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एमसीडी चुनाव: लंबे वक्त तक सुनाई देगी मोदी-शाह के इस जीत की गूंज

बीजेपी को इतनी शानदार जीत मिलने का मतलब साफ है कि समाज के सभी तबके के लोगों ने उसे वोट दिया है

Sanjay Singh | Published On: Apr 27, 2017 03:22 PM IST | Updated On: Apr 27, 2017 03:22 PM IST

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एमसीडी चुनाव: लंबे वक्त तक सुनाई देगी मोदी-शाह के इस जीत की गूंज

दिल्ली नगर निगम के चुनाव में शानदार जीत के बावजूद, बीजेपी के दफ्तर में जीत का जश्न नहीं मना. न ढोल बजे, न लड्डू बांटे गए और न ही आतिशबाजी की गई.

बीजेपी के सभी नेता इस बात से बेहद खुश हैं कि उन्होंने दिल्ली विधानसभा का चुनाव जीतने के दो साल के भीतर अरविंद केजरीवाल और उनकी पार्टी को जबरदस्त तरीके से मात दी. लेकिन सुकमा में शहीद हुए सीआरपीएफ के जवानों के सम्मान में बीजेपी ने इस शानदार जीत का जश्न नहीं मनाया.

बीजेपी की दिल्ली में जीत की सिर्फ एक वजह है, और वो है नरेंद्र मोदी का करिश्माई व्यक्तित्व. उनकी लोकप्रियता दिनों-दिन बढ़ रही है. पिछले कुछ दशकों में ऐसा पहली बार हुआ होगा कि किसी पार्टी ने दिल्ली में लगातार तीन बार नगर निगम के चुनाव जीते हैं.

बीजेपी की रणनीतियां रहीं कारगर

बीजेपी ने दो बार एमसीडी का चुनाव तब जीता, जब दिल्ली में कांग्रेस की सरकार थी. और इस बार पार्टी ने आम आदमी पार्टी की सरकार रहते हुए भी नगर निगम के चुनाव में जीत दर्ज की. शीला दीक्षित के राज में एमसीडी को बेहतर कामकाज के लिए तीन हिस्सों में बांटा गया था. फिर भी बीजेपी का कामकाज काबिले तारीफ नहीं रहा. इसके बावजूद पार्टी, लगातार तीसरी बार एमसीडी का चुनाव जीत गई.

बीजेपी को अपनी इस चुनौती का बखूबी एहसास था. इसीलिए पार्टी ने इस बार दिल्ली को पीएम मोदी के सपनों का शहर बनाने के वादे पर चुनाव लड़ा. साथ ही पार्टी ने इस बार हर सीट पर नए उम्मीदवार को ही मौका दिया. सभी मौजूदा पार्षदों के टिकट काट दिए गए. पार्टी ने पुराने मेयरों को भी मौका नहीं दिया और न ही ताकतवर मानी जाने वाली स्टैंडिंग कमेटी के प्रमुखों को चुनाव लड़ाया. ये नुस्खा बीजेपी के लिए कारगर साबित हुआ.

इन तरकीबों से बीजेपी ने अपने पिछले कामकाज की कमियों को छुपाकर खुद को जनता के बीच एकदम नई पार्टी के तौर पर पेश किया. हालांकि पार्टी ने ये नहीं बताया कि मोदी-अमित शाह की अगुवाई में पार्टी की जो रिपैकेजिंग हुई है, वो असल में नई बोतल में पुरानी शराब की तरह ही है.

लेकिन एमसीडी चुनाव के नतीजे आए तो तीनों ही नगर निगमों में बीजेपी को दो तिहाई बहुमत मिला. आम आदमी पार्टी दूसरे नंबर पर रही. वहीं कांग्रेस तो तीसरे नंबर पर भी बेहद कमजोर हालत में पहुंच गई. उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के विधानसभा चुनाव में बही मोदी लहर का असर दिल्ली के वोटर पर भी पड़ा. इस आंधी में केजरीवाल और राहुल गांधी के दावे उड़ गए.

BJP Supporters

हर वर्ग ने दिया वोट

नगर निगम के चुनाव से कुछ दिन पहले ही बीजेपी ने दिल्ली की राजौरी गार्डेन विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में शानदार जीत दर्ज की थी. पार्टी ने इस सीट पर पचास फीसद से ज्यादा वोट हासिल किए और आम आदमी पार्टी को तीसरे नंबर पर धकेल दिया. आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार की जमानत तक जब्त हो गई.

बीजेपी को इतनी शानदार जीत मिलने का मतलब साफ है. समाज के सभी तबके के लोगों ने उसे वोट दिया है. तभी तो पार्टी ने 270 में से 184 सीटों पर जीत दर्ज की. झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले गरीब तबके के मतदाताओं ने भी बीजेपी को वोट दिया. कभी ये मतदाता, कांग्रेस का वोट बैंक हुआ करते थे. 2015 में आम आदमी पार्टी ने इनके वोट हासिल किए थे. इस बार कांग्रेस को उम्मीद थी कि ये वोटर उसके पास लौटेंगे. मगर ये वोट बीजेपी की झोली में चले गए.

