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मोदी सरकार के 3 साल: रोजगार के मोर्चे पर मोदी नॉन परफार्मिंग एसेट

प्रधानमंत्री मोदी सालाना एक करोड़ रोजगार देने के वायदे को पूरा करने में अब तक पूरी तरह नाकाम रहे हैं

Rajesh Raparia Rajesh Raparia | Published On: May 26, 2017 08:22 AM IST | Updated On: May 26, 2017 12:01 PM IST

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मोदी सरकार के 3 साल: रोजगार के मोर्चे पर मोदी नॉन परफार्मिंग एसेट

मोदी सरकार को सत्ता में आए तीन साल पूरे हो गए हैं और जीत की तीसरी सालगिरह का जश्न शुरू हो चुका है.

26 मई 2017 को देश के तकरीबन 400 अखबारों में पहले पेज विज्ञापन दिया गया है, जो मोदी सरकार के तीन साल की उपलब्धियों से अटा है.

केंद्र सरकार का हर मंत्रालय अपनी बेमिसाल उपलब्धियों के बखान के लिए एक पुस्तिका भी जारी करेगा, जिसमें मोदी काल को यूपीए काल से बेहतर ठहराने की हर संभव कवायद होगी.

टीवी पर रेडियो पर विज्ञापनों की भरमार होगी. इस जश्न को 'मोदी फेस्ट' का नाम दिया गया है जो देश के तकरीबन हर छोटे-बड़े शहर में मनाया जाएगा.

इस फेस्ट की शुरुआत प्रधानमंत्री मोदी 26 मई को असम से करेंगे. 20 दिन चलने वाले इस फेस्ट में मोदी सरकार के तमाम मंत्री, भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्री और उनके मंत्री, पार्टी के छोटे-बड़े पदाधिकारी ब्रांड मोदी को अजर-अमर बनाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ेंगे.

पर कम होते रोजगार अवसरों और छटनी की खबरों से इस फेस्ट पर ग्रहण सा लग गया है. प्रधानमंत्री मोदी सालाना एक करोड़ रोजगार देने के वायदे को पूरा करने में अब तक पूरी तरह नाकाम रहे हैं.

रोजगार सृजन आठ साल के न्यूनतम स्तर पर

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देश में रोजगार की दशा और दिशा पर केंद्र सरकार के श्रम मंत्रालय का श्रम ब्यूरो हर तिमाही में सर्वे कर आंकड़े जारी करता है. पिछली कई तिमाहियों में यह आंकड़े बताते हैं कि मोदी सरकार की तमाम कोशिशों के बावजूद देश में रोजगार सृजन लगातार कम हो रहा है.

श्रम ब्यूरो के ताजा सर्वे के अनुसार वर्ष 2015 और 2016 में 1.55 और 2.13 लाख नए रोजगार सृजित हुए जो पिछले आठ का सबसे निचला स्तर है.

मनमोहन सिंह काल के आखिरी सबसे खराब दो सालों यानी 2012 और 2013 में कुल 7.41 लाख नए रोजगार सृजित हुए पर मोदी राज के दो सालों 2015 और 16 में कुल 3.86 लाख रोजगार सृजित हुए हैं. यानी 2.55 लाख रोजगार कम.

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यूपीए-2 के शुरू के दो साल यानी 2009 और 2010 में 10.06 और 8.65 लाख नए रोजगार सृजित हुए थे. यदि इसकी तुलना 2015 और 2016 से की जाए तो मोदी राज के इन दो सालों में तकरीबन 74 फीसदी रोजगार के अवसर कम हो गए हैं.

श्रम मंत्रालय का श्रम ब्यूरो ने यह तिमाही सर्वे 2008-09 के वैश्विक संकट के बाद रोजगार पर पड़े प्रभाव के आकलन के लिए 2009 से शुरू किया था.

मोदी सरकार ने इस सर्वे में कई बदलाव किए हैं और सर्वे में शामिल प्रतिष्ठानों की संख्या 10 हजार कर दी है जो पहले तकरीबन दो हजार थे. इस सर्वे में देश के समस्त राज्यों को  शामिल किया गया जो पहले 11 राज्यों तक सीमित था.

पहले इस श्रम सर्वे में यानी 2015 तक आठ सेक्टर शामिल थे-कपड़ा, चमड़ा, ऑटोबोइल्स, रत्न और आभूषण, ट्रांसपोर्ट, आईटी/बीपीओ, हैंडलूम,पॉवरलूम.

