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राजनीति का ‘मायाजाल': 32 साल तक वफादार रहने वाला बना 'भस्मासुर'

पहली बार मायावती को अपने ही भरोसेमंद सिपहसलार से खतरा है जो उनकी राजनीतिक कमजोरियों और दांवपेंचों को जानता है

Kinshuk Praval Kinshuk Praval Updated On: May 12, 2017 07:51 AM IST

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राजनीति का ‘मायाजाल': 32 साल तक वफादार रहने वाला बना 'भस्मासुर'

बीएसपी से बर्खास्त होने पर नसीमुद्दीन सिद्दीकी का गुबार फूटा तो बीएसपी में भूचाल आ गया. बगावत का बिगुल फूंकते हुए उन्होंने ऐलान कर दिया कि मायावती का ‘दी एंड’ हो गया है.

बीएसपी में कभी नंबर दो की हैसियत रखने वाले नसीमुद्दीन सिद्दीकी की लखनऊ में प्रेस कॉन्फ्रेंस के खुलासों में ड्रामा, एक्शन और इमोशंस सब दिखाई दिए. लेकिन उन्होंने जिस अंदाज़ में मायावती एंड पार्टी का पोल-खोल कार्यक्रम शुरू किया उसे देख कर कहा जा सकता है कि बीएसपी के भीतर 32 साल से एक भस्मासुर प्रतिशोध की आग में सुलग रहा था. उस भस्मासुर ने आखिरकार वही कर डाला जिसके डर से मायावती ने बाहर का रास्ता दिखाया था.

बेटे सहित पार्टी से बाहर निकाला

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नसीमुद्दीन के पुत्र अफजल सिद्दीकी

बीएसपी के इस कद्दावर नेता को बेटे अफजल समेत बुधवार को पार्टी से बाहर कर दिया गया था. साथ ही नसीमुद्दीन सिद्दीकी पर टिकट देने के बदले पैसा लेने, अनुशासनहीनता और पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल होने का आरोप भी चस्पा कर दिया गया था. यहां तक कि उन पर बेनामी प्रॉपर्टी होने और अवैध बूचड़खाने चलाने का भी आरोप लगाया गया.

बीएसपी जब भी अपने किसी पुराने वफादार को बाहर करती है तो ये जरूर बताती है निकाले जाने वाले के ‘दाग अच्छे नहीं थे’. पहले स्वामी प्रसाद मौर्य पर आरोप लगे थे और बाद में नसीमुद्दीन सिद्दीकी पर.

लेकिन नसीमुद्दीन सिद्दीकी के मामले में पार्टी से चूक हो गई. पार्टी ने जिस हल्के तरीके से इल्जामों के साए में सिद्दीकी को बर्खास्त किया तो सिद्दीकी का पलटवार मायावती के राजनीतिक करियर पर पूर्णविराम की तरह दिखाई दे रहा है.

इसकी वजह ये है कि कभी नसीमुद्दीन सिद्दीकी मायावती के बेहद करीबी हुआ करते थे. दोनों की राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं तकरीबन एक साथ ही आगे बढ़ी हैं. नसीमुद्दीन ने भी राजनीति का ककहरा बीएसपी के संस्थापक कांशीराम से सीखा.

रेलवे के कॉन्ट्रेक्टर के तौर पर शुरुआती दिनों में काम करने वाले नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने 1988 में राजनीति में दांव आजमाया था. बांदा नगर निगम के अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ा लेकिन हार गए थे. उसके बाद बीएसपी में शामिल हो गए.

1991 में विधायक का चुनाव जीते तो 1993 में राम लहर के चलते हार का सामना करना पड़ा. लेकिन नसीमुद्दीन की सियासत में चमक भी तभी आई जब मायावती का करियर चमका.

1995 में मायावती पहली दफे सीएम बनीं तो नसीमुद्दीन कैबिनेट मंत्री बने. पार्टी में उनकी न सिर्फ आला मुस्लिम चेहरे की हैसियत बनी बल्कि मायावती के बाद उनकी शख्सियत भी नंबर दो पर रही.

तब सतीश चंद्र मिश्रा पार्टी में नहीं आए थे

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गौर करने वाली बात ये है कि तब तक सतीश चंद्र मिश्र पार्टी में दूर-दूर तक नहीं थे. लेकिन आज नसीमुद्दीन अपने साथ हुए अंजाम के लिए सतीश चंद्र मिश्र को कोस रहे हैं.

नसीमुद्दीन सिद्दीकी की प्रेस कॉन्फ्रेंस की तैयारी से साफ है कि उन्हें बीएसपी से बाहर किए जाने का डर पहले से ही सता रहा था. वो जानते थे कि एक दिन उन्हें भी 'दलितों की देवी' के प्रकोप का सामना करना पड़ सकता है.

