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...इसलिए वाजपेयी जैसी नहीं होगी मोदी की कहानी

मोदी और अमित शाह की अगुवाई में बीजेपी का पूरे देश में विस्तार है

Sreemoy Talukdar Updated On: Jul 29, 2017 09:47 AM IST

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...इसलिए वाजपेयी जैसी नहीं होगी मोदी की कहानी

हाल ही में सीनियर पत्रकार तवलीन सिंह ने अंग्रेजी अखबार द इंडियन एक्सप्रेस में अपने लेख में एक वाजिब सवाल उठाया. तवलीन सिंह ने कहा कि देश भर में बीजेपी के विस्तार, बदलते सियासी समीकरण के बीच बीजेपी नेता अक्सर दावा करते हैं कि 2019 के आम चुनाव में प्रधानमंत्री मोदी की जीत तय है. तवलीन सिंह के मुताबिक ये भरोसा गलत भी साबित हो सकता है.

तवलीन सिंह ने अपने लेख में अटल बिहारी वाजपेयी की मिसाल दी. उन्होंने लिखा कि, 'मैं जितनी बार भी बीजेपी की 2019 में जीत के यकीन के दावे सुनती हूं, मुझे साल 2004 की गर्मियों के दिन याद आ जाते हैं. उस वक्त अटल बिहारी वाजपेयी भी अजेय मालूम होते थे. नतीजे आने के ठीक पहले जब सीएनएन ने मुझसे पूछा कि क्या सोनिया गांधी के चौंकाने वाली वापसी की कोई उम्मीद है, तो मैंने बिना सोचे समझे इससे इनकार कर दिया था. और हम सब को मालूम है कि उसके बाद क्या हुआ.'

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तवलीन सिंह ने जो सवाल उठाया है वो बेहद दिलचस्प है. हम सब आज तक ये नहीं समझ पाए हैं कि 2004 में वाजपेयी चुनाव क्यों हारे थे. कुछ लोग कहते हैं कि एनडीए ने अपने कोर वोट बैंक की अनदेखी की थी इसलिए ऐसा हुआ. वहीं कुछ का ये कहना है कि वाजपेयी सरकार का 'इंडिया शाइनिंग' अभियान बुरी तरह नाकाम रहा था. वाजपेयी खुद पर भरोसे से लबरेज थे. पार्टी का अंदरूनी सर्वे भी जीत की तरफ इशारा कर रहा था. इसीलिए अटल बिहारी वाजपेयी ने वक्त से पहले चुनाव करा लिए थे.

इसमें कोई शक नहीं कि वाजपेयी की चौंकाने वाली हार ने भारत को दोबारा उसी समाजवादी दौर में लौटा दिया था, जिससे हम बड़ी मुश्किल से निकले थे. कांग्रेस की अगुवाई वाली सरकार के अगुवा वो मनमोहन सिंह थे, जिन्होंने देश में आर्थिक सुधारों की शुरुआत की थी. मनमोहन और सोनिया की जोड़ी ने समाजवादी राजनीति के कब्र में दफन जिन्नों को फिर से जिंदा किया. हालांकि कांग्रेस को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ी.

कांग्रेस की कमान एक ऐसे नेता के हाथ में है जो वंशवाद की उपज है

समाजवादी राजनीति का जो दौर सोनिया ने शुरू किया था, उसका असर आज मोदी की दक्षिणपंथी कही जाने वाली सरकार पर साफ देखा जा सकता है. आज मोदी की जुबान पर वही नारे और वही बातें हैं, जो कभी सोनिया-मनमोहन की अगुवाई वाली सरकार किया करती थी. प्रधानमंत्री के तौर पर मोदी ने गुजरात के मुख्यमंत्री मोदी की उस छवि को दफन कर दिया है, जो उन्हें कारोबार से दोस्ताना ताल्लुक वाली बनाती थी.

