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एमसीडी चुनाव नतीजे: सस्ती लोकप्रियता की चाह में मारे गए केजरीवाल

भारतीय राजनीति में जब कोई नेता ऊंचाई से गिरता है, तो उसकी वापसी बेहद मुश्किल होती है.

Sandipan Sharma | Published On: Apr 27, 2017 08:22 AM IST | Updated On: Apr 27, 2017 08:52 AM IST

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एमसीडी चुनाव नतीजे: सस्ती लोकप्रियता की चाह में मारे गए केजरीवाल

2013 का साल अरविंद केजरीवाल का साल था, जब भारतीय राजनीति में उनका दौर आया था. आज 2017 में केजरीवाल ऐसे नेता हैं जिनका दौर बीत चुका है.

केजरीवाल ने जिस क्रांति का वादा किया था, आज वो उससे बहुत दूर निकल गए हैं. 2015 में उन्होंने दिल्ली के विधानसभा चुनावों में शानदार जीत हासिल की थी. दो साल बाद अब नगर निगम के चुनाव में केजरीवाल की पार्टी और उनकी राजनीति पर झाड़ू लग गई है. केजरीवाल ने पिछले चार सालों में हीरो से जीरो बनने का जो सफर तय किया है, उस रास्ते पर हम बहुत से नेताओं को चलते देख चुके हैं.

आखिर केजरीवाल ने क्या गलती की?

इस सवाल का जवाब तलाशने के लिए हमें पीछे जाना होगा. हमें उनके सबसे बड़े और साहसिक फैसले को याद करना होगा. उन्होंने दिल्ली में सड़कों से भीड़ कम करने और प्रदूषण घटाने के लिए ऑड-इवन का फॉर्मूला लागू किया था.

तमाम परेशानियों के बावजूद पूरी दिल्ली केजरीवाल के फैसले के साथ खड़ी हो गई थी. जब विपक्षी दलों ने केजरीवाल पर सवाल उठाए, तो आम नागरिक उनके समर्थन में खड़े हुए. ऑड-इवन का पहला प्रयोग बेहद कामयाब रहा था. भले ही इसके नतीजे उम्मीद के मुताबिक न रहे हों, मगर जनता ने केजरीवाल के इस फैसले का दिल खोलकर समर्थन किया था.

kejriwal supporters

इसका क्या मतलब था?

इसका साफ मतलब था कि दिल्ली की जनता के बीच केजरीवाल की अच्छी इमेज थी. पब्लिक उनके लिए मुश्किलें सहने और बलिदान देने को तैयार थी. जनता को केजरीवाल के विचारों और सिद्धांतों पर यकीन था. केजरीवाल को लोग ऐसा नेता मानते थे, जो बाकी सियासी दलों से अलग सोचते थे. वो साहसिक फैसले लेने को राजी थे. जनता को लगता था कि केजरीवाल, तमाम विरोध के बावजूद कड़े कदम उठा सकते थे. केजरीवाल के साथ मध्यम वर्ग, युवाओं और दिल्ली के कामगारों का बड़ा तबका खड़ा हुआ था.

लेकिन आज केजरीवाल को मिला वो पूरा समर्थन भाप की तरह सूख चुका है. दिल्ली नगर निगम के चुनाव में आम आदमी पार्टी को मिले केवल बीस फीसद वोट इस बात का सबूत हैं. उनकी शुचिता और नैतिकता की राजनीति का दावा हवा हो चुका है. दिल्ली के मध्यम वर्ग और युवाओं के बीच से केजरीवाल को मिला समर्थन गायब हो चुका है. आज केजरीवाल कुछ गरीबों के नेता रह गए हैं. शायद उन पर कुछ और लोगों को यकीन है, जिन्हें केजरीवाल से अभी भी चमत्कार की उम्मीद है. मगर उनके साथ जुड़े जन समर्थन का एक बड़ा हिस्सा गायब हो चुका है.

