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एमसीडी चुनाव: जनता ने केजरीवाल पर गुस्सा निकाला है, इतराए नहीं बीजेपी

ऐसा लगता है कि जैसे ही केजरीवाल अप्रासंगिक होंगे ‘आप’ का सूरज भी ढल जाएगा.

Sreemoy Talukdar | Published On: Apr 28, 2017 09:29 AM IST | Updated On: Apr 28, 2017 09:29 AM IST

एमसीडी चुनाव: जनता ने केजरीवाल पर गुस्सा निकाला है, इतराए नहीं बीजेपी

बीजेपी और मीडिया विश्लेषक दिल्ली के नगर निगम चुनाव नतीजों को प्रधानमंत्री का करिश्मा और यहां तक कि ‘मोदी लहर’ के रूप में पेश कर रहे हैं. लेकिन, सच तो ये है कि यह किसी के लिए सकारात्मक मतदान होने के बजाए अरविंद केजरीवाल के लिए नकारात्मक मतदान है.

बीजेपी ने यूपी में बिना मुख्यमंत्री उम्मीदवार के मतदाताओं को मोदी के लिए वोट करने को कहा और चौंकाने वाली जीत हासिल की. इसलिए स्थानीय या राष्ट्रीय स्तर की हर जीत को उस इंसान के चरणों में सुपुर्द कर दिया जाना स्वाभाविक है, जिनका कद अब पार्टी से भी बड़ा हो चुका है.

हालांकि यह कहना मुश्किल है कि मोदी खुद इस जीत का श्रेय लेना चाहेंगे कि नहीं, जो केजरीवाल को लेकर अपना धैर्य खोने के बाद दिल्ली की जनता ने अपनी प्रतिक्रिया में मतदान के जरिए फैसला सुनाया है.

नतीजों के बाद बचकाना था 'आप' का रवैया

मतगणना के तीन घंटे में ही बीजेपी सभी निगमों की 272 में से 181 सीटों पर आगे हो गई, जबकि आप और कांग्रेस इससे बहुत दूर दूसरे और तीसरे नंबर पर खड़ी दिखी. जैसे ही रुझान साफ हो गए, आम आदमी पार्टी के नेता एक के बाद एक गलती करते चले गए और इल्जाम ईवीएम पर डाल दिया. उनका तर्क था कि यह बात विश्वास करने लायक नहीं है कि जो पार्टी दिल्ली की सड़कों पर एक दशक तक झाड़ू नहीं लगा सकी हो, वह नगर निगम चुनाव में ‘झाड़ूनुमा नतीजे’ हासिल करे.

अरविंद केजरीवाल के सलाहकार नागेंद्र शर्मा ने ईवीएम पर इल्जाम लगाया. उन्होंने कहा, 'जब मशीनें आपके साथ हों तो इंसान की प्रासंगिकता नहीं रह जाती.'

आशीष खेतान ने ट्वीट किया कि एक पार्टी जो दिल्ली की साफ-सफाई नहीं करने के लिए जिम्मेदार है, उसे प्रचंड जीत मिलती है. इसका राज बताने की जरूरत है.

अगर हम ईवीएम के बारे में थोड़ी देर के लिए इस बेतुके आरोप को नजरअंदाज कर दें, तो नतीजे को लेकर ‘आप' की घबराहट को समझा जा सकता है. सच कहा जाए तो बीजेपी ने पिछले 14 साल में दिल्ली नगर निगम की सत्ता को अपने बूते इतने जबर्दस्त प्रदर्शन के साथ पाने के लिए कभी कुछ किया ही नहीं. दरअसल इसके सदस्य दिल्ली की सड़कों और साफ-सफाई को ‘आप’ के खिलाफ लड़ाई में हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने में व्यस्त रहे.

जैसे ही कूड़ा जमा हो गया, नालियां बंद हो गईं और कामगार हड़ताल पर चले गए, दिल्ली के लोग जिंदा नरक में जीने को मजबूर कर दिए गए. वहीं ‘आप’ ने अपनी ओर से MCD कर्मचारियों के लिए तनख्वाह जारी करने से इनकार कर अपनी चाल चलना जारी रखा और यहां तक कि इसके लिए उसे अदालत ने भी फटकार लगाई. यह बहुत साफ था कि दिल्ली के लोग खुद को बीजेपी-आप के दंगल में फंसा पा रहे थे.

