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टॉलस्टॉय से सीखे मोदी सरकार : युद्ध से नहीं, कूटनीति से चीन से निपटे भारत

तनाव के मौजूदा माहौल के बावजूद परमाणु शक्ति संपन्न दोनों ही देश सैन्य संघर्ष का खतरा नहीं उठा सकते

Sandipan Sharma Updated On: Aug 05, 2017 05:49 PM IST

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टॉलस्टॉय से सीखे मोदी सरकार : युद्ध से नहीं, कूटनीति से चीन से निपटे भारत

लियो टॉल्सटॉय मानते थे कि दो सबसे बड़े योद्धा धैर्य और समय हैं. इसलिए चीन से मौजूदा विवाद को लेकर भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज द्वारा युद्ध का विकल्प खारिज करना और कूटनीति की बात करना भरोसा बढ़ाने वाला है.

टोल्सटॉय की बातों की तरह कूटनीति भी धैर्य और समय दोनों की मांग करती है. इन दोनों से जो हासिल किया जा सकता है वो सैन्य संघर्ष से बहुत अधिक है. सुषमा ने संसद में कहा कि 'युद्ध किसी समस्या का समाधान नहीं हो सकता. युद्ध के बाद भी हमें समाधान खोजने के लिए बातचीत करनी होगी. बुद्धिमत्ता का तकाजा यह है कि विवाद का कूटनीतिक हल निकालो.' साफ है कि वो धैर्य की वकालत कर रही थीं और आक्रामक भाषा से बच रही थीं.

भारत-चीन सैन्य संघर्ष का खतरा नहीं उठा सकते

भारत और चीन एक-दूसरे के सामने डटकर खड़ा होने और मीडिया में युद्ध के लिए उकसाने वाला माहौल बनने के बावजूद सैन्य संघर्ष का खतरा नहीं उठा सकते. सामान्य नियम के तहत परमाणु हथियारों के बड़े जखीरों से लैस दोनों देशों के बीच सैन्य संघर्ष लगभग असंभव है. परमाणु हथियार विकसित करने वाले देशों का मानना है कि इन्हें रखने का मकसद युद्ध को टालना है. इस आधार पर भारत और चीन के बीच युद्ध की आशंका खुद-ब-खुद कम हो जाती है.

युद्ध के विकल्प के खिलाफ स्वराज की दलीलें भी दमदार हैं. उन्होंने संसद से कहा कि चीन ने भारत में 160 अरब डॉलर का निवेश कर रखा है. इसलिए हम अपने पड़ोसी को सैन्य शक्ति से नहीं, आर्थिक सुपरपावर बनकर जीतना चाहते हैं. दोनों देशों का काफी कुछ दांव पर लगा है, इसलिए युद्ध की बात करना बेमानी है. इसके अलावा कुछ अघोषित कारण भी हैं. राजनेता तब तक युद्ध में नहीं जा सकते जब तक इसका फायदा चुनाव में न मिले और लोकप्रियता नहीं बढ़े.

SushmaSwaraj

सुषमा स्वराज ने संसद में चीन के साथ जारी सीमा विवाद पर भारत का रूख साफ किया

परमाणु हथियारों के बावजूद पाकिस्तान को बड़ा दुश्मन नहीं माना जाता क्योंकि युद्ध में उसकी हार लगभग तय है. लेकिन भारत जानता है कि चीन के साथ संघर्ष दोनों देशों की अर्थव्यवस्था और भूभाग को बड़ी क्षति पहुंचाएगा. चुनाव कुछ ही महीने दूर हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ऐसे संघर्ष का जोखिम नहीं उठा सकते, जिससे उनकी लोकप्रियता घटे और बजट के साथ देश के हौसले पर पड़ने वाले असर के चलते जन-आक्रोश बढ़े.

सुषमा स्वराज ने भारत के दीर्घकालिक उद्देश्यों को स्पष्टता से सामने रखा. भारत चीन के साथ बेहतर द्विपक्षीय रिश्ते चाहता है. डोकलाम के साथ पूरे सीमा विवाद का खात्मा और क्षेत्र में शांति भारत का मकसद है. साथ ही भूटान के साथ भारत पारंपरिक मित्रता बनाए रखना चाहता है.