केजरीवाल ने इतने कम वक्त में इतनी राजनैतिक ताकत कैसे लुटा दी?

इसका जवाब उनके साथी रहे मयंक गांधी के एक लेख से मिलता है. केजरीवाल को लिखे एक खुले खत में मयंक गांधी ने केजरीवाल के भारतीय राजनीति के डॉक्टर जैकिल से मिस्टर हाइड बनने की कहानी बयां की है. मयंक गांधी के मुताबिक सत्ता हासिल करने के लिए केजरीवाल ने अपने आदर्श ताक पर रख दिए. वो उन लोगों के सीने पर सवार हो गए, जिन्होंने केजरीवाल को दिल खोलकर समर्थन दिया था. आम आदमी पार्टी को इतनी बड़ी राजनैतिक ताकत बनाया था. मयंक गांधी कहते हैं कि केजरीवाल ने अपने सहयोगियों, दोस्तों और साथी कार्यकर्ताओं की पीठ में छुरा घोंपा.

मयंक गांधी ने केजरीवाल को इस चिट्ठी में लिखा कि, 'अन्ना की तरह आप भी देश की उम्मीदों के प्रतीक थे. आप राजनीति में भागीदारी, जवाबदेही, पारदर्शिता और विकेंद्रीकरण की मिसाल थे. आप उस गुस्से के प्रतीक थे, जो जनता के अंदर बाकी दलों के लिए थी. वो दल जो भ्रष्टाचार, सांप्रदायिकता, अपराधीकरण और जातिवाद की राजनीति करते थे. आम आदमी पार्टी देश के करोड़ों लोगों की उम्मीदों की लड़ाई लड़ने वाली पार्टी बन गई थी'.

kejriwal

केजरीवाल भी उस कहावत की एक और मिसाल बन गए हैं, जिसके मुताबिक, 'जो इतिहास से सबक नहीं लेते, वो उसे दोहराते हैं'. केजरीवाल भारत के पहले नेता नहीं हैं जिन्होंने साफ-सुथरी राजनीति के लिए जनता के समर्थन को अपने लिए जनादेश समझने की भूल की हो. वी पी सिंह भी इससे पहले भारतीय मूल्यों के प्रतीक के तौर पर सत्ता में आए थे. उन्होंने भी अपनी महत्वाकांक्षा में जनता की उम्मीदों के साथ खिलवाड़ किया. उन्हें भी जनता ने हाशिए पर डाल दिया था.

नैतिक राजनीति पर वोट बैंक को दी अहमियत

आदर्शवाद की राजनीति का रास्ता बेहद मुश्किल और संकरा होता है. इस पर चलने के लिए बहुत से बलिदान देने होते हैं. इच्छाशक्ति की जरूरत होती है. खुदगर्जी से ऊपर उठना होता है. लेकिन केजरीवाल ने सस्ती लोकप्रियता हासिल करने वाला आसान रास्ता चुना. उन्होंने भाई-भतीजावाद के जरिए सत्ता को अपने लोगों को फायदा पहुंचाने का जरिया बना लिया. वो उस जिम्मेदारी से मुकर गए, जो जनता ने उन्हें दी थी.

नैतिकता और शुचिता की राजनीति करने के बजाय वो निम्न मध्यम वर्ग का एक वोट बैंक तैयार करने में जुट गए. ऐसा वोट बैंक जिसमें शहरी गरीबों को कुछ रियायतें देकर अपने पाले में किया जा सके. उन्होंने सोचा कि सस्ती बिजली और पानी देकर वो गरीबों के एक तबके को हमेशा के लिए अपने साथ जोड़े रख सकेंगे. ऐसा करके केजरीवाल ने उन्हीं लोगों को किनारे लगाने की कोशिश की, जिन्होंने बदलाव की उम्मीद में केजरीवाल का समर्थन किया था.