2016 में कुछ और सर्विस सेक्टर शामिल किए गये. अब इसमें यह आठ सेक्टर हैं- मैन्यूफैक्चरिंग, कंस्ट्रक्शन, व्यापार, ट्रांसपोर्ट, होटल और रेस्त्रां, आईटी/बीपीओ, शिक्षा और स्वास्थ्य. यूपीए काल में कंस्ट्रक्शन में रिकॉर्ड रोजगार के अवसर पैदा हुए थे, पर तब यह सेक्टर श्रम सर्वे में शामिल नहीं था.

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मनरेगा आपकी विफलताओं का जीता जागता स्मारक है

भाजपा के प्रधानमंत्री पद के दावेदार के रूप में लोकसभा चुनाव अभियान के दौरान 22 नंवबर 2013 को आगरा चुनाव रैली में नरेंद्र मोदी ने युवाओं से सालाना एक करोड़ नए रोजगार देने का वायदा किया था.

बीजेपी ने अपने लोकसभा चुनाव घोषणा पत्र में मनमोहन सिंह सरकार के दस साल के विकास को जॉबलेस ग्रोथ (रोजगार विहीन ग्रोथ) बताया था और श्रम मूलक मैन्यूफैक्चरिंग और उद्यमिता को बढ़ावा देकर रोजगार के अकाल को खत्म करने का वादा किया था.

लोकसभा चुनाव में प्रंचड बहुमत मिलने के तकरीबन नौ महीने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फरवरी 2015 में कांग्रेस की रोजगार क्षेत्र की विफलताओं पर आक्रामक अंदाज में यादगार वक्तव्य दिया.

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राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा का जवाब देते हुए उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि मनरेगा आपकी विफलता का जीता-जागता स्मारक है और मैं पूरे गाजे-बाजे के साथ इसका ढोल पीटता रहूंगा और कहूंगा कि देश की आजादी के 60 साल बाद अपने लोगों को गड्ढे खोदने और भरने के काम में लगाया. इसलिए मनरेगा आन-बान-शान से रहेगा और गाजे-बाजे के साथ दुनिया को बताया जायेगा. लोगों को पता तो चले कि ऐसे खंडहर कौन खड़े करके गया है.

अब उनके बाण उनका प्रेत की तरह पीछ कर रहे हैं और श्रम ब्यूरो के आंकड़े उनका ढोल पीट रहे हैं.

कोशिशें हुईं नाकाम

मोदी सरकार ने सत्ता पर काबिज होते ही रोजगार बढ़ाने के लिए बड़े तामझाम के साथ अनेक घोषणाएं कीं जिनसे युवाओं में रोजगार पाने की उम्मीद जगना स्वाभाविक थी. इनमें  'मेक इन इंडिया' से सरकार को ही नहीं, युवाओं को भी नौकरियों की बड़ी उम्मीद थी.

इसके लिए अनेक क्षेत्रों में विदेशी निवेश के लिए खोला गया, उनमें विदेशी निवेश की सीमा भी बढ़ायी गयी. पर जमीन पर मेक इन इंडिया नॉन स्टार्टर ही रही. स्टार्ट अप इंडिया से काफी उम्मीदें बनी थीं.

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मोदी सरकार ने इसके लिए 10 हजार करोड़ का भारी भरकम फंड भी मुहैया कराया. बताया गया कि इससे दस साल में 18 लाख रोजगार पैदा होंगे यानी 1.8 लाख सालाना.

बिजनेस अखबार 'मिंट' की जनवरी 2017 में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार इस फंड में से एक धेला भी वितरित नहीं हो पाया है. सरकार के पास दिसंबर 2016 तक 1368 आवेदन आए, जिनमें 502 को स्टार्ट अप के योग्य माना गया. इनमें से 111 को टैक्स राहत के लिए योग्य माना गया. पर अंत में यह टैक्स लाभ केवल 8 स्टार्ट अप को प्रदान किये गए.

स्टैंड अप इंडिया में अनुसूचित जाति, जनजातियों और महिलाओं में उद्यमिता के माध्यम से रोजगार बढ़ाने की मुहिम थी. इससे एक करोड़ रुपए तक कर्ज की सुविधा थी. लक्ष्य था कि कम से कम राष्ट्रीयकृत बैंकों की हर शाखा ऐसा एक कर्ज अवश्य बांटेगी.

लेकिन जमीन पर इसका भी कोई असर नहीं दिखाई देता है है. स्किल इंडिया भी रोजगार मूलक योजना है जिसमें 2022 तक 40 करोड़ युवाओं को ट्रेनिंग देने का लक्ष्य है. पर यह योजना भी अपने लक्ष्य से काफी पीछे है. इस योजना के कितने प्रशिक्षित युवाओं को रोजगार मिला, यह बताने में मोदी सरकार के मंत्री कतराते हैं. सरकार की यह तमाम कोशिशें अब तक खंडहर ही साबित हुई हैं.

