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एमसीडी चुनाव: आवासीय योजनाओं में धन-कटौती 'आप' को पड़ सकती है महंगी!

दो सालों के दौरान दिल्ली सरकार ने योजनाओं का क्रियान्वयन बेहद धीमी गति से किया

Kangkan Acharyya Updated On: Apr 06, 2017 03:01 PM IST

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एमसीडी चुनाव: आवासीय योजनाओं में धन-कटौती 'आप' को पड़ सकती है महंगी!

दिल्ली नगर निगम (एमसीडी) चुनाव के पहले आम आदमी पार्टी सरकार खुद को गरीब समर्थक दिखाने का लगातार प्रयास करती रही है. इसके उलट एक प्रमुख दस्तावेज से पता चला है कि दिल्ली में अपने लगभग ढाई साल के कार्यकाल के दौरान दिल्ली सरकार ने झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वालों के लिए आवास योजनाओं में धन की एक बड़ी कटौती कर दी है.

दिल्ली सरकार के शहरी विकास विभाग द्वारा जारी आधिकारिक दस्तावेज में ये खुलासा हुआ है कि झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वालों के लिए जो आवास योजना है, उसमें आप सरकार ने 469 करोड़ रुपए की राशि की कटौती कर दी है.

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दिल्ली की आम आदमी पार्टी सरकार ने एमसीडी चुनाव से सिर्फ दो महीने पहले झुग्गी झोपड़ियों में रहने वाले गरीबों के लिए 6,178 फ्लैटों के निर्माण की योजना बनाई थी. लेकिन ये शहरी विकास विभाग का ताजा खुलासा आप सरकार की नई घोषणा के बिल्कुल उलट दिखाई पड़ता है.

16 में से 5 परियोजनाएं खत्म की गईं

House owner/real estate agent giving away the keys

जेएनएनयूआरएम के तहत ‘शहरी गरीबों की बुनियादी सेवा की स्थिति पर रिपोर्ट' नामक दस्तावेज दिखाता है कि इस फंड में कटौती के कारण जवाहरलाल नेहरू शहरी नवीनीकरण मिशन के प्रमुख कार्यक्रम के तहत चलने वाली 16 आवास परियोजनाओं में से पांच परियोजनाएं खत्म की जा चुकी हैं.

योजना में फंड कटौती मार्च 2015 में की गई जब केंद्र सरकार ने उस जेएनएनयूआरएम परियोजना को रद्द कर दिया, जिनमें से बहुत सारी योजनाएं पूरे देश में अधूरी थीं.

मिशन अवधि के अंत में प्रकाशित सीएजी रिपोर्ट के मुताबिक, शहरी बुनियादी ढांचा विकास परियोजनाओं की कुल 766 परियोजनाओं में से देश भर में सिर्फ 126 परियोजनाएं ही समय पर पूरी की जा सकी थी.

अधूरी परियोजनाओं को पूरा करने के लिए पुनरुद्धार और शहरी विकास कार्यक्रम को लेकर अटल मिशन के तहत कई राज्यों ने केंद्र से अतिरिक्त धन हासिल करने की कोशिश की.

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दिल्ली 2016-17 के आर्थिक सर्वेक्षण ने भी केंद्र सरकार से जेएनएनयूआरएम जैसी योजनाओं के तहत दी जा रही धनराशि के रोके जाने के बारे में शिकायत की है. लेकिन इस तथ्य के बावजूद कि जेएनएनयूआरएम के तहत धन रोक दी गयी थी, राष्ट्रीय राजधानी को कम से कम यह उम्मीद तो थी ही कि झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वालों के जीवन से संबंधित परियोजनाओं को कम करने वाली निधि का विकल्प दिया जाता.

ऐसा नहीं हुआ. माना जाता है कि झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले लोग सत्तारूढ़ पार्टी के मुख्य मतदाता हैं. गौरतलब है कि सर्वेक्षण के मुताबिक दिल्ली सरकार के कर राजस्व में वित्तीय वर्ष 2015-16 में 13.61 प्रतिशत की वृद्धि हुई है.

