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बातों ने नहीं, इरादों ने गढ़ी है नीतीश कुमार की पहचान

छोटी सियासती हैसियत के बावजूद नीतीश कुमार बीजेपी के सहारे बिहार में सीएम की कुर्सी तक पहुंचे

Ravishankar Singh Ravishankar Singh Updated On: Jul 27, 2017 03:37 PM IST

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बातों ने नहीं, इरादों ने गढ़ी है नीतीश कुमार की पहचान

जेपी की संपूर्ण क्रांति ने बिहार की राजनीति को नायकों की एक नई जमात दी. समय के साथ जमात और उसके नायकों की पहचान बदलती रही. कभी जनता दल की राजनीति से जननायक बनने निकले दो साथी लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार का याराना जल्द ही अदावत में बदल गई.

इसे महज संयोग या स्वार्थ भर कह देना ठीक नहीं होगा. सियासत की इस पहली अदावत ने दोनों नेताओं की राजनीतिक महत्वाकांक्षा, उनके तौर-तरीकों और उनके तेवर के बुनियादी फर्क को पानी की तरह साफ कर दिया.

जहां एक ओर लालू यादव ने ठेठ देशज और घोर जातिवादी पहचान को अपनाया, सामाजिक न्याय की दुहाई दे कर अपने करिश्माई जुबान से अपने वोटबैंक की राजनीति को भी पुख्ता किया.

बिहार की राजनीति में फर्श से अर्श तक के सियासती सफर को लालू यादव ने रफ्तार के साथ पूरा किया. वहीं, नीतीश कुमार मंजिल की तलाश में लगातार रास्ते बदलते रहे. सौम्य और कुलीन चेहरे के साथ साफ-सूथरी छवि बनाते हुए नीतीश कुमार ने अपने सियासती मुकाम की ओर कदम बढ़ाना जारी रखा.

छोटी सियासती हैसियत के बावजूद नीतीश कुमार पहली दफा बीजेपी के सहारे बिहार में सीएम की कुर्सी तक पहुंचे. विकासवादी, बिहारवादी, लोकवादी और कल्याणवादी छवि की पहली शुरुआत यहीं से बतौर सीएम नीतीश कुमार ने की थी. बाद के दिनों में बिहारी स्वाभिमान, सुशासन के प्रतीक बने नीतीश कई दफे मुल्य, विचार, भ्रष्टाचार के खिलाफ संकल्प को लेकर चर्चित हुए.

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Nitish oath ceremony

फैसले लेने की क्षमता नीतीश को बातों से आगे ले जाती है

छठवीं बार बिहार के मुख्यमंत्री के तौर शपथ लेने वाले नीतीश कुमार का सियासी सफर कई बार भंवर, बवंडर से हो कर गुजरा है. समझौतावादी राजनीति के सामने हर बार मजबूत सियासी नायक बन कर उभरे नीतीश कुमार को बिहार की आवाम बातों नहीं इरादों का मुख्यमंत्री मानती है.

अपराध, भ्रष्टाचार और धर्मनिरपेक्षता जैसे मसलों के साथ-साथ पूर्ण शराबबंदी जैसे मसलों पर सीधे फैसले लेने की क्षमता नीतीश को बातों से आगे ले जाती है.

अपनी छवि को लेकर सजग नीतीश कुमार ने अपने जीवन में कई राजनीतिक समझौते किए और उसको खुद ही तोड़ दिया. यह पहली बार नहीं हुआ है कि जब नीतीश कुमार बीजेपी के साथ गए हों. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नीतीश कुमार की जोड़-तोड़ की राजनीति में महारत हासिल है.

लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार की शुरुआती राजनीति वीपी सिंह के नेतृत्व में परवान चढ़ी. 90 के दशक में जब जनता दल की बिहार में सरकार बनी तो लालू सीएम बने थे और नीतीश कुमार को बिहार कैबिनेट में जगह मिली थी.

नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव की पुरानी अदावत ही था जिसमें साल 1994 में लालू प्रसाद यादव से अलग होकर नीतीश कुमार जार्ज फर्नांडीस के साथ मिलकर समता पार्टी बना लिया.

साल 1995 में बिहार विधानसभा चुनाव में समता पार्टी नीतीश कुमार के नेतृत्व में चुनाव लड़ा गया लेकिन नीतीश कुमार को मुंह की खानी पड़ी. 1995 विधानसभा चुनाव में समता पार्टी को सिर्फ 7 सीट मिले थे. लालू प्रसाद यादव की पार्टी ने उस समय 167 सीटें हासिल किया था.

