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बिहार: नीतीश ने अपनी अंतरात्मा की आवाज सुनी, कांग्रेस को भी सुननी चाहिए!

विपक्षी गठबंधन को ये स्वीकार करना होगा कि मोदी के हाथों उन्हें एक और हार मिली है

Vivek Anand Vivek Anand Updated On: Jul 27, 2017 07:12 PM IST

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बिहार: नीतीश ने अपनी अंतरात्मा की आवाज सुनी, कांग्रेस को भी सुननी चाहिए!

नीतीश कुमार कल भी सीएम थे और आज भी. लेकिन इस आज और कल में बहुत कुछ बदल गया है. सिर्फ 16 घंटे में बिहार ही नहीं पूरे देश की राजनीति के समीकरण बदल गए. लालू यादव ने कहा कि तेजस्वी तो सिर्फ बहाना था नीतीश को बीजेपी की गोद में जाना था. बीएसपी अध्यक्ष मायावती ने कहा कि जो कुछ हो रहा है वो लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है. अखिलेश यादव ने एक गाने के बोल लिखकर ट्विटर पर तंज कसे. लिखा- ना ना करते प्यार तुम्हीं से कर बैठे. करना था इनकार मगर इकरार तुम्हीं से कर बैठे. लेकिन सबसे दिलचस्प बयान राहुल गांधी ने दिया. राहुल बोले, ‘उन्हें पिछले तीन-चार महीने से पता था कि ऐसी प्लानिंग चल रही है.’

मीडिया से बात करते हुए राहुल गांधी ने कहा, ‘बिहार ने अपना जनादेश एंटी कम्यूनल लड़ाई लड़ने के लिए दी थी. नीतीश कुमार उन्हीं के गले लग गए. राजनीति में पहले से पता चल जाता है कि आदमी के दिमाग में क्या चल रहा है. मुझे साफ पता चल गया था कि नीतीश जी ने प्लानिंग कर ली है. सच बताऊं तो मुझे 3-4 महीने से पता था कि ये प्लानिंग चल रही है. हिंदुस्तान की राजनीति की यही प्रॉब्लम है अपने स्वार्थ के लिए व्यक्ति कुछ भी कर जाता है. कोई नियम नहीं है. कोई क्रेडिबिलिटी नहीं है. सत्ता के लिए कुछ भी कर देते हैं.’

सवाल है कि अगर राहुल गांधी को 3-4 महीने पहले से सबकुछ पता था तो वो कुछ कर क्यों नहीं पाए. क्यों नहीं वो ऐसे राजीनीतिक हालात पैदा होने से पहले उसे रोक पाए. वो अपनी राजनीतिक समझबूझ का इस्तेमाल करके नीतीश कुमार को बीजेपी के साथ जाने से क्यों नहीं रोक पाए. राहुल गांधी को 3-4 महीने पहले से ये बात पता थी लेकिन शनिवार को जब उनकी नीतीश कुमार से मुलाकात हुई तब भी वो कुछ नहीं कर पाए. किसने रोका था राहुल गांधी को?

Chennai: DMK Working president MK Stalin with Congress Vice President Rahul Gandhi and Bihar CM Nitish Kumar during the "94th birthday celebrations of DMK President M Karunanidhi" at a function in Chennai on Saturday. PTI Photo by R Senthil Kumar(PTI6_3_2017_000284B)

कांग्रेस विपक्षी गठबंधन को एकजुट करने में नाकाम रही

कांग्रेस 18 दलों के विपक्षी गठबंधन का नेतृत्व कर रही है. मोदी विरोध वाले विपक्षी गठबंधन की एकजुटता की पूरी जिम्मेदारी कांग्रेस के पास है और कांग्रेस की जिम्मेदारी राहुल गांधी के पास. राहुल गांधी अपनी जिम्मेदारी से सिर्फ ये कहकर नहीं बच सकते कि उन्हें 3-4 महीने पहले से पता था. अगर वो नीतीश कुमार के दिमाग में क्या चल रहा है ये पढ़ गए तो फिर उसे बदल क्यों नहीं पाए?

सच कहा जाए तो ये राहुल गांधी को ही नहीं बल्कि सबको पता था कि बिहार में मची राजनीतिक हलचल की कैसी परिणति हो सकती है. नीतीश कुमार ने कई मौकों पर इसके संकेत दे दिए थे. लालू यादव और उनके परिवार पर लगे भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों पर वो पिछले 3-4 महीनों से असहज थे. इस दौरान उन्होंने राहुल गांधी से लेकर सोनिया गांधी तक से मुलाकात की. लेकिन कोई भी बीच का रास्ता नहीं निकाला जा सका.

अगर कांग्रेस अपने प्रभाव का इस्तेमाल करके तेजस्वी का इस्तीफा दिलवा देती तो क्या ऐसी नौबत आती?  राहुल गांधी कहते हैं कि हिंदुस्तान की राजनीति की यही प्रॉब्लम है अपने स्वार्थ के लिए व्यक्ति कुछ भी कर जाता है. फिर कहां की राजनीति करना चाहते हैं राहुल गांधी? क्या कांग्रेस के स्वार्थ ने पार्टी की दुर्गति नहीं की है.

