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बिहार: किसी को क्यों नहीं हजम होती नीतीश की 'रियलिस्टिक पॉलिटिक्स'

नीतीश कुमार की राजनीति ही मुद्दों पर समर्थन की रही है...हर बार इसे किसी राजनीतिक चश्मे से देखना ठीक नहीं

Vivek Anand Vivek Anand | Published On: Jul 04, 2017 04:34 PM IST | Updated On: Jul 04, 2017 04:51 PM IST

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बिहार: किसी को क्यों नहीं हजम होती नीतीश की 'रियलिस्टिक पॉलिटिक्स'

नवंबर 2016 में बिहार में गठबंधन सरकार के सिर्फ एक साल हुए थे. लालू-नीतीश की नई-नई दोस्ती परवान चढ़ने से पहले ही पटरी से उतरती दिखाई पड़ रही थी. नीतीश कुमार ने मोदी सरकार के नोटबंदी के फैसले की खुलकर तारीफ की थी, जिसके बाद उनके बीजेपी के करीब जाने के किस्से नमक मिर्च लगाकर छापे और दिखाए जाने लगे थे.

पहले नीतीश चुप रहे फिर एक दिन अपने विधायकों के सामने मीडिया पर फट पड़े. विधायकों के साथ हुई एक बैठक में उन्होंने कहा कि कुछ लोग मेरी राजनीतिक हत्या की साजिश रच रहे हैं. फिर बिहार विधान सभा के चैंबर में कुछ पत्रकारों के सामने भी यही बात दोहराई.

उन्होंने कहा कि क्या यही जर्नलिज्म है? ये जर्नलिज्म नहीं, यलो जर्नलिज्म है. आपलोगों को इससे कुछ नहीं हासिल होने वाला. वहां मौजूद पत्रकारों ने बाद में बताया कि आमतौर पर नीतीश इतना तीखा कभी नहीं बोलते. लेकिन उस दिन वो हताशा भरे गुस्से में दिख रहे थे. उन्होंने कहा था कि किसी दूसरे राज्य में ये सब होता तो पत्रकार जेल में होते, लेकिन मैं एक लोकतांत्रिक आदमी हूं, मैं ऐसा नहीं करूंगा. नीतीश कुमार खुद को बीजेपी के करीब बताकर उनका राजनीतिक नुकसान पहुंचाने वालों से नाराज थे.

एक साल बाद 2017 में नीतीश कुमार के साथ एक बार फिर वही हालात हैं. बीजेपी से उनकी करीबी दिखाकर महागठबंधन की सरकार गिराने से लेकर बीजेपी के समर्थन से एक बार फिर बीजेपी-जेडीयू के गठबंधन बनवाने की रिपोर्ट्स आ चुकी है.

फिर पत्रकारों पर भड़के नीतीश

nitish kumar

नीतीश कुमार अब तक चुप थे लेकिन सोमवार को एक बार फिर पत्रकारों पर बरस पड़े. किसी ने पूछा था कि लगता है जेडीयू और आरजेडी के बीच शैडो बॉक्सिंग चल रही है. इस पर नीतीश कुमार ने कहा, ‘कोई शैडो बॉक्सिंग नहीं हो रही है, लेकिन शैडो रिपोर्टिंग जरूर हो रही है. मीडिया कहीं हवा बांध देता है, कहीं बना देता है.’

नीतीश कुमार नाराज हैं उन्हें शिकायत है कि मीडिया बीजेपी से करीबी की कहानियां गढ़कर उन्हें राजनीतिक नुकसान पहुंचा रही है.

क्या सच में मीडिया नीतीश कुमार के साथ नाइंसाफी कर रही है? क्या बीजेपी से उनकी करीबी बताकर मीडिया सिर्फ अपनी धारणा को पुष्ट करने में लगी है?

वही पुरानी धारणा कि लालू-नीतीश की दोस्ती मजबूरी की दोस्ती है जो ज्यादा दिन चल नहीं सकती, बिहार में बीजेपी-जेडीयू का दौर बेहतर था दोस्ती के नए समीकरण में कुछ भी सहज नहीं है, या 17 साल की दोस्ती निभाने वाली बीजेपी ही नीतीश की स्वभाविक सहयोगी हो सकती है लालू और उनकी पार्टी आरजेडी नहीं.

दरअसल ये तीनों ही बड़ी मजबूत धारणा है जो बिहार में पिछले दो सालों के दौरान कई वक्त में सच के इर्द-गिर्द दिखी है. मीडिया ही नहीं बिहार का एक बड़ा वर्ग इस बात की तस्दीक करता है.

जेडीयू और आरजेडी के बीच किसी मुद्दे पर मतभेद की बाबत जिस तरह से दोनों पार्टियों की सेकेंड लाइन लीडरशिप एकदूसरे के खिलाफ रिएक्ट करती है, वो उस पुरानी धारणा को मजबूत ही करता है कि नीतीश-लालू की दोस्ती स्वभाविक नहीं है और ये ज्यादा दिन टिक नहीं सकती.

राजनीतिक माहौल को भांपते हुए मीडिया के ऐसे आकलन को सिर्फ शैडो रिपोर्टिंग कह कर खारिज नहीं किया जा सकता.

जेडीयू के एक सीनियर लीडर बताते हैं कि नीतीश कुमार अपनी छवि को लेकर सशंकित रहते हैं. बिहार में विकास के कार्यों की वजह से सुशासन बाबू वाली जो छवि उनकी बनी है, उसे किसी भी कीमत पर वो बचाए रखना चाहते हैं. अगर राजनीतिक मजबूरियां न होतीं तो वो लालू यादव के करीब न जाते.

