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नक्सलबाड़ी आंदोलन के 50 साल: रईस जमींदारों के बाद अब बीजेपी-आरएसएस से दुश्मनी

दक्षिणपंथियों से सिर्फ वामपंथी ही लड़ सकते हैं, जरूरत है कि सभी वामपंथी ताकतें एकजुट हों और जनता के लिए जंग लड़ें

Debobrat Ghose Debobrat Ghose | Published On: May 27, 2017 09:50 PM IST | Updated On: May 27, 2017 09:56 PM IST

नक्सलबाड़ी आंदोलन के 50 साल: रईस जमींदारों के बाद अब बीजेपी-आरएसएस से दुश्मनी

25 मई को पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी वामपंथी आंदोलन के 50 साल पूरे हो गए. इस मौके पर आंदोलन के अगुवा रहे चारू मजूमदार, कानू सान्याल और जगंल संथाल के समर्थक और भाकपा-माले लिबरेशन के नेता पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी गांव में जमा हुए.

माले के नेताओं ने अपने समर्थकों से नए आंदोलन के लिए एकजुट होने की अपील की. नेताओं ने अपने समर्थकों से कहा कि वो युवाओं को अपने साथ जोड़कर फिर से नक्सलबाड़ी आंदोलन खड़ा करेंगे.

मगर, 1960 के दशक में जहां इन वामपंथी नेताओं के निशाने पर रईस जमींदार थे. वहीं इस बार इनके दुश्मन संघ और बीजेपी होंगे.

इस मौके पर नक्सलबाड़ी आंदोलन के नेता चारू मजूमदार के बेटे प्रोफेसर अभिजीत मजूमदार ने कहा, 'आंदोलन की पचासवीं सालगिरह पर पूरे पश्चिम बंगाल और दूसरे राज्यों से पांच हजार से ज्यादा लोग नक्सलबाड़ी पहुंचे थे. पहले जहां ये आंदोलन अमीर और गरीब के बीच वर्ग संघर्ष था. इस बार आंदोलन का मुकाबला दक्षिणपंथी आरएसएस-बीजेपी से है. आज वक्त की मांग है कि हम युवा पीढ़ी से जुड़ें. अपने आदर्शों को उन्हें समझाएं'.

अभिजीत मजूमदार सीपीआई (एम-एल) लिबरेशन की सेंट्रल कमेटी के सदस्य हैं. मजदूरों का नक्सल आंदोलन 1967 में पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग जिले के नक्सलबाड़ी गांव से शुरू हुआ था. इस आंदोलन का प्रमुख नारा था-जमीन उसकी जो उस पर मेहनत करता है.

Naxalbari Movement

(फोटो: फेसबुक से साभार)

25 तारीख को बड़ा जनआंदोलन भड़क उठा

पुलिस के हाथों 11 ग्रामीणों के मारे जाने से आंदोलन और भड़क उठा था. मारे गए लोगों मे 8 महिलाएं और दो बच्चे थे. 25 तारीख को एक बड़ा जनआंदोलन भड़क उठा था. इसके अगुवा चारू मजूमदार, कानू सान्याल और जंगल संथाल थे. यह आंदोलन एक दिन पहले हुई घटना के विरोध में खड़ा हुआ था. तब हजारों गांववाले एक थाने का घेराव करने पहुंचे थे. प्रदर्शन के दौरान एक पुलिसवाले की हत्या कर दी गई थी.

आंदोलन को सीपीआई (एम-एल) के बैनर तले खड़ा किया गया था. आज आधी सदी बाद इसके कई गुट बन चुके हैं. सीपीआई (एम-एल) लिबरेशन इनमें से सबसे बड़ा गुट है. गुरुवार को संगठन के तमाम धड़े नक्सलबाड़ी में जमा हुए थे, जो सिलीगुड़ी से 23 किलोमीटर है.

इन लोगों ने वामपंथी आंदोलन में जान गंवाने वालों को श्रद्धांजलि दी. इसके बाद मौजूद लोगों ने सिलीगुड़ी स्टेशन से एक मार्च निकाला, जो सिलीगुड़ी के बाघा जतिन पार्क पहुंचकर एक जनसभा में तब्दील हो गया. यहां पर सदस्यों ने नया आंदोलन खड़ा करने की शपथ ली.

प्रोफेसर अभिजीत मजूमदार ने कहा, 'दक्षिणपंथियों से सिर्फ वामपंथी ही लड़ सकते हैं. इस वक्त जरूरत है कि सभी वामपंथी ताकतें एकजुट हों और जनता के लिए जंग लड़ें'.

सीपीआई (एम-एल) लिबेरशन के पोलित ब्यूरो के सदस्य स्वदेश भट्टाचार्य भी मजूमदार की बात से सहमत हैं. उन्होंने कहा कि संघ और बीजेपी का राष्ट्रवाद हमारे देश के लिए ठीक नही है क्योंकि यह बंटवारे की राजनीति करता है. यह धर्मनिरपेक्ष नहीं है बल्कि यह तो राष्ट्रविरोधी है. सिर्फ वामपंथी यह बात नहीं कहते. संघ और बीजेपी के बारे में यह राय दूसरे दलों की भी है.