आम आदमी पार्टी, मध्यम वर्ग की दुलारी थी. उसे मध्यम वर्ग के गुस्से से जली मशाल ने तैयार किया था. लेकिन दिल्ली विधानसभा चुनाव में जीत के बाद आम आदमी पार्टी ने सोचा कि उसे मध्यम वर्ग के समर्थन की जरूरत ही नहीं. पार्टी ने करोड़ों लोगों की उम्मीदों की बातें करने के बजाय, सिर्फ और सिर्फ गरीबी का शोर मचाना शुरू कर दिया. आम आदमी पार्टी और दूसरे दलों में कोई फर्क नहीं रह गया है. ऐसे में मध्यम वर्ग को भी ये पछतावा होने लगा कि उसने आम आदमी पार्टी को समर्थन क्यों दिया.

केजरीवाल, जो कभी इस वर्ग के दुलारे थे, वो समझ ही नहीं पाए कि उनकी पार्टी, अपने समर्थकों के एक बड़े तबके से दूर होती जा रही है. ये वो तबका था, जिसने केजरीवाल का माहौल बनाने में बड़ा योगदान दिया था. शायद केजरीवाल को इस बात से फर्क ही नहीं पड़ता था कि मध्यम वर्ग उनसे नाराज है. वो ये यकीन करने लगे थे कि उन्होंने गरीब वोटरों का एक बड़ा वर्ग तैयार कर लिया है, जो हर हाल में उनका साथ देगा.

kerjriwal delhi

अपने कर्मों की कीमत चुका रहे हैं केजरीवाल

केजरीवाल ने इसी अहंकार में आरोप लगाकर भाग निकलने की राजनीति शुरू कर दी. वो मुफ्त की चीजें देने वाले नेता के तौर पर उभरे. साफ सुथरी राजनीति का उनका वादा हवा हो गया. उनकी पार्टी को मिलने वाले चंदे का हिसाब भी साफ-सुथरा नहीं रह गया था. उन्होंने विवादित लोगों को उम्मीदवार बनाना शुरू कर दिया. ये उस तबके के लिए झटका था, जिसने बड़ी उम्मीद से केजरीवाल को समर्थन दिया था.

अब केजरीवाल अपने इन्हीं कर्मों की कीमत चुका रहे हैं. उन्होंने लोगों का भरोसा तोड़ने की सजा पाई है. केजरीवाल ने लोगों की जिंदगियां बेहतर बनाने का वादा करके उसे तोड़ा. इसकी सजा जनता ने उन्हें दी है.

मयंक गांधी अपने खुले खत में सवाल पूछते हैं कि भारत को एक हीरो चाहिए. क्या केजरीवाल वो हीरो बनने को तैयार हैं? क्या केजरीवाल अपनी गलतियां मानकर जनता से माफी मांगने को तैयार हैं? क्या वो उन साथियों से माफी मांगेंगे जिन्हें उन्होंने धोखा दिया?

केजरीवाल को इस बात पर संतोष करना चाहिए कि दिल्ली में अभी भी उनकी सरकार है, जिसका तीन साल का कार्यकाल बचा हुआ है. यहां से भी वो नया सियासी सफर शुरू कर सकते हैं. वो अगर ईमानदारी से लोगों से किए गए वादे निभाने की कोशिश करेंगे, तो, शायद जनता उन्हें एक मौका और दे दे.

लेकिन केजरीवाल के लिए पश्चाताप का रास्ता मुश्किल है. भारतीय राजनीति में जब कोई नेता ऊंचाई से गिरता है, अपने लोगों से छल करता है, तो उसकी वापसी बेहद मुश्किल होती है. इसकी तमाम मिसालें हैं. वीपी सिंह, मोरारजी देसाई और राजीव गांधी तो महज कुछ नाम हैं. इन नेताओं का सियासी सफर बताता है कि नेता से धोखा खाने वाला वोटर जब बदला लेता है, तो वो नेताओं को धूल चटाकर ही दम लेता है.

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