पाकिस्तान चीन के प्रांत की तरह लगने लगा है

भारत के दूसरे पड़ोसी ड्रैगन के प्रभाव में आ रहे हैं. पाकिस्तान चीन के किसी प्रांत की तरह लगने लगा है. भारत को यह सुनिश्चित करने की आवश्यकता है कि उसका पारंपरिक मित्र भूटान किसी भी भारतीय कार्रवाई में कमजोरी का संकेत न देखे. उसे यह न लगे कि भूटान की सुरक्षा संबंधी चिंताओं का सामना भारत दिलेरी के साथ नहीं कर रहा है. अगर ऐसा होता है तो चीन क्षेत्र में प्रभुत्व जमाने लगेगा. भारतीय कमजोरी का कोई भी संकेत क्षेत्र के देशों को यह सोचने पर मजबूर कर देगा कि नई दिल्ली में चीन से निपटने के लिए राजनयिक, सैन्य और वित्तीय ताकत नहीं है.

अपनी सीमाओं और उद्देश्यों पर विचार करते हुए धैर्य और समय ही भारत के अकेले योद्धा हैं. लेकिन यह विश्वास करना तर्कहीन होगा कि चीन अपने हितों को ध्यान में रखकर भारत को उसकी समय सीमा के हिसाब से डोकलाम में खेल खेलने देगा. सुषमा के बयान के जवाब में चीन ने कहा कि अगर भारत शांति चाहता है तो उसे डोकलाम से अपनी सेना हटानी होगी. इससे पता चलता है कि बीजिंग के पास धैर्य की कमी है या फिर वो ऐसा दिखाना चाहता है.

India-China

भारत और चीन दोनों ही एक-दूसरे पर सिक्किम सीमा पर तनाव बढ़ाने का आरोप लगा रहे हैं

शुक्रवार को चीन के रक्षा मंत्रालय के प्रवक्ता ने फिर चेतावनी दी. प्रवक्ता ने कहा कि सद्भावना चीन की सेना का सिद्धांत है लेकिन उसके संयम का एक निचला स्तर भी है. उसने भारत से कहा कि 'वो टालमटोल वाला रवैया छोड़े क्योंकि कोई भी देश शांति की रक्षा और राष्ट्रीय संप्रभुता, सुरक्षा और विकासात्मक हितों के लिए चीन की सेना के आत्मविश्वास और क्षमताओं को कम करके नहीं आंक सकता.'

भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती कूटनीति पर भरोसा- युद्ध के उन्माद को बढ़ावा नहीं देने- और चीन के भड़काऊ बयानों के बीच संतुलन साधने का है. इस स्थिति में भारत के पास क्या विकल्प हैं?

भारत की जगह भूटान डोकलाम में अपनी सेना तैनात कर दे

द इंडियन एक्सप्रेस में दो विकल्पों के बारे में विस्तार से बताया गया है. एक तो यह कि भूटान से कहा जाए कि वो भारत की जगह डोकलाम ट्राई-जंक्शन में अपनी सेना तैनात कर दे. इससे बिना देरी के भारतीय सेनाओं को हटाने की चीन की मांग कुछ हद तक पूरी हो जाएगी. लेकिन जानकारों ने द इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि रणनीति के तहत पीछे हटने से भूटान के पास सिर्फ यही विकल्प बचेगा कि वो चीन से सीधे बात करे. यह संभावना भारत के लिए असुविधाजनक है. दूसरा विकल्प नवंबर तक इंतजार करने का है. नवंबर में चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की नेशनल कांग्रेस होगी. इसमें उसके नेता को फिर से चुना जाएगा. जब घेरलू राजनीति समीकरणों से बाहर हो जाएगी, तब दोनों देश शांति से समस्या का कूटनीतिक हल निकाल सकते हैं.

Indian army soldiers are seen after snowfall at India-China trade route at Nathu-La

डोकलाम में भारत और चीन की सेनाएं लगभग दो महीने से अधिक समय से तैनात हैं

समय का इंतजार भारत की घरेलू बाध्यतों को भी पूरा करता है. अगले कुछ महीनों में गुजरात में विधानसभा के चुनाव होने हैं. मजबूत रणनीतिक हावभाव के बावजूद भारत विवाद को बढ़ाने से बचेगा. इससे बीजेपी अपनी राष्ट्रवादी अपील को बनाए रख सकेगी. चुनाव खत्म होने के बाद मोदी और उनकी टीम चीन से बात कर सकती है. तब वो बिना चिंतित हुए चीन को कुछ छूट भी दे सकते हैं जिससे विवाद सुलझ जाए और सैन्य संघर्ष से बचा जा सके.

टॉलस्टॉय फिर एक बार सही साबित हो सकते हैं.

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