यही वजह रही कि वो बहनजी से अपनी हर बात का ऑफिशियल रिकॉर्ड तैयार करते रहे. उन्होंने कहा कि उनके पास डेढ़ सौ सीडी हैं जिसमें मायावती और पार्टी के महासचिव सतीश चंद्र मिश्र के खिलाफ सबूत ही सबूत हैं.

यहां तक कि उन्होंने दावा किया कि उनके पास वो सबूत भी हैं जिसमें मायावती ने किसी का मर्डर तक कराने की बात कही है. नसीमुद्दीन के सनसनीखेज आरोपों में मायावती पर पचास करोड़ रुपए की उगाही करने का आरोप है.

नसीमुद्दीन के हमलों से तिलमिलाई मायावती मीडिया के सामने आईं और पहली बार बिना पढ़े जवाब दिया. लेकिन यहां भी आरोप-प्रत्यारोप की कहानी दिल्ली में आम आदमी पार्टी के घमासान जैसी ही दिखाई दी.

कपिल मिश्रा ने जिस तरह से अरविंद केजरीवाल पर दो करोड़ की रिश्वत लेने का आरोप लगाया तो उसका जवाब दिल्ली सचिवालय में ईवीएम के जरिए दिया गया. यहां भी लगभग वैसा ही हुआ. मायावती ने एक बार फिर हार के लिए ईवीएम को जिम्मेदार ठहराया और बाद में नसीमुद्दीन सिद्दीकी को ब्लैकमेलर बताया.

सवाल ये है कि 32 साल से एक 'ब्लैकमेलर' बीएसपी में टिकट बंटवारे जैसे बड़े फैसले कैसे ले रहा था ?

बीएसपी के इतिहास में ऐसा पहली दफे हुआ है जबकि पार्टी में दूसरे नंबर की हैसियत के किसी नेता ने ऑडियो टेप के सबूतों के साथ मायावती को पैसों के मामले में घेरा है.  लेकिन साथ ही नसीमुद्दीन ने ताज कॉरिडोर घोटाले में खुद को मि.क्लीन बताकर बोतल से जिन्न भी बाहर निकाल दिया है.

फिर निकला ताज कॉरिडोर का जिन्न

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प्रतीकात्मक तस्वीर

उन्होंने ठंडे बस्ते में पड़े ताज कॉरिडोर और आय से अधिक उन मामलों को गरमा दिया जो मायावती के लिये डरावने सपने से कम नहीं. खासतौर से तब जबकि आय से अधिक मामले में तमिलनाडु की सीएम जयललिता तक को जेल जाना पड़ गया था.

नसीमुद्दीन सिद्दीकी जानते हैं कि ताज कॉरिडोर और आय से अधिक संपत्ति मामला आपस में किस हद तक जुड़े हुए हैं. ये मामले मायावती की कमजोर नस हैं. भले ही एक वक्त मायावती के सीएम बनने के बाद यूपी के तत्कालीन राज्यपाल टी वी राजेश्वर की वजह से ताज कॉरिडोर मामले में राहत मिल गई हो लेकिन अब यही मामला सुप्रीम कोर्ट में फिर अंगड़ाई लेने वाला है.

मायावती पर 1995 से 2003 के बीच आय से अधिक संपत्ति का मामला भी सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है. हाल ही में सुप्रीम कोर्ट आय से अधिक संपत्ति मामले पर सुनवाई करने को तैयार हो गया है.

वहीं दूसरी तरफ नोटबंदी के बाद उनके भाई आनंद कुमार के बैंक खातों की जांच में करोड़ों रुपए के लेनदेन सामने आया है. जहां ईडी और आईटी डिपार्टमेंट ने इसकी जांच की वहीं सीबीआई मुकदमा दर्ज करने की तैयारी में है.

मायावती के भाई आनंद कुमार के खिलाफ पहले भी अवैध ट्रांजेक्‍शन के आरोप लग चुके है. मायावती की सरकार के वक्त वो 50  कंपनियों के मालिक थे और उन्‍होंने 760 करोड़ रुपए का कैश लेनदेन किया था.

अब पहली बार मायावती को अपने ही भरोसेमंद सिपहसलार से खतरा है जो न सिर्फ उनकी राजनीतिक कमजोरियों और दांवपेंचों को जानता है बल्कि वो राज़ भी बेपर्दा कर सकता है जिन्होंने 'माया' का अंबार लगाया.

शह-मात का ये खेल सिर्फ आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं रह सकता है. क्योंकि यहां दो बातें गौर करने वाली हैं. पहली ये कि 'शिकारी खुद शिकार हो गया' यानी ये कि नसीमुद्दीन सिद्दीकी को पार्टी से बाहर निकालने का मामला उल्टा पड़ गया.

वहीं दूसरी बात ये कि बीएसपी को नेस्तनाबूत करने के लिये जिस मोहरे की किसी राजनीतिक दल को तलाश हो सकती है तो वो नसीमुद्दीन सिद्दीकी के रूप में सामने मौजूद है.

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