इस रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली में वित्तीय वर्ष 2015-16 के दौरान 1,321.92 करोड़ रुपये का वित्तीय अधिशेष था — धन की कटौती के बिना परियोजनाओं को पूरा करने के लिए आवश्यक राशि से यह राशि दोगुनी थी.

निधि कटौती के माध्यम से चलाई जाने वाली परियोजनाओं में निर्माण किये जाने वाले तय फ्लैटों की संख्या में भी कमी देखी गई. इन परियोजनाओं द्वारा जो फ़्लैट दिये जाने थे, उनकी कुल संख्या 28,540 से घटाकर 19, 780 कर दी गई.

बेहद सुस्त रही दिल्ली में योजनाओं के क्रियान्वयन की रफ्तार

अरविंद केजरीवाल

दिल्ली में परियोजनाओं के क्रियान्वयन की रफ्तार भी बड़ी सुस्त रही है, क्योंकि इन 16 आवास परियोजनाओं में से नौ परियोजनाएं अपनी प्रस्तावित निर्माण अवधि के बीत जाने के बाद भी अधूरी हैं.

गरीबों के लिए लक्षित 55,424 घरों में से केवल 31,424 घर ही पूरे किए जा सके हैं. घर निर्माण की सफलता की दर 57 फीसदी से भी कम है, जबकि सभी परियोजनाओं को पूरा करने की निर्धारित अवधि 31 मार्च को ही खत्म चुकी है.

आम आदमी पार्टी सरकार चाहे लाख दावे करे, मगर परियोजना के क्रियान्वयन के सिलसिले में आम आदमी पार्टी की सरकार का प्रदर्शन बेहद निराशाजनक है, क्योंकि 31,424 में से पूर्ण रूप से निर्मित केवल 288 फ्लैट ही लाभार्थियों को मिल सके हैं और तीन साल में केवल एक परियोजना ही पूरी की जा सकी है.

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आम आदमी पार्टी की अगुवाई वाली सरकार 2013 के पहले बन चुके फ्लैटों में भी लाभार्थियों को समायोजित करने में असफल रही है.

दिल्ली में कांग्रेस शासन में 2007 से शुरू होकर 2013 तक ख़त्म होने वाली अवधि के दौरान छह परियोजनाएं पूरी हो चुकी थीं, जबकि आम आदमी पार्टी के ढाई साल के शासन के दौरान केवल एक परियोजना ही पूरी हो पाई है.

दिल्ली की झुग्गी-झोपड़ियों में निम्नस्तरीय जीवन स्तर को राजधानी के स्वास्थ्य के लिए खतरा माना जाता है. दिल्ली आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, 22 प्रतिशत मलिन बस्तियों में शौचालय नहीं हैं और उनमें से केवल 30 प्रतिशत में ही सेप्टिक टैंक का इस्तेमाल होता है.

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राष्ट्रीय राजधानी में 695 झुग्गी बस्ती एवं जे जे क्लस्टर (झुग्गी झोपड़ी क्लस्टर) और 1,797 अनधिकृत कॉलोनियां हैं, जिनके लिए जरूरी स्थानान्तरण या स्तरीय आवासों की आवश्यकता है ताकि समय-समय पर संक्रामक बीमारियों से जुड़ी चुनौतियों का सामना किया जा सके. पिछले साल ही शहर में डेंगू और चिकुनगुनिया का एक बड़ा प्रकोप देखा गया था.

इस जरूरत को पूरा करने में आम आदमी पार्टी की अगुवाई वाली सरकार की विफलता और झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले लोगों के आवास के लिए मंजूर धनराशि को कम करना आगामी एमसीडी चुनावों में आम आदमी पार्टी के लिए भारी पड़ सकता है.

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