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क्या है रामनाथ कोविंद का गुजरात कनेक्शन?

एनडीए के राष्ट्रपति पद के प्रत्याशी रामनाथ कोविंद का गुजरात से क्या है कनेक्शन

Ambikanand Sahay Updated On: Jun 21, 2017 02:43 PM IST

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क्या है रामनाथ कोविंद का गुजरात कनेक्शन?

डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने काफी वक्त पहले कहा था, 'जाति बुरी हो सकती है. जाति मनुष्य पर मनुष्य के अत्याचार करने का कारण बन सकती है. यह समझना चाहिए कि हिंदू जातियों को इस वजह से नहीं मानते हैं कि वे अमानवीय या बुरे विचारों वाले हैं. वे जातियां इसलिए मानते हैं क्योंकि वे बेहद धार्मिक हैं.'

आप अंबेडकर के इन विचारों से सहमत या असहमत हो सकते हैं. लेकिन एक बात साफ हैः कास्ट फैक्टर लगातार भारत में चुनावों को प्रभावित करता रहा है. चाहे ग्राम पंचायत के चुनाव हों या राष्ट्रपति पद का चुनाव हो, जाति का असर हर जगह दिखता है. यह चीज अभी भी जारी है.

राष्ट्रपति पद के लिए बीजेपी के उम्मीदवार रामनाथ कोविंद, जो एक दलित हैं, को क्यों चुना गया, इस पर काफी कुछ लिखा जा चुका है. हमें ज्यादातर वजहें पता हैं. और सभी वजहें काफी ठोस जान पड़ती हैं.

गुजरात के वोटरों में कोली समुदाय की हिस्सेदारी करीब 24 फीसदी

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गुजरात के सीएम विजय रूपानी

लेकिन, ज्यादातर लोग, जिनमें लुटियंस दिल्ली में रसूखदारों से नजदीकी रखने वाले और अंदर की बातें जानने वाले भी शामिल हैं, भी इस चौंकाने वाले फैसले में एक चीज नोटिस करने से चूक गए. यह चीज कोविंद का गुजराती कनेक्शन. कोविंद कोली समाज से आते हैं और गुजरात के वोटरों में कोली समुदाय की हिस्सेदारी करीब 24 फीसदी है.

विकीपीडिया में कोलियों के बारे में कहा गया है,' 2014 में गुजरात के कोली राज्य में सबसे बड़ा कास्ट क्लस्टर थे. ये आबादी का करीब 24 फीसदी थे और बड़े लेवल पर फैले हुए थे. ये अभी भी ब्राह्मणों और पाटीदारों जैसे दूसरे समुदायों के मुकाबले शैक्षिक और व्यावसायिक तौर पर वंचित हैं. इनकी कई जातियों में बरीया, खांत और ठाकोर शामिल हैं, ये भी कोली नाम जोड़ते हैं, और गुलाम कोली और मटिया कोली जैसे ग्रुप्स को उभार देते हैं. कुछ खुद को कोली नहीं भी बताते हैं.'

'2012 तक नेशनल कमीशन फॉर बैकवर्ड क्लासेज द्वारा कोली नाम रखने वाले कई समुदायों को केंद्र की अदर बैकवर्ड क्लासेज की सूची में रखा गया था. हालांकि, कम से कम एक को शेड्यूल्ड ट्राइब के तौर पर माना गया है. ये वर्गीकरण कम से कम 1993 से प्रभाव में हैं.'

'केंद्र सरकार ने 2001 की जनगणना में दिल्ली, मध्य प्रदेश और राजस्थान में कोली समुदाय को शेड्यूल्ड कास्ट के तौर पर वर्गीकृत किया है.'

'1947 में आजादी के वक्त, कच्छ, काठियावाड़, गुजरात क्षत्रिय सभा (केकेजीकेएस) जाति संगठन का उभार एकछत्र संगठन के तौर पर राज के दौरान शुरू हुए काम को जारी रखने के लिए हुआ.

क्या कहते हैं इतिहासकार

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क्रिस्टोफ जैफरलोट

इतिहासकार और पॉलिटिकल साइंटिस्ट क्रिस्टोफ जैफरलोट ने कहा है कि राजपूतों और कोलियों का प्रतिनिधित्व करने वाली यह संस्था इस बात की अच्छी मिसाल है कि किस तरह से अलग-अलग परंपराओं को मानने वाली जातियां साझा हितों के लिए हाथ मिला लेती हैं. क्षत्रिय शब्द का इस्तेमाल बड़े तौर पर रणनीतिक था और मूल जाति पहचान को गंभीरतापूर्वक खत्म कर दिया गया.'

'परंपरा के संबंध में क्षत्रिय लेबल की प्रासंगिकता केकेजीकेएस के कामकाज के चलते धूमिल हो गई. इस दौरान इसका हिस्सा रहे समुदायों ने बैकवर्ड क्लास में शामिल किए जाने की मांग की. क्षत्रिय खुद इस तरह की कैटेगरी में शामिल नहीं होना चाहते थे. और ऐसे में इसने संस्कृतिकरण के सिद्धांत का प्रतिवाद शुरू किया, लेकिन इस मौके पर यह सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक इच्छाओं के हिसाब से मुफीद था.'

'1950 तक केकेजीकेएस ने स्कूल बनाए, लोन सिस्टम विकसित किया और ऐसे दूसरे कई काम किए जिससे सामाजिक स्वयं सहायता को बढ़ावा मिले. साथ ही इसने जमीन से जुड़े रिफॉर्म्स की भी मांग की. राज्य स्तर पर इसने राजनीतिक पार्टियों से गठजोड़ शुरू किया. शुरुआत में इसने कांग्रेस से नजदीकी बढ़ाई और बाद में 1960 के दशक में इसने स्वतंत्र पार्टी के साथ गठजोड़ किया.

'1967 में केकेजीकेएस एक बार फिर कांग्रेस के साथ काम करने लगी क्योंकि पाटीदारों के साथ होने के बावजूद पार्टी को केकेजीकेएस के सदस्यों की जरूरत थी. इन दो दशकों में कोलियों को राजपूतों के मुकाबले केकेजीकेएस के कामकाज से सबसे ज्यादा फायदा हुआ. जेफरलोट का मानना है कि इसी दौरान कोली बुद्धिजीवी वर्ग का उदय हुआ.'

'जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर, घनश्याम शाह आज इस संगठन को समुदायों के एक बड़े समूह को कवर करने वाला मानते हैं, जिसमें वंचित राजपूतों से लेकर अर्द्ध-आदिवासी भील भी हैं और इसमें कोली भी शामिल हैं. वह मानते हैं कि यह घालमेल आपसी आर्थिक हितों को दिखाता है. साथ ही यह अच्छी स्थिति में मौजूद जातियों के खिलाफ साझा विरोध के लिए एकजुटता भी दिखाता है.'

इस साल के आखिर में गुजरात में चुनाव होने हैं. साथ ही यह भी देखना जरूरी है कि कोली हार्दिक पटेल के पाटीदारों के साथ नहीं खड़े हैं. स्टेट ओबीसी कमीशन के मुताबिक, ओबीसी में 136 जातियां पहचानी गई हैं. कुल ओबीसी आबादी में कोलियों की हिस्सेदारी करीब 40 फीसदी है.

हालांकि, यह एक अलग चीज है कि 2001 में भारत सरकार ने कोली समुदाय को दिल्ली, मध्य प्रदेश और राजस्थान में अनुसूचित जाति में वर्गीकृत किया है.

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