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Nitish oath ceremony

राजनीति में नीतीश कुमार का कद धीरे-धीरे बढ़ता गया

लालू प्रसाद यादव ने 1995 के विधानसभा चुनाव में कहा था कि मतपेटी से जिन्न निकलेगा. लालू प्रसाद यादव ने जिस जिन्न निकलने की बात की थी वह वाकई सच हुआ. नीतीश कुमार की समता पार्टी को जबरदस्त हार मिली.

इस हार के बाद नीतीश कुमार ने हार नहीं मानी. बिहार की राजनीति को ध्यान में रखते हुए नीतीश कुमार ने 1996 में समता पार्टी को एनडीए का हिस्सा बनाने में अहम रोल अदा किया था. इसी साल हुए लोकसभा के चुनाव में समता पार्टी को कुल आठ सीटें मिली थी जिसमें 6 सीटें सिर्फ बिहार से आई थी.

1998 में एक बार फिर हुए लोकसभा चुनाव में समता पार्टी की सीट आठ से बढ़कर 12 हो गई. नीतीश कुमार का कद धीरे-धीरे बिहार और केंद्र की राजनीति में बढ़ता गया. एनडीए सरकार में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में रेल मंत्री बने.

बिहार विधानसभा चुनाव 2000 के बाद नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री बने. हलांकि, नीतीश कुमार सिर्फ सात दिन के ही सीएम रहे. लेकिन, तबतक यह साफ हो चुका था कि नीतीश कुमार बिहार की राजनीति में सबसे बड़े नेता के तौर पर उभर चुके थे.

एनडीए का हिस्सा होने के नाते नीतीश कुमार बीजेपी के साथ केंद्र में 6 साल तक सत्ता में रहे. साल 2003 में समता पार्टी से अलग हो कर नीतीश कुमार और जॉर्ज फर्नांडीस ने जेडीयू का गठन किया. साल 2005 में हुए बिहार विधानसभा चुनाव में एनडीए को बहुमत मिला तो नीतीश कुमार बिहार में गठबंधन के नेता के तौर पर मुख्यमंत्री बने.

बिहार के सीएम रहते पार्टी में वर्चस्व को लेकर नीतीश कुमार और जॉर्ज में ही अदावत शुरू हो गई. साल 2007 में नीतीश कुमार ने शरद यादव के साथ मिलकर जॉर्ज को पार्टी के अध्यक्ष पद से हटा दिया.

नीतीश कुमार के समर्थन से ही शरद यादव पार्टी के नए अध्यक्ष चुने गए. जॉर्ज गुट के कई नेताओं ने उस समय नीतीश के इस कदम को तानाशाही कदम बताया था. बांका के उस समय के सांसद और पूर्व रेल राज्य मंत्री स्वर्गीय दिग्विजय सिंह ने नीतीश के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था.

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nitish kumar Bihar CM resigns

2014 से नीतीश कुमार की पहचान एक बड़े नेता के तौर पर होने लगी

साल 2014 लोकसभा चुनाव तक नीतीश कुमार की पहचान देश में एक बड़े नेता के तौर पर होने लगी. मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भी कद उस समय उतना बड़ा नहीं था जितना नीतीश कुमार का था.

राजनीति के जानकार मानते हैं कि नीतीश कुमार अपने शर्तों की राजनीति करते हैं. अपने शर्तों की राजनीति करने के कारण ही साल 2013 में जब बीजेपी ने नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया तो एनडीए से नीतीश कुमार धर्मनिरपेक्षता के नाम पर किनारा कर लिया.

नीतीश कुमार न चाहते हुए भी अपने घुर विरोधी लालू प्रसाद यादव के साथ एक बार फिर से हाथ मिला लिया. हलांकि, नीतीश कुमार का यह दाव लोकसभा चुनाव में उल्टा पड़ गया. बिहार में जेडीयू के सिर्फ 2 सीट से ही संतुष्ट करना पड़ा.

नीतीश कुमार ने हार की जिम्मेदारी लेते हुए सीएम के पद से इस्तीफा दे दिया और जीतन राम मांझी को बिहार का मुख्यमंत्री बना दिया. लेकिन, कुछ ही महीने के बाद जीतन राम मांझी के पैंतरा बदलने के बाद नीतीश कुमार फिर से एक बार बिहार के मुख्यमंत्री बने.

बिहार विधानसभा चुनाव 2015 में एक बार फिर से महागठबंधन बना. आरजेडी, कांग्रेस और जेडीयू की मिली-जुली सरकार बिहार की सत्ता पर काबिज हुई. नीतीश कुमार एक बार फिर से बिहार के मुख्यमंत्री बन गए.

20 महीने बाद महागठबंधन चलने के बाद एक बार फिर से नीतीश कुमार भ्रष्टाचार और बेनामी संपत्ति के समझौते के नाम पर एनडीए का हिस्सा बन गए हैं.

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