मुद्दे पर सवाल इन सियासी पार्टियों पर उठता है जो कि विपक्ष की भूमिका में हैं और जिन पर देश के मजबूत और स्वस्थ लोकतंत्र के प्रभावी इस्तेमाल की जिम्मेदारी है. आखिर क्यों ये तमाम दल नोटबंदी पर चुप्पी लगा गए? अगर नोटबंदी वाकई देश की अर्थव्यवस्था के लिए आत्मघाती फैसला था और आम आदमी की जेब पर डाका था तो फिर जनता के हितों के लिए इन सियासी पार्टियों को कौन सा सांप सूंघ गया? एक जनआंदोलन क्यों नहीं खड़ा किया जा सका?

जनता की नब्ज टटोलने में विपक्ष नाकाम

आखिर क्यों मोदी आम जनता को ये समझाने में कामयाब रहे कि नोटबंदी से न सिर्फ कालाधन बाहर आएगा बल्कि आतंकवाद पर भी लगाम कसी जा सकेगी?

अगर नोटबंदी वाकई 'संगठित लूट' है तो फिर समूचा विपक्ष एक साल से किस बात के इंतज़ार में बैठा रहा?

amit shah- modi

दरअसल मुद्दों के अभाव में अपने परिवारवाद और वंशवाद के बूते सत्ता की राजनीति करने वाली सियासी पार्टियों के लिए नोटबंदी का विरोध एक शगल बन गया. न तो वो जनता को नोटबंदी का नुकसान समझा सके और न ही नोटबंदी के नाम पर किसी तरह के घोटाले के आरोप को साबित ही कर सके. नोटबंदी के बाद के एक साल में नोटबंदी की नाकामी नहीं बल्कि इन पार्टियों की नाकामियां ही सामने आईं.

जनता के मिज़ाज को पढ़ने में इनकी भूल चुनावी नतीजों के रूप में सामने आई. यूपी-उत्तराखंड और गोवा में बीजेपी की जीत के बाद नोटबंदी पर सवाल शांत पड़ चुके थे. लेकिन अब चूंकि गुजरात और हिमाचल का चुनाव है और नोटबंदी का एक साल पूरा हो गया है ऐसे में विरोध सिर्फ खानापूर्ती ही दिखाई देता है. बस फर्क ये है कि पहले नोटबंदी का विरोध था तो अब जीएसटी के रूप में एक दूसरा मुद्दा सामने है.

लेकिन नोटबंदी के एक साल बाद जनता जरूर कांग्रेस से ये सवाल कर सकती है कि आखिर केंद्र की मोदी सरकार के खिलाफ 3 साल में एक भी भ्रष्टाचार का दाग़ क्यों नहीं लगा?

बीजेपी की यही उपलब्धि उसके मिशन 2019 का रोडमैप है और यही वजह है कि नोटबंदी पर मोदी सरकार को घेरने में नाकाम रहने के बाद कांग्रेस की कमज़ोरी अब विकास पर जा कर अटक गई है क्योंकि वो नोटबंदी और जीएसटी के फैसलों को अपने आरोपों के मुताबिक साबित करने में नाकाम रही है. न तो मौन कारगर रहा और न ही हाहाकार से बात बन सकी.

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