अशांति और हताशा का खतरा

रोजगार के हालात पर कोई राजनीतिक दल बयान देता है, तो उसे राजनीति कह कर खारिज कर दिया  जाता है. पर देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद आसीन राष्टपति प्रणब मुखर्जी रोजगार के हालात पर आगाह करें, तो उसे नकारना किसी के लिए मुश्किल हो जाता है.

नवंबर 2016 में शैक्षणिक संस्थानों के प्रमुखों के एक सम्मेलन को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति ने कहा कि नौकरियां पैदा करने के आंकड़े पिछले सात वर्षों के सबसे निचले स्तर पर हैं. नौकरियों के कम अवसर देश में त्रासदी पैदा कर सकते हैं. उन्होंने कहा कि युवाओं की नाराजगी और परेशानी अशांति और उथल पुथल के रूप में सामने आती है.

साल 2015 में नई नौकरियां का आंकड़ा 1.35 लाख था जो पिछले सात वर्षों में सबसे कम है. एक अन्य अवसर पर राष्ट्रपति ने कहा कि दुनिया की दूसरे सबसे आबादी वाले देश में रोजगार की कमी से आनेवाले सालों में बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा.

देश में आधी आबादी की उम्र 25 साल से कम है. देश रोजगार उपलब्ध कराने में असमर्थ रहता है तो इससे अशांति और हताशा फैलेगी. समाजशास्त्री भी कहते हैं कि पटेल, जाट और मराठा आंदोलन युवाओं में रोजगार संकट से उपजे आक्रोश का ही नतीजा है.

तमिलनाडु में जल्लीकटटू पर युवाओं ने जो बवाल किया, वह बेरोजगार या अल्प रोजगार वाले युवाओं के आक्रोश का ही विस्फोट है.

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अब छंटनी की तलवार

घटते रोजगार अवसरों और अब छंटनी की खबरों से दहशत है. ऑटोमेशन और अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की संरक्षणवादी नीतियों से आईटी सेक्टर में छंटनी का आसन्न खतरा पैदा हो गया है, जो मोदी सरकार के लिए अच्छी खबर नहीं है.

रोजगार कारोबार से जुड़ी विख्यात कंपनी हेड हंटर्स के मुताबिक आने वाले तीन सालों में आईटी सेक्टर में सालाना 1.75 लाख से दो लाख लोग रोजगार खो सकते हैं.

मैकंजी एंड कंपनी ने नॉसकॉम इंडिया लीडरशिप फोरम को 17फरवरी 2017 को एक रिर्पोट सौंपी हैं. इसके अनुसार आईटी सेक्टर में तकरीबन आधे से ज्यादा श्रम बल अपनी उपयोगिता खो देगा. अभी इस सेक्टर में 39 लाख लोग काम करते हैं.

इस रिपोर्ट के अनुसार दोबारा ट्रेनिंग के बाद ही मौजूदा श्रम बल का 30-40 फीसदी श्रम बल बाजार में टिक पायेगा. विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार ऑटोमेशन में भारत के 69 फीसदी रोजगार के समक्ष छंटनी का खतरा बना हुआ है. राष्ट्रपति भी कह चुके हैं कि मशीनीकरण से रोजगार अवसर कम हो रहे हैं.

प्रधानमंत्री मोदी भी रोजगार के बिगड़ते हालत से बैचेन हैं. उन्होंने निर्देश दिए हैं कि जो भी प्रस्ताव कैबिनेट को भेजा जाए, उससे कितने रोजगार पैदा होंगे, इसका उल्लेख अवश्य होना चाहिए.

इसकी पुष्टि वाणिज्य मंत्री निर्मला सीतारमण और नीति आयोग ने भी की है. पर यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि मोदी सरकार का राजस्व बढ़ा है, व्यय बढ़ा है, डीबीटी (प्रत्यक्ष लाभ ट्रांसफर) से सरकार ने 50 हजार करोड़ रुपए सालाना बचत का दावा किया है.

सार्वजनिक निवेश में खासी बढ़ोतरी हुई है. विदेश निवेश में ऐतिहासिक वृद्धि हुई है. फिर रोजगार कहां गये. यह सवाल मोदी सरकार को स्वयं से पूछना चाहिए तभी रोजगार बढ़ने की राहें आसान होंगी.

केवल केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी, रविशंकर प्रसाद, गडकरी या श्रम मंत्री के वक्तव्यों से लाखों-करोड़ों रोजगार अवसर पैदा नहीं होंगे. आज की तारीख में मोदी सरकार अपनी उपलब्धियों के लाख कसीदें पढ़ ले पर रोजगार के मोर्चे पर प्रधानमंत्री मोदी नॉन परफार्मिंग एसेट ही साबित हुए हैं.

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