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मराठा क्रांति मोर्चा: जाति-समुदाय पर नहीं आर्थिक आधार पर मिले आरक्षण

आजादी के 70 साल बाद हमें जाति आधारित आरक्षण के परे सोचने वाली विचारधारा की जरूरत है

Dinesh Unnikrishnan Updated On: Aug 11, 2017 08:45 AM IST

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मराठा क्रांति मोर्चा: जाति-समुदाय पर नहीं आर्थिक आधार पर मिले आरक्षण

हम बात कर रहे हैं सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में आरक्षण की. पिछले काफी समय से देखा जा रहा है कि धार्मिक और क्षेत्रीय आधारित समुदाय अपने संख्याबल और शक्ति प्रदर्शन के जरिए सरकारों पर दबाव डालकर अपनी मांगे मनवा लेते हैं और आरक्षण में हिस्सेदार बन जाते हैं.

अपनी मांगों को मनवाने के लिए ये समुदाय किसी भी हद तक चला जाते हैं, जैसे शहरों का घेराव कर उसे बंधक बनाना या तोड़फोड़-आगजनी करके सार्वजनिक संपत्तियों को बर्बाद करना. ऐसे समुदाय आजादी के 70 साल बाद कुछ ज्यादा ही मजबूती के साथ उभर कर सामने आए हैं. जोकि अपनी मनमानी के लिए बाकी देशवासियों के साथ दुश्मन सरीखा व्यवहार करने से नहीं चूकते. ऐसी घटनाएं हमें आए दिन देखने को मिल रही हैं.

राष्ट्रहित या दिखावा

ऐसा लग रहा है कि लोगों में राष्ट्रहित की भावना ही खत्म हो गई है, उन्हें सिर्फ अपने समुदाय के हितों की ही चिंता है. आरक्षण के लिए जाट समुदाय ने फरवरी 2016 में जमकर बवाल काटा था.

वहीं साल 2010 में दलित-मुसलमानों ने, फिलहाल गुजरात में पटेल, आंध्र प्रदेश में कामा और महाराष्ट्र में मराठा समुदाय भी इसी राह पर चल पड़ा है. आरक्षण की मांग पर मराठा क्रांति मोर्चा ने बुधवार को मुंबई की रफ्तार रोक दी. करीब तीन लाख लोगों ने दक्षिण मुंबई में शक्ति प्रदर्शन करते हुए देवेंद्र फडणवीस सरकार को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया. मराठा समुदाय के ये प्रदर्शनकारी नौकरियों और शिक्षा में आरक्षण की मांग कर रहे थे. हम में से कुछ लोगों को एक और समुदाय की धर्म पर आधारित विचित्र मांग याद होगी, इस साल की शुरुआत में ये मांग ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने की थी.

मुसलमानों को भी मिले बराबरी का हक

बीएमसी के बजट से पहले ओवैसी ने आग्रह किया था कि महानगर के निगमों में मुसलमानों को उनकी तादाद के अनुपात में बजट संसाधन आवंटित किए जाएं. ओवैसी का तर्क था कि बीएमसी के वार्डों में मुसलमानों की संख्या तकरीबन 21 फीसदी है, ऐसे में बीएमसी के बजट से 7,770 करोड़ रुपए मुस्लिम समुदाय के कल्याण के लिए खर्च होना चाहिए. यानी ओवैसी के तर्क के हिसाब से बीएमसी में ईसाई बजट, बौद्ध बजट और सिख बजट भी होना चाहिए.

उस वक्त, बीजेपी की मुंबई इकाई के अध्यक्ष आशीष शेलार ने ओवैसी की मांग को सांप्रदायिक करार देते हुए जांच की मांग की थी. शेलार ने कहा था, 'बीजेपी चाहती है कि ओवैसी के भाषण की जांच हो. हम सांप्रदायिक आधार पर बजट के किसी भी तरह के विभाजन के खिलाफ हैं. हम ओवैसी के सांप्रदायिक और आपत्तिजनक बयान की निंदा करते हैं. हमने चुनाव आयोग से शिकायत की है, और चाहते हैं कि ओवैसी पर कार्रवाई हो.'

वहीं बीएमसी ने ओवैसी की मांग को संप्रदाय आधारित उपकार जैसा खतरनाक विचार मानते हुए खारिज कर दिया था. ये विडंबना ही है कि ओवैसी की मांग के महज सात महीने बाद ही महाराष्ट्र की बीजेपी सरकार एक दूसरे समुदाय यानी मराठों की मांगों के आगे ढेर हो गई.

क्या है दोनों मांगों के बीच का फर्क?

यहां दोनों मांगों के बीच एकमात्र अंतर ये है कि, मराठे यहां धर्म आधारित समुदाय नहीं हैं और न ही फिलहाल राज्य में कोई चुनाव या बजट सत्र है. लेकिन ऐसे मामलों में हर बार एक ही सवाल सामने आता है कि किसी समुदाय को खुश और शांत करने के लिए सरकार समझौते पर क्यों उतर आती है? कोई फैसला लेने से पहले सरकार योग्यता या बाकी दूसरे मानदंडों को आधार क्यों नहीं बनाती?