विपक्षी गठबंधन में नीतीश के नेतृत्व को नकारना नुकसानदायक रहा

राहुल गांधी के नेतृत्व में उनकी पार्टी पिछले 5 वर्षों में 23 चुनाव हार चुकी है. यानी राहुल गांधी ने औसतन हर साल 5 चुनाव हारे हैं. कुछ राज्यों में जहां कांग्रेस ने सबसे ज्यादा सीटें हासिल की हैं वहां भी वो सरकार नहीं बना पाए. गोवा और मणिपुर में सबसे बड़ी पार्टी होते हुए भी कांग्रेस अपनी सरकार नहीं बना पाई. इसके बावजूद पार्टी के नेतृत्व को लेकर उठ रहे सवालों को नजरअंदाज किया जाता है. क्या जन्मजात विरासत में डूबी कांग्रेस का ये स्वार्थ नहीं है?

राहुल, अखिलेश का साथ

राहुल, अखिलेश का साथ

कुछ दिनों पहले मशहूर इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने कहा था कि नीतीश कुमार बिना पार्टी के नेता हैं और कांग्रेस बिना नेता के पार्टी. यानी कांग्रेस जैसी पार्टी को अगर नीतीश कुमार जैसे नेता का साथ मिल जाए तो राजनीतिक परिस्थितियां बदल भी सकती हैं. लेकिन स्वार्थ में डूबी कांग्रेस के नेतृत्व को लगातार हार मंजूर है, राजनीति में हिस्सेदारी का समझौता नहीं.

ये बात याद रखनी होगी कि कभी नीतीश कुमार मोदी विरोध के विपक्षी दलों गठबंधन का मजबूत चेहरा बनकर उभरे थे. नीतीश कुमार ने खुद इसकी पहल की थी. उन्होंने कहा था कि अगर बिहार में गैरबीजेपी दलों का मजबूत गठबंधन सफल हो सकता है तो इसी तर्ज पर पूरे देश में ऐसा प्रयोग क्यों नहीं सफल हो सकता. उन्होंने ऐसे प्रयोग की शुरुआत करते हुए वाम दलों से बात भी की थी. लेकिन ऐसे किसी गठबंधन में उनके नेतृत्व को स्वीकार करने में कांग्रेस का स्वार्थ आड़े आ गया.

नीतीश कुमार ने जिस रणनीति पर चलते हुए बिहार विधानसभा चुनाव में मोदी लहर को शिकस्त दी थी. उसी रणनीति को विपक्षी गठबंधन को अपनाने की बार-बार अपील की. लेकिन उनकी रणनीति चलने नहीं दी गई या फिर कहें कि उन्हें सीरियसली नहीं लिया गया. नीतीश कुमार ने ये बात बार-बार दोहराई है कि मोदी को उनके सेट किए एजेंडे पर हराया नहीं जा सकता. इसलिए मोदी और बीजेपी के हर एक्शन पर रिएक्शन देना गलत है. विपक्षी गठबंधन को अपना खुद का एजेंडा सेट करना चाहिए जो जनता के बीच बहस का मुद्दा बने. लेकिन उनकी बात को तवज्जो नहीं दी गई.

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विपक्षी गठबंधन में नीतीश के लिए जगह नहीं बची थी

अपनी रणनीति पर अमल न होता देखकर कई बार उनकी खीझ भी दिखी. नीतीश कुमार ने बार-बार कहा कि उन्होंने सोनिया गांधी से बात करके भी देखा और राहुल गांधी से भी. लेकिन विपक्ष की एकजुटता इस पर कभी बन नहीं पाई. नीतीश कुमार ने आरोप लगाए कि कांग्रेस ने जानबूझकर उन्हें यूपी चुनाव में हिस्सा लेने नहीं दिया. कांग्रेस को राहुल के सामने नीतीश कुमार का आगे बढ़ना मंजूर नहीं था. इस स्वार्थ ने नीतीश को विपक्ष के गठबंधन से दूर किया.

नीतीश कुमार को ये साफ लगने लगा था कि विपक्षी गठबंधन में उनकी भूमिका सिर्फ वहीं तक सिमटी रह जाएगी जैसी ममता बनर्जी की है या अखिलेश यादव और ममता बनर्जी की है. इस एकजुटता का कोई खास फायदा नहीं मिलने वाला है.

नीतीश कुमार को लगने लगा था कि विपक्षी गठबंधन में उनके लिए कोई जगह नहीं बची है. राहुल गांधी के कमजोर नेतृत्व के आगे नीतीश की मजबूत राजनीतिक शख्सियत भी मजबूर होने लगी थी. नीतीश कुमार ने गठबंधन से अलग होने का एलान भले ही आखिरी वक्त में लिया हो लेकिन उसकी संभावना 3-4 महीने पहले से ही बनने लगी थी.

राहुल गांधी ही नहीं ये सारे लोग देख रहे थे. नीतीश कुमार का बीजेपी के साथ जाना उनका एक समझदारी भरा फैसला है. विपक्षी गठबंधन को ये स्वीकार करना होगा कि मोदी के हाथों उन्हें एक और हार मिली है, जिसका असर लंबे वक्त तक रहेगा. 2019 में तो शर्तिया ही इसका असर होगा.

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