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बंगाल के वर्तमान को भूल अतीत के गीत गाना चाहती हैं ममता बनर्जी

दार्जिलिंग में चल रही अशांति से बेपरवाह पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री बंगाली गौरव को पुनर्जीवित करने में जुटी हुई हैं

Ambikanand Sahay | Published On: Jun 14, 2017 08:25 AM IST | Updated On: Jun 14, 2017 08:25 AM IST

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बंगाल के वर्तमान को भूल अतीत के गीत गाना चाहती हैं ममता बनर्जी

पश्चिम बंगाल में पहाड़ के लोगों पर “बांग्ला थोपने” के खिलाफ गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के विरोध प्रदर्शन से भड़की हिंसा को नियंत्रित करने के लिए पिछले हफ्ते के आखिर में सेना बुलानी पड़ी. लेकिन दार्जिलिंग में चल रही इस अशांति से बेपरवाह पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी अपने ताजे जुनून बंगाली गौरव को पुनर्जीवित करने में जुटी हुई हैं.

उन्होंने खुद राज्य का लोगो डिजाइन किया, जिसमें अशोक स्तंभ के साथ ‘विश्व बांग्ला’ थीम पर खासतौर से रोशनी डाली गयी है. इस लोगो को केंद्र सरकार की मंजूरी के लिए नई दिल्ली भेजने के बाद मुख्यमंत्री ने एक छोटी कविता लिखना शुरू की, जो ‘राज्य का गीत’ बनेगा.

इंडियन एक्सप्रेस ने इस घटनाक्रम को विस्तार से कवर किया. 30 मई को अखबार ने इस बारे में क्या लिखा, उस पर गौर करिए: 'यह कदम ऐसे वक्त पर उठाया गया है जब तृणमूल कांग्रेस राज्य में बीजेपी के उभार को रोकने में लगी हुई है. मुख्यमंत्री ने हाल ही में आरोप लगाया था कि बीजेपी बंगाल में बाहरी संस्कृति ला रही है.'

क्या रहेगी गीत की थीम

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मुख्यमंत्री के करीबी सूत्रों के हवाले से अखबार ने आगे लिखा: 'गीत की मुख्य थीम यह होगी कि बंगाल की एक विशिष्ट पहचान है. यह पहचान धर्मनिरपेक्षता के मूल्यों से गहराई से जुड़ी है. बंगाल के लोग कभी विभाजनकारी नहीं थे. कोलकाता पहला कॉस्मोपोलिटन शहर था और इस शहर ने राज्य की तरह हमेशा मतभेदों का स्वागत किया. यह गीत की अंतर्निहित थीम होगी.'

'यह थीम बीजेपी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार के लिए एक राजनीतिक संदेश भी होगा जो बंगाल में हिंदी और हिंदुत्व का आक्रामक तरीके से प्रचार-प्रसार करने में जुटा है. पिछले कुछ सालों से बीजेपी बंगाल के अधिकारों पर अंकुश लगाने की कोशिश कर रही है. राज्य को वित्तीय संसाधनों से वंचित करने से शुरू कर सांस्कृतिक गिरावट की ओर ले जाया गया.'

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इसमें कोई संदेह नहीं है कि ममता ने 100 साल पहले बंगाल की प्रशंसा में गोपाल कृष्ण गोखले के कथन से प्रेरणा ली है: 'बंगाल जो आज सोचता है, भारत उसे कल सोचता है.' यह जानना महत्वपूर्ण है कि स्वाधीनता आंदोलन के बड़े नेताओं में से एक होने के साथ ही गोखले महात्मा गांधी और मोहम्मद अली जिन्ना दोनों के संरक्षक थे. यह उन अच्छे दिनों की बात है जब भारतीय समाज को सांप्रदायिकता के कीड़े ने जहरीला नहीं किया था.

'दीदी' के संबोधन से लोकप्रिय ममता बनर्जी मूर्ख नहीं है. वह जानती है कि वह क्या कर रही हैं. उनकी राजनीति तीन बुनियादी विषयों – धर्मनिरपेक्षता, संघवाद और समावेशी समाज – के इर्द-गिर्द घूमती है. ऐसे कोई आश्चर्य नहीं है कि वह खुद प्रस्तावित राज्य गीत लिख रही हैं. गीत में सिर्फ तीन छंद होंगे और सभी छंदों में बंगाल की आत्मा का समावेश होगा. एक नामी संगीत निर्देशक की देखरेख में गीत को सुर देने वालों को चुना जा रहा है.

लेकिन यहां एक दिक्कत है: गोखले का बंगाल और ममता का पश्चिम बंगाल दो अलग-अलग चीजें हैं. पिछले 100 सालों में हुगली में बहुत पानी बह चुका है.

आज का बंगाल अलग है

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गोखले की टिप्पणी के संदर्भ में शिकागो विश्वविद्यालय में पेश अपने शोध पत्र में मेखला बनर्जी लिखती हैं: 'यह एक सदी पहले बंगालियों का सटीक वर्णन था. जीवन के हर क्षेत्र - विज्ञान, साहित्य, देशभक्ति - में बंगाल सबसे आगे था. बंगाली साहित्य का दुनिया की कई भाषाओं में अनुवाद हुआ है. बंगाल में पैदा हुई क्रांतिकारी चिनगारी पूरे भारत में फैली और उसने अंग्रेजों को भारत छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया.'

मेखला आगे लिखती हैं: 'नेताजी सुभाष चंद्र बोस, ऋषि अरबिंदो, देशबंधु चितरंजन दास, रासबिहारी बोस, मास्टर दा सुरजा सेन जैसे बंगाल के सुपुत्र और उस दौर के कई अन्य क्रांतिकारी आंदोलन के मास्टरमाइंड थे. काजी नजरुल के क्रांतिकारी गाने, बंकिम चंद्र का ‘बंदे मातरम’ और टैगोर का ‘जन गण मन’ सिर्फ बंगाल के ही नहीं, बल्कि पूरे भारत के गीत बन गए.'

अपने शोध पत्र में लेखिका स्वामी विवेकानंद के महान कार्यों के बारे में भी बात करती है, जिन्होंने ईसाई वर्चस्व वाले क्षेत्रों में हिंदू धर्म की महिमा फैला दी थी.

लेकिन यह सब इतिहास है. ममता का पश्चिम बंगाल अब बौद्धिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक स्वर्ग नहीं रहा, जैसा कि गोखले के समय में हुआ करता था. हालांकि यह अलग बात है कि सभी दलों के नेता परेशान करने वाले वर्तमान की बजाय शानदार अतीत के बारे में बात करना पसंद करते हैं. आरएसएस दिन-रात ऐसी बातें करता है. कांग्रेस के लोग भी हर वक्त ऐसा करते हैं. बदलाव के लिए ही सही, अगर ममता भी ऐसा करती हैं तो आप उनकी गलती कैसे निकाल सकते हैं?

खैर, यह देखना बाकी है कि ममता का प्रस्तावित राज्य गीत बंगाली गौरव को पुनर्जीवित कर पाता है या नहीं. अगर ऐसा होता है तो यह अमित शाह की बीजेपी के लिए मुश्किलों से भरा वक्त साबित होगा. आइए तब तक इंतजार करते हैं जब तक कि इस गीत को अमलीजामा नहीं पहना दिया जाता है.

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