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रामजस कॉलेज विवाद: क्या राष्ट्रवाद लोकतंत्र से बड़ा है?

छात्रों और सिविल सोसाइटी के साथ सरकार का टकराव बढ़ेगा.

rakesh kayasth Updated On: Feb 27, 2017 02:31 PM IST

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रामजस कॉलेज विवाद: क्या राष्ट्रवाद लोकतंत्र से बड़ा है?

दिल्ली के रामजस कॉलेज में चंद रोज पहले क्या हुआ था? जवाब सबको पता है. आगे क्या होगा यह समझने के लिए दो तथ्य काफी हैं.

पहला तथ्य आरएसएस के छात्र संगठन एबीवीपी की गुंडागर्दी के विरोध में उतरनेवालों के पोस्टरों पर छपा था- आपका राष्ट्रवाद लोकतंत्र से बड़ा नहीं है.

दूसरा तथ्य एबीवीपी का ताजा बयान है जिसमें उन्होंने कहा है - रामजस कॉलेज जैसे राष्ट्रविरोधी कार्यक्रम जहां कहीं भी होंगे हम उसके खिलाफ विरोध प्रदर्शन करेंगे.

संघ का राष्ट्रवाद बनाम लोकतंत्र 

साफ है कि संघी शैली के राष्ट्रवाद के खिलाफ लोकतंत्र लगातार सिर उठाएगा और राष्ट्रवाद की रक्षा हर बार उसी तरह की जाएगी जिस तरह रामजस कॉलेज के कैंपस में की गई.

यानी सेमिनार में शामिल किसी प्रोफेसर की पसलियां तोड़कर, पत्थर बरसाकर और लड़कियों के बाल खींचकर. मौजूदा दौर में लोकतंत्र और राष्ट्रवाद के संघर्ष की यही वास्तविकता है और सभी संबंधित पक्षों को इस संघर्ष के संभावित नतीजों के लिए तैयार रहना होगा.

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DU Protest

रामजस कॉलेज के सेमिनार में शामिल छात्र और शिक्षकों की एबीवीपी की ओर से राष्ट्रहित में की गई पिटाई के बाद केंद्र सरकार ने अपना स्टैंड साफ कर दिया है.

सरकार के सबसे जिम्मेदार मंत्रियों में एक अरुण जेटली ने वही आदर्श वाक्य दोहराया है, जो एक आदर्श नेता ऐसे आदर्श मौको पर दोहराता है- शारीरिक हिंसा की कहीं कोई जगह नहीं होनी चाहिए.

इसके बाद जेटली साहब ने वो कहा जो संघ परिवार उनसे सुनना चाहता था- अभिव्यक्ति की आजादी का मतलब यह नहीं है कि देश की संप्रभुता का हनन किया जाये.

क्लासरूम में होनेवाले डिबेट से देश की संप्रभुता खतरे में पड़ रही है और सरकार समर्थित छात्रसंघ की आपराधिक हरकत से संविधान मजबूत हो रहा है?

संविधान से परे संघ का राष्ट्रवाद

मामला बहुत साफ है. संघ का राष्ट्रवाद संविधान से परे है और अलग राय रखने का बुनियादी अधिकार सरकारी दया का मोहताज.

यह कोई आरोप नहीं बल्कि ऐसा तथ्य है जो 2014 के बाद से लगातार स्थापित होता आया है. कथित देशद्रोहियों को सबक सिखाने और उन्हे पाकिस्तान भेजने के अनगिनत बयान सामने आये.

लेकिन केंद्र के किसी जिम्मेदार मंत्री का एक भी ऐसा बयान ढूंढना मुश्किल है जिसमें कहा गया हो कि सरकार विधिसम्मत तरीके से काम करके संविधान की रक्षा करेगी.

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ramjas college

दमन का पुराना इतिहास

अलग राय रखने वालों के दमन का इतिहास भारत में कोई नया नहीं है. इस शैली का इजाद इंदिरा गांधी के शासनकाल में हुआ था. सिर्फ इमरजेंसी के दौरान ही नहीं बल्कि उससे पहले और बाद भी ये शैली बदस्तूर जारी रही.

जब चुनी हुई राज्य सरकारें मनमाने तरीके से बर्खास्त की जाती थीं और हर राजनीतिक विरोधी को देशद्रोही करार दिया जाता था. राजीव गांधी भी अपने कार्यकाल के आखिर के दो साल में इसी रास्ते पर चले.

उन्होंने सरकारी मीडिया को अपना भोंपू बनाया और प्रेस पर सेंसरशिप लादने की नाकाम कोशिश की. के.के तिवारी, कल्पनाथ राय और एस.एस.अहलूवालिया जैसे नेता उन दिनों राजीव के हल्ला ब्रिगेड के नाम से मशहूर थे.

ये नेता विरोधियों को उसी शैली में चुप कराने की कोशिश करते थे, जिसे आजकल की भाषा में ट्रोलिंग कहा जाता है. बोफार्स की बदनामी के अलावा  विरोधियों के दमन की यह शैली भी राजीव गांधी के पतन की जिम्मेदार बनी थी.

उसके बाद देश में कोई ऐसी सरकार नहीं आई जिसके पास इतना संख्या बल हो कि वो निरकुंश हो सके. मोदी सरकार 1984 के बाद बनने वाली पहली ऐसी सरकार है, जिसके पास अपने दम पर पूर्ण बहुमत है.

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मोदी सरकार की परेशानी की वजह

मोदी एक ऐसे दौर में सत्ता में है, जब भारत में लोकतंत्र की जड़ें बहुत गहरी जम चुकी हैं. आपातकाल के सबक और अनगिनत मिली-जुली सरकारों के उदार दौर देख चुका देश अब राजनीतिक और संवैधानिक अधिकारों के मामले में कोई समझौता करने को तैयार नहीं है.

विपक्ष भले ही कमजोर और बंटा हुआ हो लेकिन वैचारिक प्रतिरोध की आवाजें देश के विश्वविद्यालयों से लगातार उठ रही हैं. 2019 में भी नरेंद्र मोदी का भविष्य बहुत हद तक नौजवान वोटर ही तय करेंगे.

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सरकार के लिए चिंता की असली वजह यही है. मोदी सरकार पिछली बहुत सी सरकारों से अलग इसलिए है क्योंकि उसका ज्यादा जोर अपनी बात कहने से कहीं ज्यादा दूसरों को बोलने से रोकने पर है.

संस्थानों को सुनियोजित तरीके से कमजोर करना कार्यशैली का एक दूसरा पहलू है. आरबीआई से लेकर सेंसर बोर्ड तक तमाम संस्थाएं आहिस्ता-आहिस्ता अपनी स्वायत्तता खोकर उस तरह की संस्थाएं बनते जा रहे हैं, जिनका अपना अवमूल्यन हुआ हो और जो स्वतंत्र रूप से काम नहीं कर पा रहे हों.

अलग आवाज़ को स्पेस देने के लिए सरकार किसी भी हालत में तैयार नहीं है. यूपी चुनाव के बाद एक तरह से 2019 की उल्टी गिनती शुरू हो जाएगी.

विपक्षी पार्टियों की कूव्वत शक के दायरे में है, लेकिन छात्रों और सिविल सोसाइटी के साथ सरकार का टकराव यकीनन बढ़ेगा.

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