कई बार उठे गठबंधन पर सवाल

lalu nitish

पिछले दो साल के दौरान सिर्फ इस दोस्ती को कटघरे में रखकर नीतीश पर न जाने कितनी बार सवाल उछाले गए हैं. काजल की कोठरी में रहकर खुद को बेदाग रख पाना आसान नहीं होता, नीतीश खुद को बेदाग दिखाने की कोशिश में जो करते और कहते दिखते हैं, वही उन्हें बीजेपी के करीब दिखाता है.

लालू यादव के परिवार के खिलाफ बेनामी संपत्ति हासिल करने के आरोप लगे. बेटे, बेटियों के साथ दामाद भी इस घेरे में आ गए. इस मामले पर जब नीतीश कुमार की चुप्पी पर सवाल उठे तो उन्होंने सधा हुआ जवाब दिया. कहा अगर लालू यादव के खिलाफ मामला होगा तो कानून के मुताबिक कार्रवाई होगी और वो हो रही है.

एक स्पष्ट संदेश गया कि नीतीश कुमार लालू को बचाने की कोशिश नहीं कर रहे. उन्हें अपनी छवि का ख्याल है. लेकिन इसका एक मतलब ये भी निकाला गया कि लालू को न बचाकर दरअसल नीतीश महागठबंधन में अपनी ताकत बढ़ा रहे हैं.

नीतीश कुमार की इस तरह की राजनीति को उनके चालाकी वाले मूव के बतौर देखा जाता है. लेकिन इसे रियलिस्टिक पॉलिटिक्स कहना ज्यादा सही होगा. वो साफगोई से अपनी बात रखते हैं. सिर्फ खुद को विरोधी दिखाने के लिए किसी भी मुद्दे पर विरोध नहीं करते. अपनी राजनीतिक हैसियत का सही आकलन करते हैं. और इसी का नतीजा है कि आरजेडी से कम विधायक होने के बावजूद बिहार सरकार पर उनका पूरा कंट्रोल है. वो बिहार के सबसे ताकतवर राजनीतिक शख्सियत हैं. उनके करीब कोई और दूसरा नेता नहीं ठहरता. बिहार से बाहर भी गैरबीजेपी दलों में वो एक सर्वमान्य और सम्मानित नेता हैं.

नीतीश को बार-बार 2019 के लोकसभा चुनाव में विपक्षी दलों की ओर से पीएम पद के दावेदार के बतौर पेश किया जाता है, ये नीतीश की रियलिस्टिक पॉलिटिक्स ही है कि वो सहजता और विनम्रता से इस रेस से खुद को अलग कर लेते हैं.

सोमवार को एक बार फिर उन्होंने कहा कि पीएम बनने की न उनमें क्षमता है और न ही महत्वाकांक्षा. एक छोटे दल के बतौर वो अपनी राजनीतिक हैसियत जानते हैं. 2015 में बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद से ही मीडिया में नीतीश के पीएम मैटेरियल होने की बातें दोहराई जा रही हैं.

पहले सुनकर मुस्कुरा दिया करते थे. फिर पूरे देश में बिहार की तर्ज पर गैरबीजेपी दलों के गठबंधन की कल्पना ने उन्हें ये कहने को मजबूर किया कि राजनीति में कुछ भी असंभव नहीं है, 2014 से पहले कौन जानता था कि नरेंद्र मोदी इतनी शानदार जीत हासिल करके प्रधानमंत्री बनेंगे.

लेकिन यूपी चुनाव के नतीजों के बाद वो भांप गए कि बिखरे विपक्ष की राजनीति का नेतृत्व करना संभव नहीं है.

इसके बाद नीतीश को ये मानने में हिचक नहीं होती कि उनकी राजनैतिक हैसियत नहीं है कि वो पीएम के दावेदार बन सकें. वो लोकतांत्रिक राजनीति के निष्ठुर आंकड़े सामने रख देते हैं. लेकिन वो जितनी बार भी ऐसा करते हैं उनकी छवि मजबूत ही होती है. शायद इसलिए क्योंकि इतनी भी राजनीतिक ईमानदारी किसी दूसरे नेता में नहीं दिखती.

पीएम की तारीफ का मतलब बीजेपी की तरफ झुकाव नहीं

PM Modi at Sabarmati Ashram

पीएम मोदी की कुछ राजनीतिक नीतियों की तारीफ को नीतीश कुमार की राजनीतिक चालाकी बताने से पहले ये सोचना होगा कि ऐसा नहीं है कि उन्होंने मोदी का विरोध नहीं किया है. लेकिन एक बात-बात उन्होंने बार-बार कही है कि आज के राजनीतिक हालात में विपक्ष को रिएक्ट करने की बनिस्बत ऑल्टरनेटिव देने की बात सोचनी होगी. विपक्ष अपना सेक्युलर एजेंडा तय करे और उसी पर आगे बढ़े बजाए कि वो हर बात पर मोदी सरकार को घेरता रहे.

नीतीश की इसी रियलस्टिक पॉलिटिक्स की बदौलत उनकी सहज स्वीकार्यता है. उनकी तारीफ पीएम मोदी भी करते हैं और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह भी. जबकि जैसे केंद्र में पीएम मोदी के सामने कोई नहीं है वैसे ही बिहार में नीतीश के सामने कोई नहीं है.

नीतीश एक छोटे दल का प्रतिनिधित्व करते हैं लेकिन उनकी साफ सुथरी राजनीति ने उन्हें ऊंचा कद दिया है. दरअसल आज की छल कपट और प्रपंच वाली राजनीति ने हमें संदेहों से इतना भर दिया है कि नीतीश की रियलस्टिक पॉलिटिक्स कई बार समझ में नहीं आती. और यहीं पर हम  उनके साथ नाइंसाफी कर जाते हैं.

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