इन बातों से इतर बड़ा सवाल ये है कि क्या 2019 में मोदी का वही हाल होगा, जो 2004 में वाजपेयी का हुआ था? क्या अगले आम चुनाव में कांग्रेस वापसी कर सकती है? भले ही वो विपक्षी दलों के गठबंधन के तौर पर क्यों न हो. इस सवाल को तीन नजरिए से देखने की जरूरत है.

पहला तो ये कि क्या विपक्षी दल एकजुट रहकर खुद को मोदी के विकल्प के तौर पर पेश कर पाएंगे? दूसरी अहम बात है मोदी और अमित शाह की अगुवाई में बीजेपी का पूरे देश में विस्तार. तीसरी अहम बात है प्रधानमंत्री मोदी की जबरदस्त लोकप्रियता.

2004 से अब तक कांग्रेस बहुत बदल चुकी है. इसमें बीजेपी से भी ज्यादा बदलाव आया है. आज कांग्रेस की कमान एक ऐसे नेता के हाथ में है जो वंशवाद की उपज है, मगर वो चुनौतियों का सही ढंग से सामना करने में फिलहाल नाकाम रहा है.

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सोनिया गांधी बीमार हैं. वो पार्टी की कमान राहुल गांधी को सौंपने को राजी हैं. लेकिन राहुल गांधी ऐसे नेता हैं, जो कहीं से भी भरोसा नहीं जगाते. पार्टी के भीतर विरोध के सुर तेज होते जा रहे हैं. कांग्रेस की लोकप्रियता दिनों-दिन घटती जा रही है. आज राहुल गांधी की इमेज बेहद चंचल स्वभाव वाले नेता की है. किरदार की अस्थिरता किसी भी नेता की सबसे बड़ी कमजोरी होती है.

मिसाल के तौर पर राहुल गांधी इसी बुधवार को राजस्थान में किसानों को संबोधित कर रहे थे. उन्होंने मोदी सरकार की किसान विरोधी नीतियों पर जमकर प्रहार किया. आरोप लगाया कि सरकार संसद में किसानों पर चर्चा करने को राजी नहीं है. ये ठीक उसी दिन की बात है जब इसी मुद्दे पर विपक्ष के हंगामे के चलते सदन की कार्यवाही स्थगित करनी पड़ी थी.

सरकार विपक्ष के हर सवाल का जवाब देने को राजी थी. वो नियम 193 के तहत किसानों की समस्या पर चर्चा करना चाहती थी. लोकसभा अध्यक्ष ने कहा भी कि दोपहर बाद इस मुद्दे पर चर्चा होगी. लेकिन कांग्रेस, एनसीपी, टीएमसी, लेफ्ट, आरजेडी और नेशनल कांफ्रेंस के सांसदों ने सदन में हंगामा जारी रखा और आखिर में वाक आउट कर गए.

अब या तो कांग्रेस उपाध्यक्ष को सदन की गतिविधियों की खबर नहीं थी, या फिर वो इस बात को जानते हुए भी सरकार पर ऐसे आरोप लगा रहे थे, जिससे खुद उन पर सवाल उठे.

राहुल गांधी का बर्ताव कांग्रेस की घबराहट और बौखलाहट जाहिर करता है. संगठन के स्तर पर भी कांग्रेस में फैसला लेने को लेकर बहुत कनफ्यूजन है. कभी तो स्थानीय नेताओं को ताकतवर बनाने की बात होती है. और कभी केंद्रीय नेतृ्त्व फैसला ले सकने वाले नेताओं को ही किनारे लगा देता है.

विचारधारा के स्तर पर भी कांग्रेस, बीजेपी के राष्ट्रवाद का ठोस विकल्प पेश करने में नाकाम रही है. कांग्रेस के नेता जब भी मुंह खोलते हैं, वो हमेशा पार्टी को नीचा दिखाने का ही काम करते हैं. आज की तारीख में कांग्रेस की सबसे बड़ी चुनौती, सेक्यूलरिज्म शब्द की मर्यादा वापस दिलाने की है. आज धर्मनिरपेक्षता इतना बदनाम शब्द है कि कोई इसे नहीं याद करना चाहता.