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चुनावी नतीजे बीजेपी की जीत से ज्यादा केजरीवाल की हार दिखाते हैं

वोटरों ने तब बीजेपी को दोबारा सत्ता क्यों सौंपी?

जवाब आसान है. अरविंद केजरीवाल का ‘प्यार’ बहुत जल्दी कड़वा हो गया. और इसके लिए केजरीवाल किसी और को नहीं, खुद को जिम्मेदार ठहराएं. पंजाब में हार के बाद वे तेजी से मानसिक अवसाद के शिकार होते चले गए. उनका भ्रम अब कोई नहीं ठीक कर सकता. जितनी तेजी से उनका उत्थान हुआ, पतन उससे भी गहरा हुआ है.

राजनीति में किसी की मृत्युगाथा लिखना सही नहीं है और यह पूरी तरह संभव है कि केजरीवाल उल्टी गंगा बहा लें. लेकिन इस समय इसकी संभावना नहीं लगती क्योंकि उनकी सबसे बहुमूल्य चीज- विश्वसनीयता -लुट चुकी है, जो किसी नेता को बनाती या बिगाड़ती है.

राजनीति के लिए केजरीवाल का नजरिया हमेशा आवारगी वाला रहा है. लगातार पार्टी का विस्तार कर उसे ऊंचाई की ओर ले जाना भी उनकी जिम्मेदारियों में नहीं दिखा. उन्होंने अपने हाथों में सत्ता रखने पर ध्यान दिया और राष्ट्रीय स्तर पर यह सोचकर आमने-सामने की लड़ाई में सीधे भिड़ गए कि वे अपनी महत्वाकांक्षा से ही राजनीति के स्थानीय और अस्थायी नियमों को तोड़ लेंगे.

पंजाब-गोवा की हार के बाद केजरीवाल का भ्रम तोड़ना जरूरी था

एक नेता के लिए महत्वाकांक्षा जरूरी गुण होता है. हालांकि, इसकी जड़ वास्तविकता में होनी चाहिए. यह साफ नहीं है कि केजरीवाल ने मीडिया की कहानियों को जरूरत के मुताबिक गम्भीरता से लिया या नहीं. लेकिन अपनी पार्टी के संस्थापक नेताओं के निलंबन और ‘आप’ के विस्तार की कोशिशों को रोकने की अनुमति देकर एक नेता के रूप में उन्होंने अपनी अनुभवहीनता जाहिर की.

Arvind Kejriwal

चुनाव नतीजों पर केजरीवाल को गंभीरता से विचार करना चाहिए

उन्हें अपने समय के सबसे प्रतिभाशाली राजनीतिज्ञ नरेंद्र मोदी से कुछ सीखना चाहिए था, लेकिन केजरीवाल इस भुलावे में रहने लगे कि राजनीतिक भाषणबाजी में वे मोदी की जगह ले सकते हैं.

ये शुरूआती भूल थी. पंजाब से लेकर गोवा तक करारी हार के बाद उन्हें दंडित किया जाना चाहिए था और वापस घर भेजा जाना चाहिए था, लेकिन केजरीवाल ने दिखाया कि हार के लिए ईवीएम को जिम्मेदार ठहरा देने से लोगों को भ्रम में रखने का उनका मकसद पूरा हो जाता है.

जीत और हार राजनीति में होते रहते हैं. देश की सबसे अधिक स्थाई और मर्यादित संवैधानिक संस्था चुनाव आयोग से भिड़कर, जिसका पक्षपात रहित रिकॉर्ड रहा है, केजरीवाल ने जनता को मजबूर कर दिया कि वो उन्हें खारिज करे.

‘आप’ के राजनीतिक भविष्य के बारे में अभी कोई नतीजे निकालना मुश्किल है. मतदाता ‘आप’ से ज्यादा केजरीवाल से नाराज हैं. इन हालात में जिस तरह केजरीवाल ने ‘आप’ को मजबूती से खुद के साथ बांध रखा है, ऐसा लगता है कि जैसे ही केजरीवाल अप्रासंगिक होंगे, ‘आप’ का सूरज भी ढल जाएगा.

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