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देश के बंटवारे के लिए नेहरू को जिम्मेदार मानते थे अबुल कलाम आजाद

मौलाना आजाद की जीवनी ‘आजादी की कहानी’ में यह बात दर्ज है

Surendra Kishore Surendra Kishore Updated On: Sep 11, 2017 08:59 AM IST

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देश के बंटवारे के लिए नेहरू को जिम्मेदार मानते थे अबुल कलाम आजाद

क्या मुहम्मद अली जिन्ना सन् के 1946 के प्रारंभ में कुछ शर्तों के साथ ‘अखंड भारत’ के लिए राजी हो गये थे? क्या उसी साल जवाहर लाल नेहरू ने एक ऐसा बयान दे दिया कि उससे नाराज होकर जिन्ना ने ‘सीधी कार्रवाई’ का नारा देकर पाकिस्तान बनवा लिया?

देश के बंटवारे के लिए नेहरू को ही जिम्मेवार मानते थे

इन बातों में कितनी सच्चाई है? अन्य लोग इस पर जो कहें, पर देश के प्रथम शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आजाद तो देश के बंटवारे के लिए नेहरू को ही जिम्मेवार मानते थे. मौलाना आजाद की जीवनी ‘आजादी की कहानी’ में यह बात दर्ज है. मौलाना आजाद के बारे में इस देश के राष्ट्रपति रहे डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने कहा था कि ‘वो व्यक्तिगत संबंधों में असीम करूणा, पर सार्वजनिक मामलों में निर्मम न्याय से काम लेने वाले आदमी थे.’

आजाद के अनुसार ‘ब्रिटिश सरकार के कैबिनेट मिशन, कांग्रेस महासमिति और मुस्लिम लीग के बीच इस बात पर आपसी सहमति बन चुकी थी कि ‘अखंड आजाद भारत’ की केंद्रीय सरकार के अधीन तीन विषय होंगे- रक्षा, विदेश और संचार. राज्यों को तीन श्रेणियों में बांटा जाएगा. उन्हें स्वायत्तता रहेगी. सी श्रेणी के राज्यों में बंगाल और असम शामिल थे. बी श्रेणी के राज्यों में पंजाब, सिंध उत्तर पश्चिम सीमा प्रांत और ब्रिटिश बलूचिस्तान शामिल थे. बाकी राज्य ए श्रेणी में रखे गये थे.

कैबिनेट मिशन की धारणा थी कि प्रस्तावित व्यवस्था में मुसलमान अल्पसंख्यक वर्ग को पूरी तरह से इत्मीनान हो जाएगा. याद रहे कि ब्रिटिश सरकार ने ‘कैबिनेट मिशन’ भारत भेजा था. उसका काम था कि वह आजादी केे संदर्भ में हिंदुस्तान के प्रतिनिधियों से विचार-विमर्श करे.

jinnah and gandhi

महात्मा गांधी के साथ मुहम्मद अली जिन्ना

मौलाना आजाद ने लिखा कि कैबिनेट मिशन ने मेरी यह बात मान ली थी कि अधिकतर विषय प्रांतीय स्तर पर संभाले जाएंगे. इसलिए जिन राज्यों में मुसलमानों का बहुमत है, उन्हें वहां पूरी स्वायत्तता रहेगी. उन राज्यों में वो अपनी सारी औचित्यपूर्ण उम्मीदों को सफल बना सकते थे. शुरू में तो जिन्ना ने इस योजना का घोर विरोध किया. कैबिनेट मिशन ने यह साफ कर दिया कि वह देश के बंटवारे का सुझाव कभी नहीं देगा.

पाक सरीखा राज्य कैसे जिएगा, कैसे बढ़ेगा और कैसे स्थायी होगा! 

मिशन के दो सदस्यों लार्ड लाॅरेंस और सर क्रिप्स ने कहा कि हमारी समझ में नहीं आता कि मुस्लिम लीग जिस पाक सरीखे राज्य की कल्पना करता है, वह कैसे जिएगा, कैसे बढ़ेगा और कैसे स्थायी होगा! मुस्लिम लीग परिषद की लंबी बैठक के बाद जिन्ना ने यह स्वीकार किया कि ‘कैबिनेट मिशन की योजना में जो हल प्रस्तुत किया गया है, अल्पसंख्यकों की समस्या का उससे अधिक न्यायपूर्ण हल और कोई नहीं हो सकता है.’

इधर कांग्रेस कार्य समिति ने 26 जून, 1946 की बैठक में कैबिनेट मिशन के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया. मौलाना लिखते हैं कि ‘तभी एक ऐसी दुखद घटना घटी जिसने इतिहास के क्रम को बदल दिया. 10 जुलाई को जवाहर लाल नेहरू ने बंबई में एक संवाददाता सम्मेलन बुलाया. उनसे यह पूछा गया कि क्या कांग्रेस कार्य समिति के प्रस्ताव के पास कर देने का मतलब यह है कि कांग्रेस ने योजना को पूर्ण रूप से स्वीकार कर लिया है जिसमें अंतरिम सरकार के गठन का सवाल भी निहित है?

इसके जवाब में जवाहर लाल ने कहा कि ‘कांग्रेस करारों की बेड़ियों से बिलकुल मुक्त रह कर और जब जैसी स्थिति पैदा होगी, उसका मुकाबला करने के लिए स्वतंत्र रहते हुए, संविधान सभा में जाएगी.’ संवाददाताओं ने फिर पूछा कि क्या इसका मतलब यह है कि मंत्रिमंडलीय मिशन योजना में संशोधन किए जा सकते हैं?

Maulana Azad-Nehru

मौलाना अबुल कलाम आजाद के साथ जवाहर लाल नेहरू

जवाहर लाल ने जोर देकर कहा कि कांग्रेस ने सिर्फ संविधान सभा में हिस्सा लेना स्वीकार किया है. वह मिशन योजना में जैसा उचित समझे, वैसा संशोधन-परिवर्तन के लिए अपने आप को स्वतंत्र समझती है. मौलाना ने लिखा कि ‘मैं यह कह दूं कि जवाहर लाल का यह बयान गलत था. यह कहना सही न था कि कांग्रेस उस योजना में जो चाहे संशोधन करने के लिए स्वतंत्र है.'

हम मान चुके थे कि केंद्रीय सरकार संघीय होगी

असल में यह तो हम मान चुके थे कि केंद्रीय सरकार संघीय होगी. आजादी की कहानी-पृष्ठ संख्या-173 में मौलाना आजाद ने लिखा कि जवाहर लाल नेहरू के इस बयान से जिन्ना भौंचक्के रह गए. उन्होंने तुरंत यह बयान जारी किया कि जवाहर लाल नेहरू के इस बयान से सारी स्थिति पर एक बार फिर विचार करना जरूरी हो गया है.

जिन्ना ने लियाकत अली खान से लीग परिषद की बैठक बुलाने के लिए कहा. 27 जुलाई को बंबई में बैठक हुई. बैठक ने ‘डायरेक्ट एक्शन’ यानी सीधी कार्रवाई करने का निर्णय कर लिया.

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