यानी विपक्षी एकता के मोर्चे पर मोदी आज वाजपेयी के मुकाबले साफ तौर पर बेहतर हालत में हैं. वाजपेयी सरकार के वक्त मायावती और मुलायम सिंह यादव जैसे स्थानीय, जातिवादी राजनीति करने वाले नेता बेहद ताकतवर थे.

बीजेपी ने मायावती के वोट बैंक में तगड़ी सेंध लगाई है

दलित वोटों पर मायावती का एकाधिकार था. लेकिन आज की तारीख में खुद को प्रासंगिक बनाए रखने के लिए मायावती को इस्तीफे जैसी नौटंकी करनी पड़ रही है. ये बदले वक्त की ही गवाही है. मायावती का सियासी तौर पर कमजोर होना इस बात का संकेत है कि जातिवादी राजनीति का दौर बीत चुका है. वो ये बात समझने में नाकाम रही हैं.

आज जाति की पहचान के साथ-साथ लोग आर्थिक तरक्की के मौके भी चाहते हैं. बीजेपी ने अपनी सोशल इंजीनियरिंग और सियासी संदेशों से समाज के इस तबके को अपने पाले में कर लिया है. बीजेपी ने मायावती के वोट बैंक में तगड़ी सेंध लगाई है. आज दलितों के बीच भी बीजेपी की पैठ है. रामनाथ कोविंद के राष्ट्रपति बनने के बाद बीजेपी को और भी दलित वोट मिलने की उम्मीद है.

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वहीं दूसरी तरह मुलायम सिंह यादव हैं. मुलायम आज उसी पार्टी के बागी नेता हैं, जिसे कभी उन्होंने बनाया था. वहीं लालू यादव अपने भ्रष्टाचार की लपटों में परिवार समेत घिरते जा रहे हैं. विपक्ष के कद्दावर नेताओ में से एक नीतीश कुमार एक तरफ तो अपनी सरकार को बचाने की जुगत में जुटे हैं तो दूसरी तरफ वो अपनी साफ इमेज की लड़ाई लड़ रहे हैं.

ओडिशा में नवीन पटनायक उभरती बीजेपी की चुनौती झेल रहे हैं. वहीं दक्षिण में बीजेपी केरल में एक ताकत के तौर पर उभरी है. तमिलनाडु में भी पार्टी एआईएडीएमके में फूट डालकर राज करना चाह रही है. पूर्व में ममता बनर्जी को छोड़ दें तो आज की तारीख में कोई भी विपक्षी नेता तसल्लीबख्श हालत में नहीं है.

एक तरफ जहां विपक्ष राष्ट्रीय राजनीति में प्रासंगिक बने रहने की लड़ाई लड़ रहा है. वहीं, दूसरी तरफ बीजेपी आज देश की सबसे मजबूत पार्टी है. वो वाजपेयी-आडवाणी के दौर से बहुत आगे निकल गई है. कभी अमीरों और सवर्णों की पार्टी कही जाने वाली बीजेपी आज खुद को गरीबों की सबसे बड़ी हमदर्द कहती है.

लोगों के बीच लोकप्रियता बनाए रखने की मिसाल हैं मोदी

मोदी और अमित शाह को लगता है कि इससे उनकी पार्टी का दायरा बढ़ा है. ये आगे आने वाली चुनौतियों का सामना करने में मददगार होगा. मोदी और शाह लगातार बीजेपी के कोर वोट बैंक को नए सिरे से गढ़ने में जुटे हैं. बीजेपी के पक्के वोटर कहे जाने वाले कारोबारी आज शिकायत करते हैं कि पार्टी उन्हें भूल गई है. नोटबंदी और जीएसटी इसकी बड़ी वजह हैं. लेकिन कारोबारियों के पास भी बीजेपी के अलावा दूसरे विकल्प नहीं हैं.

