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मणिपुर में बीजेपी सरकार के सामने हैं पहाड़ जैसी चुनौतियां...

बीजेपी को ऐसे वक्त पर मणिपुर की सत्ता मिल रही है जबकि राज्य लंबे वक्त से जातीय तनाव की मार झेल रहा है

Kangkan Acharyya Updated On: Mar 16, 2017 08:03 AM IST

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मणिपुर में बीजेपी सरकार के सामने हैं पहाड़ जैसी चुनौतियां...

नॉन्गथॉन्गबाम बिरेन सिंह के मणिपुर के पहले बीजेपी मुख्यमंत्री बन गए हैं. उनके सामने सबसे मुख्य बड़ी चुनौती विवादों से घिरे इस राज्य के सभी समुदायों के लिए आपसी स्वीकार्य रास्ते की तलाश करना है.

मणिपुर की गवर्नर नजमा हेपतुल्ला ने बीजेपी को सदन के पटल पर अपना बहुमत साबित करने को कहा है. बीजेपी ने गवर्नर को एन बिरेन सिंह के मुख्यमंत्री पद की दावेदारी के साथ 32 विधायकों की लिस्ट सौंपी थी.

बीजेपी को ऐसे वक्त पर मणिपुर की सत्ता मिल रही है, जबकि राज्य लंबे वक्त से जातीय तनाव की मार झेल रहा है. जिसके आखिर में आर्थिक नाकाबंदी का दौर शुरू हुआ. राज्य में आर्थिक नाकेबंदी का यह सिलसिला चलते हुए चार महीने से ज्यादा का वक्त हो गया है.

हालांकि, एन बिरेन सिंह को बहुमुखी प्रतिभा का धनी माना जाता है और ऐसे मुश्किल वक्त में वह इस पद के लिए एक उपयुक्त चुनाव हैं. लेकिन, इस मसले का ऐतिहासिक चरित्र किसी मुख्यमंत्री के व्यक्तिगत करिश्मे से कहीं ज्यादा बड़ा दिखाई देता है.

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बीजेपी नेता प्रकाश जावड़ेकर के साथ बिरेन सिंह : पीटीआई

यहां वे मुख्य मसले दिए जा रहे हैं जिनका सामना एन बिरेन सिंह की सरकार को करना पड़ सकता है.

सात नए जिलों का मसला

राज्य चार महीने से चले रहे आर्थिक नाकेबंदी का शिकार है. कांग्रेस की अगुवाई वाली राज्य सरकार के सात नए जिले बनाने के विरोध में यूनाइटेड नागा काउंसिल (यूएनसी) ने राज्य पर आर्थिक नाकाबंदी थोप दी है. यूएनसी को लगता है कि यह फैसला नागा इलाकों को विभाजित करने की कोशिश है.

बीजेपी की अगुवाई वाली नई सरकार इस मसले को हल करने के लिए भारी दबाब में होगी. इसकी वजह यह है कि खुद प्रधानमंत्री ने राज्य की रैली में इस मसले को हल करने का वादा किया था.

मैदानी इलाकों में रहने वाले लोगों का भी दवाब सरकार पर होगा जो कि राज्य में बीजेपी का कोर सपोर्ट बेस है.

इस मसले को हल करने का सीधा तरीका नागा इलाकों में बनाए गए जिलों का फैसला वापस लेना है. इससे राज्य में पार्टी के सहयोगी नागा पीपुल्स फ्रंट को तसल्ली होगी, जो कि यूएनसी की राजनीतिक इकाई है.

लेकिन, नए जिले बनाने के फैसले को वापस लेने को मैदानी इलाकों में रहने वाले लोग एनएससीएन (आईएम) के दबाब के आगे झुकने के तौर पर देख सकते हैं.

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चुनाव से पहले यूनाइटेड काउंसिल ऑफ मणिपपुर के प्रेसिडेंट, एलांगबाम जॉनसन ने फ़र्स्टपोस्ट से कहा था, ‘हम यूएनसी के दबाब के आगे नहीं झुकेंगे.’ उन्होंने यह भी कहा था कि यूनाइटेड काउंसिल ऑफ मणिपुर ने सरकार को चेतावनी दी है कि वह नए जिले बनाने के फैसले से पैर पीछे न खींचे.

ऐसे में बड़ा सवाल यही है कि क्या अपने कोर वोटर्स को नाराज किए बगैर बीजेपी की अगुवाई वाली सरकार इस मसले को हल कर पाएगी?

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असम के मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनोवाल के साथ बिरेन सिंह

मैतेयी लोगों की जातीय पहचान की सुरक्षा

बीजेपी लंबे वक्त से मैतेयी पहचान की सुरक्षा की मांग की राजनीति करती रही है. पार्टी कहती रही है कि वह राज्य के मैदानी इलाकों में रहने वाले प्रवासियों की बढ़ती आबादी से चिंतित हैं.

अपने चुनावी घोषणापत्र में बीजेपी ने कहा है कि ‘बंगाल ईस्टर्न फ्रंटियर रेगुलेशन, 1873 या किसी अन्य एक्ट को बढ़ाने की जरूरत है ताकि मणिपुर में बाहर से आने वाले प्रवासी मजदूरों की तादाद को नियंत्रित रखा जा सके. एंट्री फीस, लैंडिंग फीस, पनिशमेंट क्लॉज को इस एक्ट में शामिल किया जाना चाहिए.’

मणिपुर की कांग्रेस सरकार ने 2016 में तीन बिल पेश किए थे. सरकार ने दावा किया था कि ये बिल लागू होने पर घाटियों में इनर लाइन परमिट सिस्टम की तरह प्रभावी होंगे. लेकिन, बिलों का पहाड़ियों पर रहने वाले जनजातीय लोगों ने विरोध किया. वे इसे अपने अधिकारों के अतिक्रमण के तौर पर देख रहे थे.

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नॉन्गथॉन्गबाम बिरेन सिंह उस समय सत्ताधारी कांग्रेस के एमएलए थे. क्या वह आदिवासियों को समझाने में सफल हो पाएंगे?

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मणिपुर में सबसे बड़ी मांग मैतेयी समुदाय की पहचान बचाने की है

नागा शांति समझौता

बीजेपी एनएससीएन (आईएम) के साथ शांति समझौते को लेकर अपनी उंगलियां जला चुकी है क्योंकि इसके बारे में बरती गई गोपनीयता को कांग्रेस ने मणिपुर में एक मुद्दा बना दिया था. कांग्रेस ने इसे राज्य की अखंडता के साथ किए गए समझौते और षड्यंत्र के तौर पर पेश किया था.

यह माना जा रहा है कि इस बहस ने ही बीजेपी को मणिपुर में पूर्ण जीत से रोक दिया. नई सरकार को फूंक-फूंककर इस मसले पर आगे बढ़ना होगा और ऐसा माहौल पैदा करना होगा जिसमें सबकी सहमति से शांति वार्ता आगे बढ़ पाए.

यह पार्टी के सामने मौजूद सबसे बड़ी चुनौती है क्योंकि यह एक संवेदनशील मसला है और एग्रीमेंट के फ्रेमवर्क के सार्वजनिक होने पर क्या प्रतिक्रिया आएगी इसका अनुमान लगाना मुश्किल है.

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