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(फोटो: फेसबुक से साभार)

देश की वामपंथी राजनीति पर क्रांतिकारी असर हुआ

हाल ही में सीपीआई (एम-एल) लिबरेशन के महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य ने लिखा कि 'नक्सलबाड़ी आंदोलन का देश की वामपंथी राजनीति पर क्रांतिकारी असर हुआ था. इसने वर्ग संघर्ष को नया रूप दिया. इसने बताया कि लड़ाई सिर्फ आर्थिक मोर्चे तक सीमित नहीं. न ही यह संघर्ष सिर्फ संसदीय राजनीति तक सीमित है. वर्ग संघर्ष हर मोर्चे पर अन्याय के खिलाफ लड़ाई है. जाति और लिंग का मामला हो, नस्ल और राष्ट्रीयता का मसला हो, भाषा और संस्कृति का मुद्दा हो, वर्ग संघर्ष में सबकी जगह है. आज जब संघ परिवार सत्ता में है. वो हिंदी-हिंदू-हिंदुस्तान का नारा दे रहे हैं. वो भारत की असल विचारधारा को दबाने में लगे हैं. वो उद्योगपतियों को लूट की खुली छूट दे रहे हैं. वो देश का ध्रुवीकरण कर रहे हैं. ऐसे में नक्सलबाड़ी आंदोलन की आज फिर से बेहद सख्त जरूरत महसूस की जा रही है'.

हालांकि आज सीपीआई (एम-एल) क्रांति के सीपीआई (माओवादी) के नजरिए से बिल्कुल अलग सोच रखती है. जनता की नजर में नक्सल शब्द और इससे पैदा होने वाला खौफ को सीपीआई (माओवादी) ने अपने हित में इस्तेमाल किया है. वो आज खूनी आंदोलन के लिए जाने जाते हैं. बदनाम हो चुके रेड कॉरिडोर या लाल गलियारे में उनके हिंसक बर्ताव की घटनाएं अक्सर सुर्खियां बनती हैं. छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, ओडिशा और झारखंड में उनकी दहशत है.

सीपीआई (एम-एल) का सीपीआई (माओवादी) से कोई ताल्लुक नहीं. सीपीआई (एम-एल) के नेता कहते हैं कि नक्सलबाड़ी आंदोलन के अगुवा चारू मजूमदार ऐसे हिंसक बर्ताव को कभी मंजूरी नहीं देते. चारू मजूमदार की नजर में आंदोलन के हथियार खेती के यंत्र हैं, बंदूक नहीं.

Naxalbari Movement

(फोटो: फेसबुक से साभार)

आम आदमी के लिए सीपीआई (एम-एल) और सीपीआई (माओवादी) की विचारधारा में फर्क करना बेहद मुश्किल है. हालांकि दोनों में फासला बेहद बड़ा है. दोनों ही संगठन इसे लेकर काफी गंभीर भी हैं.

क्रांतिकारी वर्ग खड़ा करने में नाकाम रहे हैं

सीपीआई (एम-एल) नेता अभिजीत मजूमदार कहते हैं, 'माओवादियों और नक्सलबाड़ी आंदोलन में बहुत फर्क है. नक्सलबाड़ी आंदोलन वर्ग संघर्ष की राजनीति की बुनियाद पर खड़ा हुआ था. वो गरीबों और भूमिहीन मजदूरों के हक की लड़ाई लड़ने के लिए था. लेकिन आज के माओवादी, तमाम आदर्शों के बावजूद एक क्रांतिकारी वर्ग खड़ा करने में नाकाम रहे हैं.'

वो आगे कहते हैं 'नक्सलबाड़ी आंदोलन को भारी जनसमर्थन मिला था. मध्यम वर्ग हो या किसान या फिर मजदूर, इस आंदोलन का समर्थन पश्चिम बंगाल से लेकर कई राज्यों के लोगों ने किया था. माओवादी आज एके-47 और इंसास राइफलों और बारूदी सुरंगों के जरिए जंग लड़ रहे हैं. उनकी नजर में इंसानों की कोई अहमियत नहीं. जबकि ये आंदोलन आम लोगों के लिए था. आज माओवादियों को चुनौती दिए जाने की जरूरत है. साथ ही जरूरत सत्ता को चुनौती देने की भी है. मगर यह राजनीतिक तरीके से होनी चाहिए.'

स्वदेश भट्टाचार्य कहते हैं कि सीपीआई (एम-एल) या सीपीआई (माओवादी) दोनों ही वामपंथी विचारधारा से पैदा हुए. मगर आज दोनों में बहुत फर्क है. दोनों के काम करने के तरीके में फर्क है. भट्टाचार्य का कहना है कि वो माओवादी विचारधारा के समर्थक नहीं. यानी आज पचास साल बाद नक्सलबाड़ी आंदोलन फिर से अपने पैरों पर खड़ा होना चाहता है.

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