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दलित या आदिवासी समाज से हो सकते हैं भारत के अगले राष्ट्रपति-उपराष्ट्रपति!

असल मकसद 2019 का लोकसभा चुनाव है, जिसमें यह रणनीति बीजेपी के आधार को विस्तार देगी

Sunil Raman | Published On: Jun 15, 2017 06:11 PM IST | Updated On: Jun 15, 2017 06:51 PM IST

दलित या आदिवासी समाज से हो सकते हैं भारत के अगले राष्ट्रपति-उपराष्ट्रपति!

दलित और आदिवासी हो सकते हैं भारत के अगले राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति, बीजेपी ने विपक्ष की मांग ठुकराई

विपक्षी पार्टियों को पता है कि उनके पास जिताऊ मतदाता संख्या न होने के कारण उनकी पसंद का राष्ट्रपति नहीं चुना जा सकता. ऐसी स्थिति में अब ये साफ हो चला है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जुलाई में भारत के नए राष्ट्रपति और उप-राष्ट्रपति पद के लिए इतिहास रचने का फैसला कर लिया है. वह इन पदों के लिए दलित-आदिवासी दोनों उम्मीदवार लाने वाले हैं.

आम सहमति वाले उम्मीदवार के नाम पर राजी नहीं

फ़र्स्टपोस्ट ने इस संबंध में जिन उच्च राजनीतिक सूत्रों से बात की है, उनके मुताबिक मोदी, एनडीए और विपक्ष, दोनों की आम सहमति वाले किसी उम्मीदवार के नाम पर इसलिए राजी नहीं होंगे. क्योंकि यह पहला मौका है जब मतदाताओं की संख्या के लिहाज से बीजेपी के नेतृत्व वाली सरकार के पास इतना बहुमत है कि वह इन दोनों उच्च पदों पर किसी दक्षिणपंथी उम्मीदवार को बिठा सके.

2015 से पहले तक, जब मोदी ने ओडिशा की आदिवासी नेता द्रौपदी मुर्मू को झारखंड का गवर्नर नियुक्त किया था, उससे पहले देश में किसी आदिवासी महिला ने राज्यपाल का पद नहीं हासिल किया था. राष्ट्रपति और उप-राष्ट्रपति के पदों पर दलित और आदिवासी को बिठा कर प्रधानमंत्री मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह की रणनीति एक साथ कई मकसद साधने की है.

Draupadi Murmu-Kariya Munda

झारखंड की राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू के साथ करिया मुंडा (फोटो: फेसबुक से साभार)

पहला मकसद है कि राष्ट्रपति और उप-राष्ट्रपति राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का हो. दूसरा, बीजेपी इन दोनों उच्च पदों के लिए पहली बार दलित नेता और आदिवासी नेता लाकर इतिहास बनाना चाहती है ताकि दलितों और आदिवासियों तक अपनी पैठ को पुख्ता कर सके. इस तरह, उन्हें विपक्षी दलों को दलित और आदिवासी विरोधी दलों के रूप में पेश करने का भी मौका मिल जाएगा. इसका मकसद दरअसल 2019 का लोकसभा चुनाव है, जिसमें यह रणनीति बीजेपी के आधार को विस्तार देगी.

उत्तर प्रदेश का चुनाव जीतने के बाद एनडीए सरकार ने अपने मतदाताओं का आधार मजबूत किया है. बीजेपी आज देश के 29 में से 12 राज्यों में अपने दम पर सत्ता में है. जबकि जम्मू -कश्मीर और आंध्र प्रदेश में वह सत्ता के गठबंधन में सहयोगी है. पिछले कुछ महीनों में मोदी ने अपनी पसंद के उम्मीदवार के लिए छोटी पार्टियों, जैसे आंध्र प्रदेश में वाईएसआर कांग्रेस और तमिलनाडु में एआईएडीएमके गुट के साथ वोटर बेस को विस्तार देने में सफलता हासिल की है.

करिया मुंडा और थावर सिंह गहलोत पर लगाएंगे दांव

आखिरी समय में कोई अड़चन न आई तो राष्ट्रपति और उप-राष्ट्रपति पद के लिए एनडीए नेतृत्व वाले गठबंधन के दो मजबूत उम्मीदवार करिया मुंडा और थावर सिंह गहलोत हो सकते हैं. करिया मुंडा झारखंड के आदिवासी नेता हैं जो पूर्व में डिप्टी स्पीकर रह चुके हैं. वह सादगी पसंद जीवनशैली और कट्टर आरएसएस विचारधारा के लिए जाने जाते हैं.

थावर सिंह गहलोत मध्य प्रदेश के दलित नेता हैं और मोदी कैबिनेट में सामाजिक न्याय मंत्री हैं. एक सूत्र के मुताबिक उप-राष्ट्रपति पद के लिए गहलोत के नाम पर मुहर लग चुकी है. लेकिन राष्ट्रपति पद के लिए अभी मोदी को अंतिम फैसला लेना बाकी है.

Thavarchand Gehlot

सर्वोच्च पद के लिए केंद्रीय मंत्री थावरचंद गहलोत का भी नाम चर्चाओं में है

पिछले कई हफ्तों से झारखंड की राज्यपाल और बीजेपी की आदिवासी नेता द्रौपदी मुर्मू का नाम चर्चाओं में था. लेकिन आरएसएस से अपने दशकों पुराने जुड़ाव और भविष्य को देखते हुए अगले राष्ट्रपति के रूप में करिया मुंडा की उम्मीदवारी ज्यादा मजबूत साबित हुई है. मुंडा की सादगी भरे जीवनशैली की तब बहुत चर्चा हुई थी जब वह डिप्टी स्पीकर चुने गए थे. आज भी वह झारखंड के खूंटी के एक गांव में कच्चे मकान में ही रहते हैं. 80 साल से ऊपर के मुंडा आरएसएस से आते हैं, जबकि मुर्मू सीधे बीजेपी में शामिल हुईं.

संकेत दिया एनडीए के पास 'जनादेश' है

शुक्रवार को बीजेपी नेता विपक्षी नेताओं से मिलेंगे. मुलाकातों के इस दौर की शुरुआत कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से होगी. अपनी मतदाता संख्या की मजबूती को देखते हुए बीजेपी प्रणब मुखर्जी के उत्तराधिकारी के नाम पर कोई उदारता या लचीलापन दिखाएगी, ऐसा नहीं लगता. बुधवार को केंद्रीय मंत्री वेंकैया नायडू ने मीडिया से बात करते हुए ये कह कर इसका साफ संकेत भी दे दिया है कि एनडीए के पास ‘जनादेश’ है.

विपक्ष इस पर जो कहे, शिकायत करें या मोदी सरकार के सीधे इनकार के खिलाफ विरोध जताएं, लेकिन मोदी सरकार उन्हें असंतुष्ट छोड़ कर इस मौके को ऐतिहासिक बनाने का अवसर नहीं गंवाएगी. नरेंद्र मोदी-अमित शाह की जोड़ी इतिहास रचने की ठान चुकी है.

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