जनता की भलाई, सुरक्षा, बुनियादी ढांचे का विकास, जनहित की नीतियां, योजनाओं को सही तरीके से लागू करना और बेहतर प्रशासन देना, किसी भी चुनाव में जीतने के लिए जरूरी हैं.

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लेकिन, काम करने के साथ ही अपनी बात को भी अच्छे से रखना जरूरी है. इस मोर्चे पर मोदी बिना शक अव्वल हैं. अपने दौर के नेताओं में मोदी के पास भाषण की सबसे अच्छी कला है. वो अच्छे रणनीतिकार हैं. नोटबंदी जैसा बड़ा झटका देने के बाद भी लोगों के बीच लोकप्रियता बनाए रखना इसकी मिसाल है.

शुरुआती संकेतों से साफ है कि जीएसटी को लेकर जो आशंकाएं जताई जा रही थीं वो भी शायद गलत ही साबित हों. मोदी ने सच को बाकी लोगों के मुकाबले अच्छे से जाना-समझा है. वो जनता से सीधे और लगातार संवाद करते हैं. उनकी बात सुनते हैं. अपनी बात कहते हैं. ऐसा करके मोदी को फौरन ही अपनी गलतियों का पता चल जाता है. वो उसे दुरुस्त कर लेते हैं.

मोदी सोशल मीडिया का बखूबी इस्तेमाल करते हैं

यही वजह है कि सरकार के तीसरे साल में भी 73 फीसदी लोग उन पर भरोसा करते हैं. इंडोनेशिया और स्विटजरलैंड के बाद भारत सरकार पर भरोसे के मामले में तीसरे नंबर पर है.

मोदी सोशल मीडिया का बखूबी इस्तेमाल करते हैं. हर महीने वो रेडियो पर मन की बात कार्यक्रम के जरिए जनता से सीधे बात करते हैं. वो अपने कार्यकाल में लगातार जनता के संपर्क में रहे हैं. वो दिन-रात वोटर से संवाद के तरीकों पर काम करते हैं. अपने मकसद को पूरा करने के लिए वो तकनीक का भी भरपूर इस्तेमाल करते हैं.

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प्रधानमंत्री के मन की बात कार्यक्रम पर आधारित किताब के लोकार्पण के मौके पर वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा कि, 'सिर्फ आधा दर्जन टीवी पत्रकारों को इंटरव्यू देना, या विज्ञान भवन में सालाना प्रेस कांफ्रेंस करना ही लोगों से संवाद करना नहीं होता.

क्या आपके अंदर वो काबिलियत है कि आप आधा दर्जन टीवी पत्रकारों को दरकिनार करें और लोगों से सीधे बात करें? मुझे लगता है कि गुजरात में जनता से सीधे बात करने का मोदी का तजुर्बा यहां काम आ रहा है. वो इसे ही यहां दोहरा रहे हैं. वो मीडिया के जरिए नहीं, जनता से सीधे संवाद करते हैं. मोदी ने उन लोगों को अपने और जनता के बीच से हटा दिया है, जो खुद को संवाद का ठेकेदार समझते थे'.

यही वजह है कि मोदी के इंकिलाबी विचारों को जनता हाथों-हाथ लेती है. उनकी गलतियों को बार-बार माफ करती है. इसीलिए जनता, विपक्षी नेताओ के मुकाबले मोदी को ज्यादा मौके देने को राजी है. विपक्ष के पास इसका कोई तोड़ नहीं.

यूं तो राजनीति में कोई भविष्यवाणी करना बेहद जोखिम भरा होता है. आप अक्सर गलत साबित होते हैं. लेकिन इन बातों पर गौर करें तो लगता है कि 2019 का चुनाव मोदी जीत लेंगे.

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