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जिस चमक-दमक के साथ गद्दी पर बैठे केजरी, उसी अंदाज में मोहभंग भी हुआ

पंजाब और गोवा के चक्कर में केजरीवाल दिल्ली को प्राथमिकता देना ही भूल गए

Sanjay Singh Updated On: Apr 25, 2017 08:43 AM IST

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जिस चमक-दमक के साथ गद्दी पर बैठे केजरी, उसी अंदाज में मोहभंग भी हुआ

26 अप्रैल को हो रही मतगणना में अगर एक्जिट पोल के अनुमान सही होते हैं और उस अनुसार दिल्ली के तीनों नगर निगमों में तीन चौथाई बहुमत बीजेपी को मिलती है तो इसके दो अर्थ होंगे- पहला, नरेंद्र मोदी की लहर बरकरार है और दूसरा सत्ता में जिस चमक और धमक के साथ अरविन्द केजरीवाल आए थे, पतन भी वैसा ही देखने को मिल रहा है.

अगर केजरीवाल ने फरवरी 2015 में 70 में से 67 सीटें जीत कर नयी नवेली आम आदमी पार्टी के लिए इतिहास रचा था, तो अब वह न सिर्फ एक के बाद एक चुनाव हारने का, बल्कि इतने कम समय में जनता का विश्वास खोने और पीएम मोदी के नेतृत्व वाली बीजेपी के राष्ट्रीय विकल्प के तौर पर खुद को प्रोजेक्ट करने की कोशिशों के विफल होने का नया अध्याय भी लिख रहे हैं.

इतना ही नहीं, अगर इंडिया टुडे-एक्सिस और एबीपी-सी वोटर के एक्जिट पोल के पूर्वानुमान सही होते हैं तो यह आम आदमी पार्टी के लिए उतनी ही अपमानजनक हार होगी, जितनी कि दो साल पहले कांग्रेस और बीजेपी की विधानसभा चुनाव में हार से हुई थी.

केजरीवाल का बर्ताव होगा जिम्मेदार

खासकर राजौरी गार्डन उपचुनाव में जमानत गंवाते हुए तीसरे नंबर पर आई ‘आप’ के लिए यह नतीजा इस बात की निर्णायक रूप से पुष्टि करेगा कि दो साल के शासनकाल में केजरीवाल के बारहमासी टकरावपूर्ण व्यवहार, आत्मतुष्टि और नॉन परफॉर्मेन्स की वजह से दिल्ली के लोगों का उनसे पूरी तरह मोहभंग हो गया है.

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इसका मतलब ये भी होगा कि सरकार चलाने पर ध्यान देने के बजाए दूसरे मुद्दों पर इतनी ज्यादा नकारात्मक ऊर्जा लगाना बेकार साबित हुआ. अपने राजनीतिक विरोधियों को वास्तविक या काल्पनिक मुद्दों पर लगातार चुनौती, सोशल मीडिया पर बहुत ज्यादा समय देना, दूसरों के लिए लगातार बुरे रूप में बने रहना, वोटरों में एक तरह का भय पैदा करना कि आप अगर हमें वोट नहीं देते हैं, तब डेंगू और चिकनगुनिया के लिए खुद जिम्मेदार होंगे, अपने प्रमोशन के लिए विज्ञापनों पर खर्च करना और लोगों के करोड़ों रुपए बर्बाद कर देना, जिसमें अवमानना का केस भी शामिल है.

Arvind kejriwal

दो साल पहले दिल्ली की जनता ने केजरीवाल को एक ईमानदार और भ्रष्टाचार विरोधी क्रूसेडर के साथ-साथ सुशासन के मसीहा के रूप में देखा था, जिनसे उम्मीद थी कि वे दिल्ली को रहने और काम के लायक बनाएंगे. इस तरह जनता ने उन पर इतना भरोसा जताया जितना कि कोई सोच भी नहीं सकता.

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लेकिन चुनाव परिणाम के दिन अगर एक्जिट पोल सही हुए, तो इसका मतलब यही होगा कि उन्होंने लोगों की उम्मीदों और विश्वास को तोड़ा है. और लोगों ने इसके बदले में उनकी और उनकी आम आदमी पार्टी को साफ चेतावनी दे दी है.

दिल्ली का गायब रहने वाला मकान मालिक

ऐसा लगता है कि लोग इस बात से भी नाराज थे कि केजरीवाल ने दिल्ली को गंभीरता से नहीं लिया और वे बहुत जल्द बहुत कुछ पा लेना चाहते थे. जैसा कि उनके डिप्टी सीएम मनीष सिसौदिया ने उनके पंजाब के मुख्यमंत्री बनने, गोवा में किसी को नामांकित करने और फिर गुजरात की तरफ रुख करने को लेकर संकेत दिया था. यह सब कुछ इस इरादे के साथ हो रहा था कि 2019 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चुनौती देने वाले वे इकलौते नेता बन सकें. केजरीवाल अलग-अलग कारणों से दिल्ली के अनुपस्थित जागीरदार बन गए थे.