बीजेपी की इस कामयाबी के दूरगामी सियासी नतीजे देखने को मिलेंगे. पिछले दो सालों से पीएम मोदी बेहद करीने से खुद को गरीबों के मसीहा के तौर पर पेश कर रहे हैं. वो अपनी सरकार की नीतियों को भी गरीबों के हित वाली बताते रहे हैं. उनकी जन-धन योजना, उज्जवला योजना, स्टैंड-अप इंडिया जैसी योजनाओं का उम्मीद के मुताबिक ही असर देखने को मिल रहा है.

केजरीवाल की सनक भरी राजनीति के चलते बीजेपी मध्यम वर्ग का समर्थन दोबारा हासिल करने में भी कामयाब रही. समाज के ऊंचे दर्जे के लोग भी पार्टी के साथ खड़े नजर आए. 2015 में ये तबका आम आदमी पार्टी के साथ चला गया था. यानी इस बार नगर निगम के चुनाव में बीजेपी को 2014 के लोकसभा चुनाव के बराबर ही वोट मिले.

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तस्वीर: पीटीआई

झगड़ालू नेता बनकर रह गए केजरीवाल

आज जनता की नजर में मोदी ऐसे जिम्मेदार नेता हैं, जो समस्याओं का हल तलाशने में यकीन रखते हैं. उनके मुकाबले केजरीवाल की इमेज एक झगड़ालू नेता की बन गई है. वो बेवजह के मुद्दों को उठाकर बयानबाजी के लिए ही जाने जाते हैं. केजरीवाल का झगड़ा सिर्फ बीजेपी से हुआ हो ऐसा नहीं है. वो उप-राज्यपाल से भिड़ चुके हैं. वो अपनी पार्टी के नेताओं से लड़ चुके हैं, वो पीएम मोदी से मुकाबले की कोशिश करते रहे हैं. उन्होंने अरुण जेटली के खिलाफ भी मोर्चा खोला था. इन दिनों केजरीवाल ईवीएम के खिलाफ जंग छेड़े हुए हैं. आम आदमी पार्टी के प्रमुख केजरीवाल, रोज ही कोई न कोई लफड़ा दिल्ली की जनता पर थोप रहे थे. कई बार तो जनता को ऐसा लगा कि वो बेवजह की रार ठाने हुए हैं.

बीजेपी ने 2015 के विधानसभा चुनाव में हुई गलतियों से भी इस बार सबक लिया. नगर निगम के चुनाव में पार्टी ने दूसरे राज्यों से बुलाए गए नेताओं की कतार नहीं लगाई. मीडिया से स्थानीय नेता ही मुखातिब हुए.

मोदी की लोकप्रियता बढ़ी, केजरीवाल को करारा झटका

मोदी का करिश्मा लोगों के सिर चढ़कर बोला ही, बीजेपी को अपने अध्यक्ष अमित शाह की रणनीति पर भी पूरा भरोसा था. तभी तो, सभी मौजूदा पार्षदों के टिकट काटने के बावजूद पार्टी के भीतर ज्यादा बगावती सुर नहीं उठे. बागियों को मालूम था कि वोट मोदी के नाम पर ही मिलेगा, उनके नाम पर नहीं. इसीलिए उन्होंने अपना विरोध दर्ज कराने के लिए वक्त का इंतजार करना बेहतर समझा.

manoj tiwari

एमसीडी के नतीजों से मनोज तिवारी का कद भी बीजेपी में बढ़ा है. अब वो सिर्फ भोजपुरी गायक-अभिनेता और सांसद नहीं रह गए हैं. आज वो दिल्ली में पार्टी का सबसे बड़ा चेहरा बन गए हैं. बीजेपी ने इससे पहले कई स्थानीय नेताओं को आजमाया था. मगर वो उतने लोकप्रिय या संगठन की क्षमता वाले नहीं निकले. दिल्ली के लिए मनोज तिवारी एकदम नया चेहरा थे. उन्होंने केजरीवाल को उन्हीं की जुबान में जवाब दिया. दिल्ली में दिनों-दिन बढ़ती पूर्वांचली आबादी के बीच मनोज तिवारी ने गहरी पैठ बनाई.

मनोज तिवारी को दिल्ली में बीजेपी का अध्यक्ष बनाना मोदी-अमित शाह का मास्टरस्ट्रोक था. तिवारी ने झुग्गियों में रहने वालों के बीच कई रातें बिताईं. उन्होंने गरीबों से जुड़ने की कोशिश की. वो भोजपुरी और हिंदी गाने गाकर भी लोगों से संवाद करने में कामयाब हुए. एक और भोजपुरी सुपरस्टार रविकिशन भी मनोज तिवारी के साथ आए. दिल्ली के सीनियर बीजेपी नेता जैसे हर्षवर्धन, विजय गोयल, आरती मेहरा, विजेंद्र गुप्ता और सतीश उपाध्याय से भी मनोज तिवारी ने अच्छा तालमेल बैठाया.

बीजेपी ने एमसीडी चुनाव में जीत का जश्न भले न मनाया हो, मगर जीत की मुस्कान हर नेता के चेहरे पर साफ देखी जा सकती है. सभी की नजर में इसका श्रेय प्रधानमंत्री मोदी को जाता है.

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