फिलहाल फडणवीस मराठों की मांगे को लेकर करीब-करीब सहमत हो गए हैं. उन्होंने आरक्षण के इस मामले को पिछड़ा आयोग के पास भेज दिया है और इसे समयबद्ध तरीके से सुलझाने का आदेश दिया है. ये केवल समय की बात है वरना ऐसी मांगें अन्य समुदायों से भी उठती रहती हैं.

ऐसी ही एक मांग महाराष्ट्र के विधायकों के एक गुट ने उठा दी है. ये लोग मुसलमानों के लिए आरक्षण मांग रहे हैं. विधायकों के इस गुट में समाजवादी पार्टी के विधायक अबू आज़मी और एआईएमआईएम के विधायक वारिस पठान भी शामिल हैं.

इन विधायकों ने मुसलमानों को आरक्षण देने के मामले में फडणवीस सरकार पर कानून की अनदेखी का आरोप लगाया है. अबू आज़मी का कहना है कि जब तक सरकार मुसलमानों के हितों का ख्याल नहीं रखेगी, तब तक देश प्रगति नहीं कर सकता.

सब मांग रहे हैं अपने लिए अलग बजट

सामुदायिक आधारित रियायतों की ये मांगें सिर्फ मुसलमानों तक ही सीमित नहीं. जल्द ही हमें कई दूसरे समुदायों से भी ऐसी मांगों की आवाजें बुलंद हो सकती हैं. महाराष्ट्र की कुल जनसंख्या में मराठों की तादाद एक तिहाई से ज्यादा है. मराठों की ये संख्या एक बेशकीमती वोट बैंक मानी जाती है.

आरक्षण की मांग को लेकर मराठा समुदाय अरसे से प्रदर्शन करता आ रहा था, इतनी बड़ी संख्या वाले समुदाय की मांगों की अनदेखी करना किसी भी राजनेता के लिए सियासी खुदकुशी करने जैसा होता, लिहाजा मुख्यमंत्री फडणवीस ने हालात को भांप कर ही फैसला लिया.

वैसे ये दूसरी बार है कि जब फडणवीस ने समूहों के दबाव आगे हथियार डाले हैं. कुछ दिन पहले ही फडणवीस ने राज्य के किसानों का कृषि ऋण माफ करने का ऐलान किया था. जिससे राजकोष पर करीब 40,000 करोड़ रुपए का अतरिक्त भार पड़ा है. मजे की बात तो ये है कि शुरुआत में फडणवीस कृषि ऋण माफी का जोरदार विरोध कर रहे थे और इसकी खामियां गिनाते आ रहे थे.

आय पर आधारित आरक्षण 

वैसे अब देश में समुदाय आधारित आरक्षण की बजाए आय आधारित आरक्षण का वक्त आ गया है. शिक्षा और सरकारी नौकरियों में आय आधारित आरक्षण की ही जरूरत है, ताकि वंचितों को उनका हक मिल सके.

नौकरी और शिक्षा के अवसर कायदे से आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को मिलने चाहिए. न कि लोगों की विशेष जाति या धर्म के आधार पर. समुदाय आधारित आरक्षण का कोई अंत नहीं है. ऐसी मांगे बारंबार सामने आती रहेंगी. लिहाजा सरकार का किसी विशेष समुदाय के प्रति झुकाव या पक्षपात ठीक नहीं है.

हालांकि भारत में समुदाय आधारित आरक्षण को आय आधारित आरक्षण में तब्दील करना आसान नहीं है. लेकिन आरक्षण के मौजूदा स्वरूप में बदलाव की कम से कम कोशिशें तो शुरू होना चाहिए.

जैसा कि 'कैपिटल इन द ट्वेन्टी फर्स्ट सेंचुरी' किताब के लेखक फ्रांसीसी अर्थशास्त्री थॉमस पिकेट्टी ने दिसंबर 2015 को द इंडियन एक्सप्रेस अखबार को दिए इंटरव्यू में कहा था, 'मैं नहीं कहता कि जाति आधारित आरक्षण की व्यवस्था को तुरंत खत्म करके आय आधारित आरक्षण व्यवस्था को लागू कर देना चाहिए. लेकिन देश की सेहत और उन्नति के लिए यही एकमात्र दूरगामी उपाय है.'

आजादी के 70 साल बाद हमें जाति आधारित आरक्षण के परे सोचने वाली विचारधारा की जरूरत है, क्योंकि ये वक्त योग्यता आधारित आरक्षण का है. योग्यता आधारित आरक्षण व्यवस्था से सभी का फायदा होगा, इनमें देश के आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़े समुदाय भी शामिल हैं.

लेकिन इस बदलाव के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति और सभी जातियों और समुदायों के बीच आम सहमित की जरूरत है. राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव में हम बुधवार को मुंबई में मराठों के मोर्चे जैसे प्रदर्शन देखते रहने को मजबूर रहेंगे.

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