यह सच है कि अपनी पार्टी के संयोजक होने के नाते उन्हें प्रचार-प्रसार के लिए यात्राएं करनी पड़ती थीं, लेकिन उन्होंने कभी भी आम आदमी पार्टी सरकार को दिल्ली में स्थिर करने को प्राथमिकता नहीं दी. राष्ट्रीय राजनीतिक शक्ति बनने और चुनाव में सत्ताधारी बीजेपी और प्रधानमंत्री मोदी के साथ मुकाबले की उनकी महत्वाकांक्षा उन पर इतनी हावी हो गयी कि उन्होंने दिल्ली में सरकार के मुद्दे पर ध्यान ही नहीं दिया. गोवा और पंजाब चुनावों में और थोड़े समय बाद राजौरी गार्डन उपचुनाव में यह संदेश साफ हो गया.

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केजरीवाल कल्पनालोक में जी रहे हैं

केजरीवाल और 'आप' की समस्या यह है कि इन असफलताओं पर आत्मनिरीक्षण और अपनी नीतियों और कार्यक्रमों पर गंभीरतापूर्वक विचार करने के बजाए ये लोग उस कल्पना लोक में जी रहे हैं कि उनका आकर्षण और करिश्मा कभी खत्म नहीं होगा- चाहे वे कितनी बार गलतियां कर लें, अपने कथित राजनीतिक दर्शन से पलटना जारी रखें, अपनी सरकार और शासन के तौर तरीकों को चाहे वे जिस रूप में लें, चाहे उनके जितने भी मंत्री और नेता आपराधिक और सिविल मुकदमे में शामिल रहें.

इन हालात में केजरीवाल और उनकी टीम ने खुद पर लगे आरोपों पर रोक लगाने के लिए सबकुछ किया. उन्हें बढ़ा-चढ़ा कर ये दावा करना ज्यादा आसान लगा कि वे और उनकी पार्टी का चुनावचिन्ह आज भी उतना ही लोकप्रिय है जितना कि 2015 के सर्दियों के मौसम में था.

kejriwal

यह वही जांची-परखी इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) है जिसके लिए चुनाव आयोग को अपनी अपमानजनक हार के लिए जिम्मेदार ठहराया गया. उनके पास कोई सबूत नहीं है कि चुनाव आयोग ने ईवीएम से छेड़छाड़ का खुला मौका छोड़ा, हजारों ईवीएम को बिना किसी के या कैमरे के देखे मैन्युपुलेट किया गया.

इसके अलावा भी कोई ऐसा तर्क उनके पास नहीं है जिससे कि ईवीएम से छेड़छाड़ का उनका दावा पुष्ट होता हो. केजरीवाल का सिर्फ एक ही तर्क है जो उन्होंने अपने एक इंटरव्यू में कहा है कि चूंकि वे एक आईआईटियन हैं इसलिए वो जानते हैं कि इससे किस तरह छेड़छाड़ की जा सकती है.

हार के एहसास का तुरत-फुरत इलाज था ईवीएम का बहाना

दरअसल 23 अप्रैल को मतदान के दौरान ही केजरीवाल ने ईवीएम के जरिए घपले की बात पर चीखना शुरू कर दिया था जो संकेत देता है कि उन्हें आभास हो गया था कि वे हारने जा रहे हैं और इसलिए बहाने बनाने होंगे. कुछ इलाकों में ईवीएम के खराब रहने की सूचना थी जिन्हें समय रहते सही कर लिया गया. किसी भी मशीन में समस्या हो सकती है. लेकिन किसी को यह समझना होगा कि खराब होना, काम नहीं करना और मशीन से छेड़छाड़ तीनों अलग-अलग चीजें हैं.

एक्जिट पोल के अनुमान के तुरंत बाद, जिसमें आप की दुर्गति और बीजेपी की एकतरफा जीत (आज तक-एक्सिस, आप-30, बीजेपी 211, एबीपी-सी वोटर, आप-22, और बीजेपी 218) बताई गई थी, सोमनाथ भारती और दूसरे नेताओं के गढ़े गए रास्ते पर चलते हुए आप नेता साजिश की थ्योरी के साथ आ खड़े हुए कि चूंकि ईवीएम से किसी एक पार्टी के पक्ष में छेड़छाड़ की गई है इसलिए मीडिया के जरिए कहानी बनाई जा रही है ताकि चुनाव नतीजे को सही ठहराया जा सके.

आप नेता आसानी से भूल गए कि यही थ्योरी उन पर भी लागू होती है कि उन्होंने तब ईवीएम से छेड़छाड़ की कहानी बनाई जब मतदान चल ही रहा था ताकि नतीजों की वास्तविक घोषणा से पहले ही नुकसान की वजह बताई जा सके.

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